फसल की खेती (Crop Cultivation)

गेहूं बीज उत्पादन की चुनौतियां

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  •  उपेन्द्र सिंह , अनिल कुमार सिंह , के. सी. शर्मा
  • दिलीप कुमार वर्मा , नरेन्द्र बिरला
    भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, क्षेत्रीय केन्द्र, इन्दौर

 

8 नवम्बर 2022, गेहूं बीज उत्पादन की चुनौतियां – गेहूं खाद्यान्न सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण फसल है। पिछले दो दशकों में जलवायु व तापमान में आये अप्रत्याशित बदलाव ने गेहूं उत्पादन को जटिल कर दिया है। गेहूं उत्पादन में दिन पर दिन चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। गेहूं उत्पादन में सम्पूर्ण संसाधनों के उपयोग के बाद भी प्रदेश में गेहूं उत्पादकता लगभग 31 क्विंटल/हेक्टेयर है। मध्यभारत का गेहूं गुणवत्ता में पूरे देश में अग्रणी है। इस क्षेत्र के लगभग 50 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में गेहूं बोया जाता है। जो देश में बोये जाने वाले गेहूं के कुल क्षेत्रफल का लगभग 30 प्रतिशत है।

 अच्छी गुणवत्ता वाले बीज की अनुपलब्धता गेहूं के उत्पादन में कमी के प्रमुख कारकों में से एक है। अभी गेहंू आच्छादन के लिए आवश्यक बीज का लगभग 95 प्रतिशत कृषकों द्वारा ही पैदा किया जाता है। यह संशय है कि आगे भी यह स्थिति बनी रहेगी जब तक कि सार्वजनिक संस्थाएं बड़े स्तर पर इस कार्य में हाथ नहीं बटायें। अत: यह समयोचित ही होगा कि कृषकों को अपने स्तर पर अच्छी गुणवत्ता वाले किस्मों के अनुरूप बीज बनाने के लिए प्रेरित किया जाये। गेहूं की अच्छी पैदावार लेने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले बीज को उपयोग में लाना अत्यन्त आवश्यक है।

बीज एवं अनाज में अंतर 
गुण बीज अनाज
उपयोगिता फसल उत्पादन में खाने में
शुद्धता भौतिक एवं अनुवांशिक शुद्धता आवश्यक आवश्यक नहीं
वैज्ञानिक संस्तुति होती है  नहीं होती है
देखने में चमकदार सुडौल एवं एक समान आवश्यक नहीं
कीमत अधिक होती है कम होती है 
मिश्रण  नहीं होता है होता है
उत्पादन  अधिक सीमित
अनुविक्षण आवश्यक  आवश्यक नहीं
अंकुरण  95 प्रतिशत से अधिक  कम

बीज की संवेदनशीलता के कारण गेहूं का बीज पकने/कटाई के समय के मौसम (वर्षा अथवा अधिक तापक्रम), समय पर न की गई कटाई, गलत तरीके से की गई गहाई, अनुचित भण्डारण आदि से प्रभावित होता है। खराब बीज का उपयोग खेत में पौधों की संख्या में कमी लाकर कृषकों को दोहरा नुकसान पहुंचाता है। एक तो उपज में कमी लाकर व दूसरे उत्पादन लागत बढ़ाकर। सही समय पर उचित मानकों वाला बीज न उपलब्ध होना कृषकों के लिए एक बहुत बड़ी समस्या है। इसलिए बुवाई के समय अच्छे बीज की प्राप्ति के लिए किसानों को बहुत अधिक भटकना पड़ता है।

इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए कृषक भाइयों को स्वंय जागरूक होने की आवश्यकता है। कुछ विशेष सावधानियां रखकर किसान भाई गेहूं की विभिन्न किस्मों का अच्छा बीज स्वयं तैयार कर सकते हैं व उसकी गुणवत्ता को भी बनाये रख सकते हैं। बीज उत्पादन हेतु कृषक बंधु कृपया निम्न बातों का ध्यान रखें:

