जब प्याज पर पड़ा पानी, तब सरकार ने सुनी कहानी

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भोपाल। जब पूरा प्रदेश किसानों के असंतोष की आग में झुलस रहा था, तो सरकार राजधानी में उपवास कर अग्निशमन सेवा कर रही थी। पर संवाद नहीं था। एकालाप था। किसानों को शांत करने के कई निर्णय हुए, जो ढोंग ठहराए गए। खैर बीते माह जो खेती-किसानी में हुआ, उस पर कई ग्रंथ, महाकाव्य रचे गए और किसान पुत्र मुख्यमंत्री के माथे ठीकरे फोड़े गये। पर किसानों से बातचीत किसी ने नहीं की। दिखावे बहुत हुए। सरकार के अंर्तचक्षु भी खुल गए कि खेती को लाभ का धंधा बनाने के चक्कर में किसान इसे गले का फंदा बना रहे हैं और अगले चुनाव में कहीं भाजपा सरकार पर रंदा न चला दें। इसलिये सरकार ने नया खटराग अलापना शुरू कर दिया कि किसान भाई खेती छोड़ नौकरी में जाएं, खैर।
बीते शुक्रवार को भोपाल में महत्वपूर्ण किसान संगोष्ठी हुई। मुद्दों पर मंथन हुआ। सरकार ने चिंतन किया। सूत्रों के मुताबिक कार्यक्रम में गुपचुप तरीके से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की किसानों से बतकही हुई। कहा-सुनी हुई। किसानों ने भी बिना किसी लाग-लपेट के सीधे अपनी समस्याएं बताईं। प्रदेश के पूरे 51 जिलों का प्रतिनिधित्व कर रहे 200 से अधिक किसानों ने भाग लिया।
किसानों की मुख्य मांगें थीं- कर्ज माफी नहीं चाहिए, उपज का सही दाम मिलना चाहिए। मंडी में शोषण समाप्त होना चाहिए। फसल बीमा योजना ऐच्छिक होना चाहिए। अनुदान वितरण की अड़चनें, सिंचाई नहर, बिजली, नकली बीज-खाद की जग जाहिर समस्याओं पर भी किसानों ने मुख्यमंत्री का ध्यान आकर्षित किया। इस संगोष्ठी को लाजिमी था, प्रचार तंत्र से दूर रखना। यहां तक कि सरकारी प्रेस नोट भी नहीं जारी किया गया।
कृषि उत्पादन आयुक्त श्री पी.सी. मीना, डॉ. राजेश राजौरा के साथ मंथन में मुख्यमंत्री सचिवालय के शीर्ष अधिकारी सर्वश्री एस.के. मिश्र, विवेक अग्रवाल, अशोक वर्णवाल भी थे। पर किसानों के हमदर्द कृषि मंत्री प्रमुखता से गैर हाजिर थे। क्या सरकार ने भी उनको सुनना बंद कर दिया है। किसानों की पीड़ा, परेशानी, दूर करने की सरकार की यह गंभीर पहल दिखती है। मरीज से पूछ तो लो, तकलीफ क्या है? बिना सुने, नजरिया इलाज तो नासूर ही बनता है।
उम्मीद है इस मंथन के सकारात्मक परिणाम निकलेंगे जो फौरी तौर पर किसानों को राहत देंगे और दीर्घकाल में पुन: खेती को प्रतिष्ठापित करेंगे।

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