नसदार तोरई की उन्नत खेती

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पोषक तत्व एवं उपयोग :- इसके कोमल, मुलायम फल सब्जी के लिए उपयुक्त होते हैं। इसकी कोमल व मुलायम पत्तियों को भी सब्जी के रूप में उपयोग किया जाता है। इसके सूखे फलों के रेशों को बर्तन साफ  करने तथा घरेलू उपयोग में फिल्टर के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके बीज में 18.3-24.3 प्रतिशत तेल व 18-25 प्रतिशत प्रोटीन पायी जाती है।
मृदा एवं जलवायु :- नसदार तोरई की खेती उचित जल निकास वाली जीवांशयुक्त सभी प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है। अच्छी पैदावार के लिए बलुई दोमट या दोमट भूमि अधिक उपयुक्त होती है। 6-7 पी.एच. मान वाली मृदा इसकी खेती के लिए आदर्श होती है। नसदार तोरई की खेती के लिए गर्म एवं आद्र्र जलवायु की आवश्यकता होती है इसकी खेती ग्रीष्म (जायद) व वर्षा (खरीफ) दोनों ऋतुओं में सफलतापूर्वक की जाती है। इसकी खेती के लिए 32-36 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान सर्वोत्तम होता है।
खाद एवं उर्वरक:- अच्छी पैदावार के लिए 20-25 टन सड़ी गोबर की खाद खेती की तैयारी के समय खेत में मिला देते हैं। इसके अलावा 30-35 कि.ग्रा. नत्रजन, 25-30 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा 25-30 कि.ग्रा. पोटाश की प्रति हेक्टेयर आवश्यकता होती है। नजत्रन की आधी मात्रा तथ फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय खेत मे डालते हैं। नत्रजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के 30-40 दिन बाद टाप ड्रेसिंग के रूप में जड़ों के पास देना चाहिए।
बुवाई समय:- ग्रीष्मकालीन फसल की बुवाई फरवरी-मार्च तथा वर्षाकालीन फसल की बुवाई जून-जुलाई में करनी चाहिए। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के लिए 5 किग्रा. बीज की आवश्यकता होती है। बुवाई के लिए नाली एवं थाला विधि सबसे उत्तम है।
बुवाई की विधि:- इस विधि में खेत की तैयारी के बाद 2.5-3.0 मी. की दूरी पर 45 सेमी. चौड़ी तथा 30-40 सेमी. गहरी नालियाँ बना लेते हैं। इन नालियों के दोनों किनारों (मेड़ों) पर 50-60 सेमी. की दूरी पर बीज की बुवाई करते हैं। एक जगह पर कम से कम दो बीज लगाना चाहिए तथा बीज जमने के बाद एक पौधा निकाल देते हैं।
सिंचाई:-     नसदार तोरई की वर्षाकालीन फसल के लिए सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। वर्षा न होने की स्थिति में यदि खेत में नमी की कमी हो तो सिंचाई कर देनी चाहिए। ग्रीष्मकालीन फसल की पैदावार सिंचाई पर ही निर्भर करती है। गर्मियों में 5-6 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए।
पौधों को सहारा देना:- सामान्यतया ग्रीष्मकालीन फसल में पौधों को चढ़ाने की आवश्यकता नहीं होती है लेकिन वर्षाकालीन फसल में पौधों को बढऩे के साथ ही ट्रेलिस या पण्डाल बनाकर चढ़ा देना चाहिए इससे गुणवत्तायुक्त अधिक उपज प्राप्त होती है।
खरपतवार नियंत्रण:- खेत को खरपतवार मुक्त रखने के लिए अन्त: सस्य क्रियाएं जैसे निराई, गुड़ाई इत्यादि समय-समय पर करते रहना चाहिए।
