सोयाबीन फसल के महत्वपूर्ण कीट एवं उनका प्रबंधन

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सोयाबीन फसल के महत्वपूर्ण कीट एवं उनका प्रबंधन

तना मक्खी :-

पहचान चिन्ह:-
1. वयस्क मक्खी छोटे आकार 2 मि.मी. की चमकदार काले रंग की होती है जून से अप्रैल माह में सक्रिय रहती है।
2. इसके पैर श्रृंगिकाए तथा पंखों की शिरायें हल्के भूरे रंग की होती है।
3. ग्रसित तनों को चीरने पर तना खोखला दिखाई देता है मध्य भाग गहरा लाल या भूरे रंग का हो जाता है।
4. इसकी इल्ली जिसे मेगट कहते हैं हल्के सफेद रंग की बेलनाकार होती है जिसकी लंबाई 2 मी.मी.होती है।
5. मेगट का आकार अग्र भाग जिसमें मुखांग होते हैं नुकीला तथा पश्चात भाग गोल तथ चपटा होता है
6. शंखी तने के अंदर ही बनती है जिसका रंग भूरा तथा लंबाई 2-3 मी.मी. होती है।

क्षति लक्षण:-
1. इस कीट की इल्ली अवस्था ही हानिकारक होती है।
2. नव विकसित मेगट पत्तियों के डठंलों से तने के अंदर घुसती है और टेढी, मेढ़ी बनाती है।
3. ग्रसित पौधों में प्रारंभ में पत्तियों की ऊपरी सतह भाग सूख जाता है।
4. इसकी शंखी भी तने के अंदर ही बनती है अत: छिद्र का उपयोग मक्खी पौधे के बाहर निकलने में करती है।
5. यह कीट सोयाबीन की संपूर्ण अवधि तक सक्रिय रहता है।

नियंत्रण:-
1. एक ही खेत में लगातार सोयाबीन की फसल ले। फसल चक्र अपनाने से इस कीट की संख्या में प्रभावी रूप से कमी देखी जा सकती है
2. बुवाई के समय फोरेट 10 प्रतिशत दानेदार दवा या कार्बोफ्यूरॉन 3 प्रतिशत दानेदार दवा 1.5 कि.ग्रा.सक्रिय तत्व एक हेक्टयर की दर से कुंडो में डालें या बोने के 20-25 दिनों बाद उपरोक्त कीटनाशक कतारों के किनारों पर डालकर हल चला देे।
3. रासायनिक नियंत्रण हेतु क्विनालफॉस 25 ई.सी.800मि.ली.पानी में घोलकर प्रति हे. छिड़काव करें।
4. कटाई के पश्चात फसल के शेष डठंलों को जलाकर नष्ट किया जा सकें्र।
5. जैविक नियंत्रण के लिय प्रेयिंग मेंटिड क्रायसोपर्ला कॉक्सीनेलीड बीटल को फसल में छोड़ देना चाहिये।
6. बेलीलस थुरेन्जेनासिस, बेसिलस बेसियाना 1किलो या 1 ली. 1हे. 30-40 या 50-55 दिन बुवाई के बाद छिड़काव करना चाहिये।
7. लाईट ट्रेप का उपयोग करना चाहिये।
8. जेएस 93.05, जेएस.71.05 जैसी किस्मों का उपयोग करना चाहिए।

गर्डल बीटल

पहचान चिन्ह:-

1. वयस्क भृंग 7 से 10 मि.मी.लंबा तथा मटमैले भूरे रंग का होता है।
2. इसके अग्र पंखों का आधा भाग गहरे हरे रंग का नर में तथा एक तिहाई भाग मादा में होता है।
3. मादा वयस्क द्वारा अण्ड निक्षेपण हेतु मुख्य तने पर सामांतर चक्र या गर्डल बनाये जाते है उस स्थान पर ऊपर का भाग सूखकर मुरझा जाता है इससे इस कीट की पहचान खेत मेें की जा सकती है।
4. इल्ली या ग्रब पीले रंग की 19-20 मि.मी.लंबी होती है ग्रब का शरीर उभरा हुआ होता है।

क्षति लक्षण:-
1. जून-जुलाई में सक्रिय अक्रमण करते हैं।
2. अण्डे पीले रंग के होते है जो दाने के आकार के होते है। अण्डे 3-4दिन मेे फूटते हैं।
3. जीवन चक्र 17-42 दिन का होता है।
4. शरीर उभरा हुआ होता है।