सही किस्म का चुनाव

गेहूँ की काश्त के लिए सही किस्म का चुनाव बहुत महत्वपूर्ण है। क्षेत्र के लिए संस्तुत प्रजातियाँ ही चुनें: अन्य स्थानों/क्षेत्रों का बीज लाकर उनका उत्पादन न करें तथा नये रोगों, कीड़ों एवं खरपतवारों से अपने क्षेत्र की फसल को बचाकर रखें।

स्रोत्र

प्रजनक या अधार बीजों के द्वारा सुनिश्चित आनुवांशिक गुणवत्ता के साथ अधिकतम बीज की उपज प्राप्त होती है।

पूर्व फसल या खरपतवार के बीज ना हो:

इससे अकुरंण तथा फसल की बढ़वार अच्छी होती है

खेत की उर्वरता अच्छी हो:

संतुलित उर्वरकों के उपयोग से फसल अच्छी होती है एवं उच्च गुणवत्ता वाली बीज की फसल ली जा सकती है।

खरपतवार नियंत्रण

खेत में पूर्व में जीवनाशक रसायन का उपयोग न किया हो इससे मिट्टी से सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं, (पृष्ठ 8 पर जारी)  पौधों की वृद्धि मंद हो जाती है तथा बीज की अंकुरण क्षमता एवं गुणवत्ता कम हो जाती है। फसल के अनुवांशिक गुणों में क्षति तथा मृदा एवं पर्यावरण को दूषित होने से रोकने के लिए जीवनाशक रसायनों का उपयोग न करें। खरपतवार नियंत्रण के लिए खेतों, मेड़ों, रास्तों व नालियों से खरपतवार लगातार निकालते रहें। 15-20 दिन एवं 35-45 दिन की फसल में बैल चलित डोरे या हैन्ड हो /व्हील हो चलायें, इससे खरपतवार कम हो जाते हैं तथा पौधों की जड़ों पर मिट्टी चढ़ जाती है व खेत में नमी बनी रहती है, तथा पौधों के गिरने का खतरा भी कम हो जाता है।

पृथक्करण दूरी:

बीजोत्पादन के लिये 2 अलग-अलग प्रजातियों के खेतों के बीच में पृथक्करण दूरी 3 मीटर रखेें। इससे बीज की फसल के अनुवांशिक गुण यथावत बने रहते हैं।

प्रजातियों का चयन उपलब्ध सिंचाई अनुसार करें:

खेतों के लिये उपलब्ध सिंचाई जल को ध्यान में रखकर प्रजातियों का चयन करें। एक या दो सिंचाई का जल ही उपलब्ध हो तो कम पानी चाहने वाली प्रजातियों की ही खेती करें।

रोटी वाले गेहूं की प्रजातियां: हर्षिता (एचआई 1531), पूसा बहार (एचडी 2987), पूसा उजाला (एचआई1605), जे. डब्लयू. 3020, जे. डब्लयू. 3173, जे. डब्लयू. 3211, जे. डब्लयू. 3269, डी. बी. डब्लयू. 110, एम. पी. 3288.

मालवी गेहूं की प्रजातियां: एच. आई. 8777, एच. आई. 8802, एच. आई. 8805, एच. आई. 8823 (पूसा प्रभात)

तीन या तीन से अधिक सिंचाई उपलब्ध हों तो अधिक पानी चाहने वाली समय से बुवाई (10 से 25 नवम्बर) वाली किस्मों का ही चुनाव करें।

रोटी वाले गेहूं की प्रजातियां: पूर्णा (एचआई 1544), पूसा वकुला (एचआई1636),  जे. डब्लयू. 1201, जी. डब्लयू. 273, जी. डब्लयू. 322, जी. डब्लयू. 366, 513

मालवी गेहूं की प्रजातियां:  पोषण (एचआई 8663), पूसा अनमोल (एचआई 8737), पूसा तेजस (एचआई 8759),  एम. पी. ओ. 1215, एम. पी. ओ. 1106,  एम. पी. ओ. 1255