पलवार का प्रयोग:- बुवाई के बाद खेत में मल्च का प्रयोग करना लाभप्रद होता है। इससे मृदा तापमान बढऩे व नमी संरक्षित होने के कारण बीजों का जमाव अच्छा होता है तथा खेत में खरपतवार नहीं उग पाते जिनके फलस्वरूप पैदावार पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।
तुड़ाई एवं भण्डारण:- फलों की तुड़ाई हमेशा मुलायम अवस्था में करनी चाहिए देर से तुड़ाई करने पर उसमें सख्त/कड़े रेशे बन जाते हैं। फलों की तुड़ाई 6-7 दिनों के अन्तराल पर करनी चाहिए। पूरे फसल अवधि में लगभग 8 तुड़ाईयाँ की जा सकती है।

कीट एवं रोग प्रबंधन

रेड पम्पकिन बीटल (कद्दू का लाल कीट):- इस कीट के पौढ़ व सुडिय़ाँ दोनों ही फसल को नुकसान पहुँचाते हैं। इसके प्रौढ़ कीट (भृंग) छोटे पौधों की मुलायम पत्तियां खा जाते हैं जिससे पौधे पत्ती रहित हो जाते है। इसकी सुंडिय़ाँ जमीन के नीचे पौधों की जड़ों एवं तनों में छेदकर देते है जिससे पौधे मर जाते है।
नियंत्रण:- ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें जिससे कि प्यूपा गर्मी की तेज धूप में झूलस कर मर जायें या तो पक्षियों के द्वारा खा लिये जाये। संक्रमण के समय कार्बोरिल 80 डब्ल्यू.पी.के.1 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व (कार्बोरिल घुलनशील चूर्ण 2 ग्राम प्रति लीटर पानी) या डाइक्लोरवास 70 ई.सी. की 1-1.5 मि.ली./ली. पानी के घोल का बीजपत्रीय अवस्था में छिड़काव करें। खेत में सूडिय़ों के गम्भीर संक्रमण के समय क्लोरोपाइरीफास के 2-3 मि.ली./ली के घोल से मृदा को अच्छी तरह तर कर दें तथा छिड़काव से पहले खाने योग्य फल की तुड़ाई अवश्य कर लें।
पर्ण सुरंगक कीट (लीफ माइनर):- इसके लार्वा पत्तियों में सुरंग बनाकर पर्ण हरित (क्लोरोफिल) को खाते है जिसके कारण प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होता है।
नियंत्रण:- इसकी रोकथाम के लिए 4 प्रतिशत नीम की गिरी के अर्क का छिड़काव प्रभारी होता है।
फ्रूट फ्लाई (फल मक्खी):-  इस कीट के मेगट नये विकसित फलों को गम्भीर क्षति पहुंचाते हैं। व्यस्क मक्खियां मुलायम फलों के छिलके में छेदकर एपिडर्मिस के नीचे अण्डा देती हैं तथा अण्डों से मेगट विकसित होते हैं जो कि फल को अन्दर से खाकर सड़ा देते हैं। ग्रीष्मकालीन वर्षा के समय अधिक आद्र्रता होने पर इनका संक्रमण अधिक होता है।
नियंत्रण:- गहरी ग्रीष्मकालीन जुताई कर प्यूपा को नष्ट करें। खेत में 8-10 मीटर की दूरी पर मक्का की फसल फनदा (ट्रेप) फसल के रूप में उगायें। खेत से सवंमित फलों को इक्ट्ठा कर जमीन में गहराई पर गाड़कर नष्ट कर दे। जहरीले चारा (10 प्रतिशत गुड़ या शिरा के साथ मेलाथियान 50 ई.सी 2 मि.ली./ली या कार्बोरिल 50 डब्ल्यू पी.2 ग्राम/ली. पानी के मिश्रण) का खेत में 250 स्पाट्स प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करें।
मृदुरोमिल आसिता (डाउनी मिल्ड्यू) :- यह रेाग स्युडोपेरान्स्पोरा क्यूबेन्सि फफूंद के कारण होता है। अधिक आद्र्रता वाले क्षेत्रों में इसका प्रकोप अधिक होता है, मुख्यत: लगातार ग्रीष्म कालीन वर्षा के समय इसके द्वारा होने वाला संक्रमण अधिक होता है। इस रोग के लक्षण पत्तियों के ऊपरी सतह पर कोणीय पीले धब्बों के रूप में परिलक्षित होते है जो आगे चलकर पत्तियों के निचली सतह पर फैल जाते है तथा पत्तियां सूखकर गिर जाती है।
