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पशु उत्पादन पर सर्द मौसम का प्रभाव

  • डॉ. प्रणय भारती, वैज्ञानिक
    (पशुधन उत्पादन एवं प्रबंधन) , डॉ. विशाल मेश्राम,
    वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख,
  • डॉ. आर. पी. अहिरवार, वैज्ञानिक  मृदा विज्ञान),
  • नील कमल पन्द्रे (उद्यानिकी ), कु. केतकी धूमकेती (गृह विज्ञान)
    कृषि विज्ञान केंद्र, मंडला

25 मार्च 2021, भोपाल । मौसम परिवर्तन के साथ पशुधन प्रबंधन – भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या का पोषण करने में कृषि के साथ-साथ हमारे पशुधन का बहुत बड़ा योगदान रहा है, परन्तु निरंतर हो रहे जलवायु परिवर्तन से तापमान में काफी तबदीली हुई है जिससे भारत ही नहीं, दुनिया भर के पशुधन गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। वातावरणीय तापमान में तीव्र परिवर्तन से जानवरों का स्वास्थ्य, प्रजनन, पोषण इत्यादि प्रभावित होता है, जिससे पशु उत्पाद तथा इनकी गुणवत्ता में भी गिरावट होती है। अन्य जानवरों की तुलना में संकर डेयरी मवेशी जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील होते हंै जिनकी संख्या भारत में अधिक है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ते हुए तापमान, अनियमित मानसून, भयंकर ठंड, ओले, तेज हवा आदि जानवरों के स्वास्थ्य, शारीरिक वृद्धि और उत्पादकता को प्रभावित करते हैं। मौसम में तनाव के कारण डेयरी पशुओं की प्रजनन क्षमता कम हो रही है। परिणामस्वरूप गर्भधारण दर में भी काफी गिरावट हो रही है। जलवायु परिवर्तन प्रतिरक्षा प्रणाली कार्यक्षमता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। इससे थनैला रोग, गर्भाशय की सूजन तथा अन्य बीमारियों के जोखिम में वृद्धि हो रही है। भारत में उष्मीय तनाव पशु उत्पादकता को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख कारक है।

डेयरी गायों से पूर्ण उत्पादकता प्राप्त करने हेतु यह आवश्यक है कि ये स्वस्थ एवं आरामदायक परिस्थितियों में निवास करें। प्रतिकूल पर्यावरणीय परिस्थितियाँ जैसे भयंकर ठंड, ओले, तेज हवा, सर्दी में भीगना आदि पशुओं में तनाव की स्थिति उत्पन्न करता है। कम वातावरणीय तापमान में तेजी से चलने वाली हवा पशुओं के लिए अत्यंत कष्टदायी होती है जो स्वास्थ्य, शारीरिक वृद्धि और उत्पादकता को प्रभावित करता है। जब सर्दियों में तापमान में गिरावट शुरू होती है या जब हमारे पशु 5 डिग्री सेल्सियस के नीचे के तापमान पर पहुँचते हैं, तो गाय की उत्पादकता और दक्षता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ”थर्मोन्यूट्रल जोन” के निम्न सिरे पर, शरीर के मुख्य तापमान को बनाए रखना दुधारू पशुओं के लिए एक बड़ी चुनौती हो सकती है, इसके लिए सामान्य उपचय प्रक्रिया के दौरान शरीर की गर्मी की आपूर्ति हेतु पशु को अपनी उपचय दर बढ़ानी पड़ती है। यह अधिक ऊर्जा के लिए पशु की आहार आवश्यकताओं को बढ़ाता है। शरीर के वजन को स्थिर रखने और उत्पादन की मांग के लिए अधिक ऊर्जा की जरुरत होती है (अत्यधिक ठंड के दौरान 40 प्रतिशत तक) जो अतिरिक्त अनाज सेवन के लिए एक आवश्यकता पैदा करती हैं। अत: फीड सेवन में कोई भी रुकावट शरीर की स्थिति के साथ पशु उत्पादन को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती है। यह सुनिश्चित करें कि गायों के पास पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध हो। पानी सीमित करने से आहार ग्राह्यता सीमित हो जाएगी और गायों को अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना मुश्किल हो जाएगा।