दिसम्बर में बुवाई हेतु प्रजातियॉं: पूसा 111 (एचडी 2932),  पूसा अहिल्या (एचआई 1634), जे. डब्लयू. 1202,  जे. डब्लयू. 1203, एम. पी. 3336, राज 4238।

अंकुरण क्षमता परीक्षण

बुवाई से पूर्व अंकुरण क्षमता का परीक्षण अवश्य कर लेें। अंकुरण  क्षमता परीक्षण घरेलू तकनीक से बड़ी सरलता से किया जा सकता है। नम टाट, बोरी, या अखबार के टुकड़े पर गिनकर (कम से कम सौ बीज) बीज लाईन से रखकर लपेटें। चार से छह दिनों तक नमी बनाये रखें। अंकुरित बीज की संख्या गिनकर उपयोग में लाये जाने वाले बीज का अंकुरण प्रतिशत जांच लें। इसके अतिरिक्त अन्य साधनों जैसे आधा मटका, गमला या तगारी में एक भाग गोबर की खाद तथा तीन भाग मिट्टी भरकर उसमें सौ दाने समान दूरी पर बोकर हल्की  नमी बनाये रखें व अंकुरण होने पर बीज की अंकुरण क्षमता सुनिश्चित कर लें। यह प्रक्रिया बीज को सीधे क्यारी में लगाकर भी की जा सकती है। इस विधि के लिए 131 मीटर की क्यारी अच्छी तरह सिंचाई देकर बना लें। कतार में 500 बीज उसी तरह से बोएं, जैसे खेत में बोते हैं। दस दिन बाद स्वस्थ पौधों को गिन लें। यदि स्वस्थ पौधे 450 से अधिक हों, तो निर्धारित बीज दर बुवाई के लिए उपयोग करें। किन्तु यदि जमाव संख्या 450 से कम हो तो अधिक बीज दर का प्रयोग करें।  

एक किस्म को अधिकता से न लगायें वरन 3-4 किस्मों की खेती करें। इससे रोग, कीट आदि के प्रकोप से नुकसान कम होता है। अलग-अलग पकने की अवधि होने के कारण कटाई समय से होने से दाने बिखरने का नुकसान कम होता है। साथ ही साथ मौसम जैसे वर्षा, तापमान व प्रकाश उपलब्धि आदि में परिर्वतन से उत्पादन में कमी होने की आशंका कम रहती है।

बुवाई से पूर्व सीड ड्रिल की सफाई:

बीज की शुद्धता व उचित गुणवत्ता बनाये रखने के लिए किसी भी प्रजाति को खेत में बोने से पहले सीड-ड्रिल की अच्छी तरह से सफाई करें। उसी सीड ड्रिल से पूर्व में बोई गई किस्मों के बीज ड्रिल के अंदर व ड्रिल के गियरों आदि में फंसे रहते हैं। उन्हे निकालना अत्यन्त आवश्यक है। इस कार्य में केवल 15-20 मिनट लगते हैं।

संस्तुत बीज दर:

संस्तुत बीज दर का प्रयोग करें ताकि पौधों को उचित पोषण, प्रकाश व हवा मिल सके  सामान्यत: अगेती बुवाई के लिए 100 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर, समय से बुवाई के लिए 120 कि.ग्रा./हे. बीज दर का उपयोग करें। बीज दर 1000 दानों के वजन के आधार पर भी निर्धारित किया जा सकता है। बीज के 1000 दानों का वजन करें, वजन जितना आये उतने ही किलोग्राम बीज प्रति एकड़ उपयोग मे लायें।

सिंचाई:

विभिन्न किस्मों के लिए अनुशंसित सिंचाई संख्या के अनुसार ही सिंचाई करें। पर्याप्त जल की उपलब्धता होने पर भी  अनावश्यक सिंचाई न करें इससे लाभ की जगह हानि होती है। फसल पीली पड़ जाती है व बालियाँ देर से आती हैं। फसल पकते समय अनावश्यक सिंचाई देने से दाना दूधिया पड़ जाता है, उपज कम हो जाती है व बाजार मूल्य भी कम मिलता है। बालियां निकलते समय फव्वारा विधि से सिंचाई न करें अन्यथा फूल झड़ जाते हैं।

