सूखे चारे का यूरिया उपचार
लेखक: डॉ. निर्भय भावसार¹, डॉ. सोनू कुमार यादव2, ¹एम.वी. एससी. –प्रसार शिक्षा विभाग, भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली, 2सहायक प्राध्यापक, एस. एम. कॉलेज ऑफ वेटरिनरी साइंस एंड एनिमल रिसर्च, मथुरा
01 मई 2026, भोपाल: सूखे चारे का यूरिया उपचार – मवेशियों के स्वास्थ्य एवं दुग्ध उत्पादन के लिए हरा चारा और संतुलित पशु आहार अत्यंत आवश्यक होते हैं, किंतु वर्षभर हरे चारे की सीमित उपलब्धता और पशु आहार की बढ़ती लागत किसानों के सामने एक गंभीर चुनौती प्रस्तुत करती है। Basic Animal Husbandry Statistics (BAHS) अर्थात मूल पशुपालन सांख्यिकी के अनुसार भारत में कुल पशुधन की संख्या लगभग 53 करोड़ से अधिक है, फिर भी चारे की कमी के कारण अधिकांश पशुओं को पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन नहीं मिल पाता। वर्तमान में लगभग 80 प्रतिशत पशु सूखे चारे, विशेषकर धान एवं गेहूं के भूसे पर निर्भर हैं, जो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने के बावजूद पोषण की दृष्टि से कमजोर होता है, क्योंकि इसमें प्रोटीन की मात्रा 3 प्रतिशत से भी कम होती है तथा इसकी पाचनशीलता और स्वादिष्टता भी कम होती है।
ऐसी स्थिति में भूसे का यूरिया द्वारा उपचार एक प्रभावी समाधान के रूप में सामने आता है, जिससे इसकी पौष्टिकता में वृद्धि होती है और प्रोटीन की मात्रा लगभग 8 प्रतिशत तक पहुँच जाती है। इसके साथ ही इसकी पाचनशीलता और स्वादिष्टता में सुधार होता है, जिससे पशु इसे अधिक मात्रा में ग्रहण करते हैं और पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग कर पाते हैं। इस प्रकार यूरिया उपचारित भूसा पशुओं में प्रोटीन की कमी को दूर करने में सहायक सिद्ध होता है तथा इसके नियमित उपयोग से सघन आहार की आवश्यकता में लगभग 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है, जिससे पशुपालकों की लागत भी घटती है।

यूरिया उपचार से लाभ– यूरिया उपचारित भूसा पशुओं के लिए अत्यंत लाभकारी होता है, क्योंकि यह नरम और स्वादिष्ट होने के कारण पशु इसे बड़े चाव से खाते हैं और इसकी बर्बादी भी नहीं होती। इस प्रकार के उपचारित चारे के उपयोग से दुग्ध उत्पादन की लागत को कम किया जा सकता है, जिससे पशुपालकों को आर्थिक लाभ मिलता है। साथ ही, यूरिया उपचारित भूसा कम लागत में पूरे वर्ष उपलब्ध कराया जा सकता है, जो इसे एक सुविधाजनक विकल्प बनाता है।
विशेष रूप से गर्मी के मौसम में जब अन्य चारे की कमी हो जाती है, तब यह भूसा उस कमी को पूरा करने में सहायक होता है। इसके अतिरिक्त, बछड़ों और बछड़ियों को यह भूसा खिलाने से उनका वजन तेजी से बढ़ता है और वे अधिक स्वस्थ दिखाई देते हैं।
यूरिया उपचार से पशुचारे में सुधार
| पोषक तत्व | सामान्य भुसा (%) | उपचारित मुसा (%) |
| सी० पी० (प्रोटीन) | 3 – 3.5 | 6 – 8.0 |
| डी० सी० पी० (पाच्य प्रोटीन) | – | 3 – 4.0 |
| टी० डी० एन० (ऊर्जा) | 40 – 45 | 50 – 55 |
| सेलुलोज डी० (पाच्य) | 40 – 45 | 70 – 75 |
भूसे के यूरिया उपचार की विधि– भूसे के वैज्ञानिक उपचार के लिए सर्वप्रथम 4 किलोग्राम यूरिया को 40 लीटर स्वच्छ पानी में पूर्णतः घोलकर एक समान विलयन तैयार किया जाता है। इसके बाद लगभग 1 क्विंटल सूखे भूसे को समतल भूमि पर 3–4 इंच मोटाई की परत के रूप में फैलाया जाता है। तैयार यूरिया विलयन को इस परत पर फव्वारे या स्प्रेयर की सहायता से समान रूप से छिड़का जाता है, जिससे भूसा पर्याप्त रूप से नम हो सके। तत्पश्चात इस भूसे को पैरों से दबाकर सघन किया जाता है, ताकि वायु के स्थान कम हो जाएँ और अवायवीय परिस्थितियाँ बन सकें।