पशु उत्पादन पर ऊष्मीय तनाव का प्रभाव

सभी जानवरों की एक निश्चित दैहिक तापमान सीमा होती है जिसे बरकरार रखना उनकी प्राथमिकता होती है। डेयरी गायों में यह वांछित तापमान तभी तक बरकरार रहता है जब तक वातावरण का तापमान 28-30 डिग्री सेल्सियस तक रहता है। इससे अधिक तापमान इनके लिए तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर सकता है। अत्यधिक तापमान पशुओं की रूमेन कार्य-क्षमता को कम करता है जो कई स्वास्थ्य संबंधित बीमारियों का कारण बनता है। बाहरी गर्मी के साथ-साथ उपचय ऊष्मा से भी शारीरिक ताप उत्पन्न होता है। जैसे-जैसे दुग्ध उत्पादन और पशु की खुराक में वृद्धि होती है, वैसे ही उपचय उष्मा की मात्रा बढ़ती जाती है। उष्मीय तनाव के चलते पशुओं की श्वसन दर 10-30 से बढ़कर 30-60 बार प्रति मिनट तक पहुँच जाती है। पशु हाँफने लगते हैं और उनके मुँह से लार गिरती दिखाई देती है। पशुओं के शरीर में बाइकार्बोनेट तथा आयनों की कमी से रक्त की पीएच कम हो जाती है। उष्मीय तनाव के दौरान पशुओं के शरीर का तापमान 102.5 डिग्री से 103 डिग्री फाहरेनहाइट तक बढ़ जाता है। इन परिस्थितियों में गाय अपने शरीर के तापमान को सामान्य अवस्था में बनाए रखने हेतु खानपान में कमी लाती है जिसके फलस्वरूप दूध उत्पादन, दुग्ध-वसा, प्रजनन क्षमता एवं प्रतिरक्षा प्रणाली में कमी आती है।

उष्मीय तनाव स्तन ग्रंथियों के विकास को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। इसका प्रभाव आगामी दुग्धावस्था में दिखाई देता है। उष्मीय तनाव से प्रभावित गायों को मदकाल प्रदर्शन करने में भी कठिनाई होती है। उष्मीय तनाव के दौरान मदकाल की अवधि छोटी हो जाती है तथा प्रजनन हॉर्मोन के स्राव में असंतुलन, मुख्यत: इस्ट्रोजन हॉर्मोन (जो मद के व्यवहार को प्रभावित करता है) की मात्रा कम हो जाती है। उच्च तापमान वाले वातावरण में गायों के मदकाल अकसर मूक ही रहते हैं और अमदकाल की घटनाएं बढ़ जाती हैं। यदि मद का पता लग भी जाए तो शरीर का तापमान अधिक होने के कारण कई बार पशु गर्भधारण नहीं कर पाता। उष्मीय तनाव बढऩे से निषेचन क्रिया पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जो भ्रूण को क्षति भी पहुँचा सकता है तथा पैदा हुए बछड़े का दैहिक भार सामान्य ताप पर जन्म लेने वाले बछड़ों से कम पाया गया है।

उष्मीय तनाव से बचाव

गर्मियों के मौसम में गायों के बेहतर स्वास्थ्य एवं उत्पादन स्तर को स्थिर रखने के लिए उनकी विशेष देखभाल की आवश्यकता पड़ती है। पशु के परिवेश के तापमान को कम करके उष्मागत तनाव को कम किया जा सकता है। पशुओं हेतु प्राकृतिक व कृत्रिम छाया का प्रावधान सबसे किफायती तरीकों में से एक है। अच्छी तरह डिजाइन किए गए पशु शेड द्वारा गर्मी के प्रभाव को 30-50 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। शेड को पराली से अच्छी तरह ढक दें ताकि वातावरण की उष्णता नीचे खड़े पशुओं तक कम से कम ही पहुँचे। हमें अपने पशुओं के लिए छायादार शेड का निर्माण करें जिसकी छत की ऊंचाई 12 से 14 फीट तक हो। शेड की बनावट पूर्व पश्चिम वाली स्थिति में हो ताकि मई जून के महीने में कम से कम धूप ही अन्दर आए तथा दिसंबर के महीने में पशु को कुछ अधिक धूप मिल पाए।