फसल की कटाई व थ्रेशिंग:

फसल को पूरी तरह पकने पर ही काटें, अगर कटाई जल्दी (पकने से पूर्व) कर ली जाती है तो दाने सिकुड़े और छोटे होते हैं, जिससे बीज की गुणवत्ता प्रभावित होती है। कुछ कृषक किन्ही कारणों से समय पर फसल नहीं काट पाते हंै। ज्यादा सूखने से दानों के बिखरने का अंदेशा रहता है। थ्रेशिंग करने से पहले थ्रेसर की अच्छी तरह सफाई करें, पूर्व में की गई अन्य प्रजाति की थ्रेशिंग के बीजों को पूर्णत: हटा दें। थ्रेशिंग करते समय विशेष ध्यान रखें कि दाने टूटें नहीं।

भण्डारण:
  • भण्डारण करने से पूर्व बीज को अच्छी तरह धूप में सुखा लें।
  • बीज में नमी 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो।
  • सम्भवत: बीज का भण्डारण लोहे की कोठियों में करें। अगर भण्डारण लोहे की कोठियों में न हो तो भण्डारण बैग में करें।
  • भण्डारण अत्यधिक नमी या अत्यधिक गर्म स्थान पर न करें।
  • बीज के बोरों (बैग) व दीवार के बीच जगह रखें।
  • भण्डारण की दीवारों में अगर दरारें हैं तो इन्हें पूर्णत: बंद  कर दें। क्योंकि इन्ही में कीटों का निवास रहता है।
  • भण्डारण करने से पूर्व बोरों को 15 मिनट तक गर्म पानी मे भिगोने से सभी कीट मर जाते हैं या बोरों को उल्टा करके 6 घंटे तेज धूप मेे सुखायेें या डेल्टामेथ्रिन 2.5 प्रतिशत का घोल बनाकर 10 मिनट तक बोरों को डुबोकर रखें।
  • अगर सम्भव हो तो भण्डार गृह में बीज रखने से पूर्व कीटनाशक दवाई का छिडक़ाव करें।
  • भण्डारण गृह में बीज को कीटों से सुरक्षित रखने के लिए सल्फास (एल्यूमिनियम फास्फाइड) या ई.डी.बी. (ईथाइल डाई ब्रोमाइड) का प्रयोग करें।
  • अगर भण्डार गृह मेें चूहों का प्रकोप है तो जिंक फास्फाइड की गोलियाँ बनाकर रखें।

इस प्रकार थोड़ी सी सावधानी रखकर व उन्नत तकनीकी अपनाकर तथा बीज के उचित रखरखाव से कृषक भाई अपना स्वयं का स्वस्थ, शुद्ध, उच्च गुणवत्ता व अच्छी अंकुरण क्षमता का बीज तैयार कर अगली बुवाई के लिए प्रयोग कर सकते हैं तथा बीज की आवश्यकता में आत्मनिर्भर होकर बीज पर लगने वाले खर्च में कटौती कर सकते हैं।

रोगिंग

रोगिंग अर्थात् अवांछित पौधों को निकालना: बीज को शुद्व बनाये रखने के लिए खेत से अन्य प्रजातियों के पौधों को निकाल दें। जैसे ही बालियाँ निकलना शुरू हों फसल की अन्य प्रजातियों के पौधों को पहचान कर जड़ से उखाड़ कर खेत से बहार कर दें। यह क्रिया पूरे खेत में 15-15 दिन के अंतराल पर दो-तीन बार अपनायें, एक किस्म/प्रजाति के पौधों के बीच अन्य दूसरी प्रजाति के पौधों को गेहूं की बाली व उनकी बढ़वार के आधार पर आसानी से पहचाना जा सकता है।

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