इसके ऊपर पुनः एक क्विंटल भूसे की समान परत बिछाई जाती है और उसी प्रकार 4 किलोग्राम यूरिया को 40 लीटर पानी में घोलकर उस पर छिड़काव किया जाता है तथा फिर से दबाकर सघन किया जाता है।
इस प्रक्रिया को आवश्यकतानुसार दोहराया जा सकता है। अंत में पूरे ढेर को चारों ओर से प्लास्टिक शीट द्वारा वायुरुद्ध ढंग से ढक दिया जाता है, जिससे बाहरी वायु का प्रवेश पूर्णतः रुक जाए। इस प्रकार तैयार ढेर को गर्मियों में न्यूनतम 3 सप्ताह तथा शीत ऋतु में लगभग 4 सप्ताह तक अवायवीय अवस्था में रखा जाता है।
इस अवधि के दौरान यूरिया का अपघटन होकर अमोनिया का निर्माण होता है, जो भूसे में उपस्थित जटिल कार्बनिक यौगिकों, विशेषकर लिग्नोसेल्यूलोज, को आंशिक रूप से विघटित करता है। इससे भूसे की पाचनशीलता एवं पोषक उपलब्धता में वृद्धि होती है, जिससे पशु इन पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग कर पाते हैं।

उपचारित भूसे को खिलाने का तरीका-भूसे को अपेक्षित मात्रा में ढेर से निकाले। शुरू शुरू में उपचारित भूसे को खिलाने से पहले आधा घंटा फैलाकर छोड़ दें। जब पशु यूरिया उपचारित भूसे को खाने लगे तो ढेर से निकालकर सीधे पशु को खिलावे।
ध्यान रखने योग्य बातें
- भूसे के उपचार के दौरान तैयार किए गए यूरिया घोल को पशुओं की पहुँच से दूर सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए।
- यूरिया को किसी भी परिस्थिति में सीधे पशुओं को नहीं खिलाना चाहिए, क्योंकि यह उनके लिए विषैला सिद्ध हो सकता है।
- उपचार की प्रक्रिया के लिए पक्का फर्श अधिक उपयुक्त माना जाता है, जबकि कच्चे फर्श की स्थिति में जमीन पर प्लास्टिक शीट बिछाना आवश्यक होता है।
- यूरिया उपचार की क्रिया बंद स्थान या आंगन के किसी सुरक्षित कोने में करना अधिक सुविधाजनक रहता है।
- तैयार यूरिया घोल का छिड़काव भूसे पर समान रूप से करना चाहिए, ताकि प्रत्येक भाग अच्छी तरह उपचारित हो सके।
- उपचारित भूसे को कम से कम 3 सप्ताह तक सुरक्षित रखने के बाद ही पशुओं को खिलाना चाहिए।
- फसल कटाई के समय यदि किसान भूसे का चट्टा तैयार करते हैं, तो उसी दौरान उपयुक्त विधि से उपचार कर लेने पर अतिरिक्त श्रम और समय की बचत की जा सकती है।
अतः निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भारत में पशुधन की अधिक संख्या होने के बावजूद संतुलित एवं प्रोटीन युक्त चारे की कमी एक गंभीर समस्या बनी हुई है। ऐसी स्थिति में यूरिया उपचारित भूसा एक सरल, सस्ता एवं वैज्ञानिक समाधान के रूप में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। इससे न केवल भूसे की पौष्टिकता, पाचनशीलता एवं स्वादिष्टता में वृद्धि होती है, बल्कि पशुओं की उत्पादन क्षमता और स्वास्थ्य में भी सुधार होता है। साथ ही, इसके उपयोग से सघन आहार पर निर्भरता कम होती है,
जिससे पशुपालकों की लागत में भी कमी आती है। उचित विधि और सावधानियों के साथ यदि इस तकनीक को अपनाया जाए, तो यह पशुपालन को अधिक लाभकारी एवं टिकाऊ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
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