मछली पालन के लिए तालाब की तैयारी

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  • कृष्ण कुमार यादव, मात्स्यकी महाविद्यालय, महाराणा प्रताप कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर,
  • महेंद्र कुमार यादव, मात्स्यकी महाविद्यालय, गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर

22 फरवरी 2021, भोपाल। मछली पालन के लिए तालाब की तैयारी – मछली हेतु तालाब की तैयारी बरसात के पूर्व ही कर लेना उपयुक्त रहता है। मछली पालन सभी प्रकार के छोटे बड़े मौसमी तथा बारह मासी तालाबों में किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त ऐसे तालाब जिनमें अन्य जलीय वानस्पतिक फसलें जैसे-सिंघाड़ा, कमलगट्टा आदि ली जाती है, वे भी मत्स्य पालन हेतु सर्वथा उपयुक्त होते हैं। मछली पालन हेतु तालाब में जो खाद, उर्वरक, अन्य खाद्य पदार्थ इत्यादि डाले जाते हैं उनसे तालाब की मिट्टी तथा पानी की उर्वरकता बढ़ती है, परिणाम स्वरूप फसल की पैदावार भी बढ़ती है। इन वानस्पतिक फसलों के कचरे जो तालाब के पानी में सडग़ल जाते हैं वह पानी व मिट्टी को अधिक उपजाऊ बनाता है जिससे मछली के लिए सर्वोत्तम प्राकृतिक आहार प्लैंकटान (प्लवक) उत्पन्न होता है। इस प्रकार दोनों ही एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं और आपस में पैदावार बढ़ाने मे सहायक होते हैं। धान के खेतों में भी जहां जून-जुलाई से अक्टूबर-नवम्बर तक पर्याप्त पानी भरा रहता है, मछली पालन किया जाकर अतिरिक्त आमदनी प्राप्त की जा सकती है। धान के खेतों में मछली पालन के लिए एक अलग प्रकार की तैयारी करने की आवश्यकता होती है।


मौसमी तालाबों में मांसाहारी तथा अवाछंनीय क्षुद्र प्रजातियों की मछली होने की आशंका नहीं रहती है तथा बारहमासी तालाबों में ये मछलियां हो सकती है। अत: ऐसे तालाबों में जून माह में तालाब में निम्नतम जलस्तर होने पर बार-बार जाल चला कर हानिकारक मछलियों व कीड़े-मकोड़ों को निकाल दें। यदि तालाब में मवेशी आदि पानी नहीं पीते हैं तो उसमें ऐसी मछलियों को मारने के लिए 2000 से 2500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से महुआ खली का प्रयोग करें। महुआ खली के प्रयोग से पानी में रहने वाले जीव मर जाते हैं तथा मछलियां भी प्रभावित हो कर मरने के बाद ऊपर आती है। यदि इस समय इन्हें निकाल लिया जाये तो खाने तथा बेचने के काम में लाया जा सकता है। महुआ खली के प्रयोग करने पर यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इसके प्रयोग के बाद तालाब को 2 से 3 सप्ताह तक निस्तार हेतु उपयोग में न लाया जावें। महुआ खली डालने के 3 सप्ताह बाद तथा मौसमी तालाबों में पानी भरने के पूर्व 250 से 300 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से चूना डाला जाता है जिसमें पानी में रहने वाली कीड़े-मकोड़े मर जाते हैं। चूना पानी के पीएच को नियंत्रित कर क्षारीयता बढ़ाता है तथा पानी स्वच्छ रखता है। चूना डालने के एक सप्ताह बाद तालाब में 10,000 किलोग्राम प्रति हेक्टर प्रति वर्ष के मान से गोबर की खाद डालें। जिन तालाबों में खेतों का पानी अथवा गाठोन का पानी वर्षा में बहकर आता है उनमें गोबर खाद की मात्रा कम की जा सकती है क्योंकि इस प्रकार के पानी में वैसे ही काफी मात्रा में खाद उपलब्ध रहता है। तालाब के पानी आवक-जावक द्वार मे जाली लगाने के समुचित व्यवस्था भी अवश्य ही कर लें।