इसके अतिरिक्त पशु को आराम देने हेतु अन्य तरीकों का इस्तेमाल भी आवश्यक है जैसे फव्वारे, कूलर, मिस्ट पंखे, पानी के टैंक तथा नहलाने आदि की व्यवस्था। पशुशाला में गर्म हवाओं से बचाव के लिए उपलब्ध सामान जैसे जूट या बोरी के पर्दों का उपयोग किया जा सकता है। पशु के आंतरिक वातावरण को संतुलित बनाए रखना भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है। लिहाजा हमें पशु के शरीर में आयन तथा अम्ल व क्षार का संतुलन बनाए रखें। यह संतुलन बनाए रखने के लिए हमें नियमित रूप से पशु को यथासंभव रेशायुक्त आहार दें ताकि अधिक मात्रा में लार स्रावित हो सके। इसके अतिरिक्त प्रतिरोधक घोल या बफर का इस्तेमाल करें। पशुओं को खनिज तत्व जैसे सोडियम 5 प्रतिशत तथा पोटेशियम 1.25 से 1.5 प्रतिशत भी आहार के साथ खिला सकते हैं। गर्मियों में हरे चारे की पैदावार कम हो जाती है, जिसकी कमी पूरा करने के लिए सूखा भूसा भिगोकर तथा उसमें दाना व मिनरल मिश्रण मिलाकर दें। दाने की मात्रा सकल शुष्क पदार्थ ग्राह्यता के 55-60 प्रतिशत से अधिक नहीं हो। गर्मियों में पशुओं की ऊर्जा आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए अधिक ऊर्जायुक्त आहार खिलायें जो आतंरिक उपचय ऊष्मा को नहीं बढ़ाते हैं। इसके लिए अधिक वसा-युक्त आहार (6 प्रतिशत तक ही) दें। ऐसे आहार खिलाने से शारीरिक तापमान में कोई वृद्धि नहीं होती और श्वसन दर भी सामान्य बना रहता है। गर्मियों में पशुओं के लिए हर समय ताजा व स्वच्छ पानी उपलब्ध हो। प्राय: ऐसा देखा गया है कि यदि तापमान 30-35 सेल्सियस तक बढ़ता है तो दुधारू पशुओं में पानी की आवश्यकता 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ जाती है।

निष्कर्ष

भविष्य में जलवायु परिवर्तन तेजी से होने की संभावना है, जो हमारी खाद्य सुरक्षा की समस्या तथा पशुधन आधारित उत्पादों की मांग में वृद्धि कर सकता है। इस मांग को पूरा करने हेतु, हमें अपने जानवरों को उष्मीय तनाव के प्रतिकूल प्रभाव से बचाना होगा और अपनी स्थानीय नस्लों को भी संरक्षित करना होगा। कम उत्पादन क्षमता वाली गायों की तुलना में अधिक दूध उत्पादन करने वाली गायों पर उष्मीय तनाव का प्रभाव अधिक पड़ता है अत: उनके खान-पान और रखरखाव पर अधिक ध्यान दें। हम मौसम को तो नियंत्रित नहीं कर सकते लेकिन गायों पर मौसम के प्रभाव को कम करने हेतु हर संभव प्रयास किए जा सकते हैं।

बेहतर डेयरी प्रबंधन हेतु हम इन तनावों को नजर अंदाज नहीं कर सकते तथा इसके निवारण हतेु निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं।

  • पशुओं को पर्याप्त मात्रा में संतुलित आहार एवं अतिरिक्त चारा प्रदान करें।
  • फफूंदीयुक्त भोजन से बचें।
  • अधिक घास और अनाज खिलाएं, यदि गीले फीड खिलाए जाते हैं, तो यह सुनिश्चित करें कि वे जमे हुए न हों।
  • पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करें।
  • पशुओं हेतु अच्छी तरह डिजाइन किए गए पशु शेड का निर्माण करवाएँ।
  • मोटोराइजड तकनीक द्वारा शेड की छत की ऊँचाई को ऋतु अनुसार नियंत्रित किया जा सकता है।
  • दूध दुहने हेतु एक ही समय निश्चित करें।
  • गायों का धूप में घूमना-फिरना जरूर करवाएँ।
  • गायों के शेड को साफ और सूखा रखें।
  • पशुओं को पर्याप्त आराम व चारा चरने का समय दें।
  • मिनरल मिश्रण तथा वसा-युक्त आहार खिलाएँ।
  • आवश्यकता पडऩे पर पशु चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

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