नियंत्रण :- रोग ग्रस्ति पत्तियों को तोड़कर जला देना चाहिए। रोग के संक्रमण के समय जिनेब 75 डब्ल्यू पी 0.15 प्रतिशत या मैन्कोजेब के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए। अधिक संक्रमण के समय मेटालेक्सिल 8 प्रतिशत $ मैन्कोजेब 64 प्रतिशत के 2.5-3.0 ग्रा./ली पानी के घोल का छिड़काव साप्ताहिक अन्तराल पर करना चाहिए।
चूर्णिल आसिता (पाउडरी मिल्ड्यू):- इस रोग का कारक स्फेरोथिका फुलजीनिया एवं एरीसाइफी साइकोरेसीरम फफूंद है। इस फफूंद का संक्रमण सफेद से गंदा ग्रे पाउडर के रूप में पौधों के सभी भागों पर होता है। गम्भीर रूप से सवंमित पत्तियां भूरे रंग की होकर सिकुड़ जाती है। परिपक्वता से पहले ही पत्तियां झड़ जाती है तथा लताएं मर जाती है।
नियंत्रण :- पौधों के सवंमित भाग को जलाकर समाप्त कर देना चाहिए। बुवाई से पहले थीरस/कैप्टन/कारबेन्डाजिम की 2.5-3.0 ग्रा. प्रति किग्रा बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करना चाहिए। संक्रमण के समय डेनोकैप 48 ई.सी. के 0.03 प्रतिशत या सल्फर के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए।
कालर राट:- इस रोग का कारक राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक फफूंद है इसके कारण नवांकुरित पौधे मर जाते हैं। नये पौधों की अपेक्षा पुराने पौधे कम प्रभावित होते हैं।
नियंत्रण :- फसल चक्र को अपनाना चाहिए तथा बुवाई के समय बीज को कैप्टन की 3 ग्रा./किग्रा बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।
पीला मोजेक : – यह तोरई की खेती के लिए एक गम्भीर समस्या है। यह एक विषाणुजनित रोग है। इसके कारण कभी-कभी फसल में 100 प्रतिशत तक नुकसान हो जाता है। इस रोग का लक्षण पौधों की नई पत्तियों पर पीले धब्बे के रूप में दिखाई देता है। गम्भीर संक्रमण के समय पौधों की पत्तियां छोटी चित्तीदार व विकृत हो जाती है तथा फल अनियमित आकार के हो जाते है। इस रोग का विषाणु सफेद मक्खी के द्वारा फैलता है। इस कीट के निम्फ  (परी) व वयस्क दोनों  पौधों का रस चूसते है तथा पत्तियों पर इसके द्वारा विसर्जित मल द्वारा काले कज्जली मोल्ड्स विकसित हो जाते है जिससे पौधों में प्रकाश संश्लेषण बाधित होता है।
नियंत्रण :- बीज को इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यू पी. या थाईमेथोक्साम 70 डब्ल्यू एस. की 3 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से शोधित कर बुवाई करें। टमाटर, मिर्च व तम्बाकू की पुरानी फसल के बाद तोरई की बुवाई न करे तथा बैगन, जंगली कद्दूवर्गीय व कपास की फसल के पास तोरई की फसल न उगाये। फसल की बुवाई से लगभग 20 दिन पूर्व खेत के चारों ओर दो पंक्ति बाजरा की फसल को बार्डर फसल के रूप में उगायें। संक्रमण के समय इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. 0.3 मि.ली./ली. या थाईमेथोक्साम 0.4 ग्रा/ली पानी के घोल का 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें। संक्रमण के पूर्व रोग रोधन के तहत नीम तेल की 2-3 मि.ली./ली. पानी के साथ 0.5 मि.ली. स्टिकर मिलाकर छिड़काव करें।

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