मछली का आहार

तालाब में मत्स्य बीज डालने के पहले इस बात की परख कर लें कि उस तालाब में प्रचुर मात्रा में मछली का प्राकृतिक आहार (प्लैंकटान) उपलब्ध है। तालाब में प्लैंकटान की अच्छी मात्रा करने के उद्देश्य से यह आवश्यक है कि गोबर की खाद के साथ सुपर फास्फेट 300 किलोग्राम तथा यूरिया 180 किलोग्राम प्रति वर्ष प्रति हेक्टेयर के मान से डाली जाये। अत: साल भर के लिए निर्धारित मात्रा (10000 किलो गोबर खाद, 300 किलो सुपर फास्फेट तथा 180 किलो यूरिया) की 10 मासिक किश्तों में बराबर-बराबर डालें। इस प्रकार प्रतिमाह 1000 किलो गोबर खाद, 30 किलो सुपर फास्फेट तथा 18 किलो यूरिया का प्रयोग तालाब में करने पर प्रचुर मात्रा में प्लैंकटान की उत्पत्ति होती है।

मत्स्य बीज संचयन

सामान्यत: तालाब में 5000 से 10000 फिंगरलिंग प्रति हेक्टर की दर से संचय करें। यह अनुभव किया गया है कि इससे कम मात्रा में संचय से पानी में उपलब्ध भोजन का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता है तथा अधिक संचय से सभी मछलियों के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं होता। तालाब में उपलब्ध भोजन के समुचित उपयोग हेतु कतला सतह पर, रोहू मध्य में तथा मृगल मछली तालाब के तल में उपलब्ध भोजन ग्रहण करती है।


पालने योग्य मछलियां

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पालने योग्य देशी प्रमुख सफर मछलियों (कतला, रोहू, मृगल ) के अलावा कुछ विदेशी प्रजाति की मछलियां (ग्रासकार्प, सिल्वर कार्प, कॅामन कार्प) भी आजकल बहुतायत में संचय की जाने लगी है। अत: देशी व विदेशी प्रजातियों की मछलियों का बीज मिश्रित मछली पालन अंतर्गत संचय किया जा सकता है। विदेशी प्रजाति की ये मछलियां देशी प्रमुख सफर मछलियों से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं करती है। सिल्वर कार्प मछली कतला के समान जल के ऊपरी सतह से, ग्रास कार्प रोहू की तरह मध्य से तथा कॉमन कार्प मृगल की तरह तालाब के तल से भोजन ग्रहण करती है। अत: इस समस्त छ: प्रजातियों के मत्स्य बीज संचयन होने पर कतला, सिल्वर कार्प, रोहू, ग्रास कार्प, मृगल तथा कॉमन कार्प को 20:20:15:15:15:15 के अनुपात में संचयन किया जाना चाहिए। सामान्यत: मछली बीज पॉलीथिन पैकट में पानी भरकर तथा ऑक्सीजन हवा डालकर पैक की जाती है। तालाब में मत्स्य बीज छोडऩे के पूर्व उक्त पैकेट को थोड़ी देर के लिए तालाब के पानी में रखें। तदपरांत तालाब का कुछ पानी पैकेट के अन्दर प्रवेश कराकर समतापन (एक्लिमेटाइजेेेश्न) हेतु वातावरण तैयार कर लें और तब पैकेट के मछली बीज को धीरे-धीरे तालाब के पानी में निकलने दें। इससे मछली बीज की उत्तर जीविता बढ़ाने में मदद मिलती है।

परिपूरक आहार

मछली बीज संचय के उपरांत यदि तालाब में मछली का भोजन कम है तो चावल की भूसी और सरसों-मंूगफली की खली लगभग 1:1के अनुपात में मछली को भोजन दें। इसे प्रतिदिन एक निश्चित समय पर डालें जिससे मछली उसे खाने का समय बांध लेती है एवं आहार व्यर्थ नहीं जाता है। उचित होगा कि खाद्य पदार्थ को बोरेे में भरकर डंडों के सहारे तालाब में कई जगह बांध दें तथा बोरे में बारीक-बारीक छेद कर दें। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि बोरे का अधिकांश भाग पानी के अन्दर डुबा रहे तथा कुछ भाग पानी के ऊपर रहे। सामान्य परिस्थिति में प्रचलित पुराने तरीकों से मछली पालन करने में जहां 500-600 किलो प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष का उत्पादन प्राप्त होता है वहीं आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से मछली पालन करने से 3000 से 5000 किलो/हेक्टर/ वर्ष मत्स्य उत्पादन कर सकते हैं। आंध्रप्रदेश में इसी पद्धति से मछली पालन कर 7000 किलो/हेक्टर/वर्ष तक उत्पादन लिया जा रहा है।

 

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