नियंत्रण:-
1. ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें जिसमें भूमि में सुषुप्तावस्था में पड़ी इल्लियां भूमि की सतह पर आ जाये ओर धूप के कारण नष्ट हो जाये।
2. फसल के शेष अवशेष को जलाकर नष्ट करें ताकि पड़ी उसमें शंखीयों को नष्ट किया जा सके।
3. सहिष्णु किस्मे जैसे जेएस 93.05, जेएस 71.05 जैसी किस्मो का उपयोग करना चाहिये।
4. 70-100कि.ग्रा.बीज पर रखना चाहिए।
5. खेत के चारों और ढेंचा नामक हरी फसल को लगाये जो गर्डल बीटल को अपनी ओर आकर्षित कर सोयाबीन फसलों में होने वाली हानि को कम करने में उपयोगी हो।
6. लाईट ट्रेप का उपयोग करे।
7. नीम का घोल उपयोग में ले सकते हैं।
8. रासायनिक नियंत्रण हेतु ट्राइजोफॉस 800 मि. ली. 1 हे. या इथोफेनप्राक्स 1ली. 1 हे.से छिड़काव करें।

सेमी लूपर:-

पहचान चिन्ह –
1. हरे सेमीलूपर सोयाबीन की फसल में अगस्त से सितम्बर के माह में आक्रमण करते है।
2. वयस्क हरे रंग के होते है जिस पर कोणीय बंध होते है अग्रपंख में ।
3. नवीन विकसित लार्वा हल्के हरे रंग के होते है। जिस पर कोमल उतक शिराओं पर उपस्थित होते है।
4. पंख विन्यास 30 मि.मी. होता है।
5. शरीर का आकार ”8” की आकृति का होता है।
6. तीन जोड़ी उदर अग्रपाद होते है।
7. समीलूपर की पूर्ण अवस्था लगभग 35 मि.मी. लंबी तथा 44 मि.मी. चौड़ी होती है।

नियंत्रण:-
1. जैविक नियंत्रण में इल्लियों की शुरूआती अवस्था में बैसिलस थुरिजिंएसिस ब्लूबेरिया बेसियाना 1ली.या 1कि.प्रति हे.के हिसाब से छिड़काव करें।
2. यह संभव न होने पर काईटिन इनहिबिटर जैसे डायफ्लूबेन्जूरान 25 डब्ल्यू.पी. 300 से 400 ग्रा.1हे. या ल्यूफेनरान 5ई.सी.400 – 600 मि.ली.1हे. का छिड़काव करेें।
3. क्लोरोपायरीफॉस 20ई.सी.का 1.5ली. 1हे. का प्रयोग करें।
4. छिड़काव करते समय उपर्युक्त रसायन के साथ प्रति हे. क्षेत्र में कम से कम 750 ली. पानी का उपयोग करेे।
5. लाईट ट्रेप आदि का उपयोग करेें।

क्षति लक्षण:-
1. इस कीट की इल्लियां पौधों की पत्तियों का खाकर नुकसान पहुॅचाती है।
2. अधिक प्रकोप होने पर यह कोमल प्ररोहों कलियों एवं पत्तियों की नसों को छोड़कर शेष सभी हरे भागो को खाकर नष्ट कर देती है।

तम्बाकू इल्ली:-

पहचान चिन्ह –

1. यह एक बहुभक्षी कीट है इस कीट की पतंगों का पंख का विस्तार 40 मी.मी.तथा लंबाई 22 मी.मी.होती है।
2. इसके अगले पंख सुनहरे एवं धूसर भूरा रंग लिए होते है तथा पिछला पंख सफेद होते है।
3. इस खेत की कीट की सूण्डी 3.5 से 4 से.मी.लंबी हरे भूरे कलर की होती है।
4. शरीर पर भूरे रंग के धब्बे तथा आड़ी तिरछी व लंबी पट्टियांं होती है।
5. इल्ली की पीठ पर दोनो ओर एक एक तथा निचले भाग में दोनों ओर पीली धारियांं होती है।

क्षति लक्षण:-
1. कीट की सूण्डी फसल का नुकसान पहुंचाती है।
2. प्रारंभ में झुण्ड में सूण्डियों एक साथ पत्तियों को काटने व चबाने के मुखांगों से काटकर क्षति पहुुंचाती है।
3. कभी ये कलियों फूलों तथा फसलों का भी नुकसान पहुंचाती है।

नियंत्रण:-
1. फसल कटने के बाद गहरी जुताई करें।
2. अण्डों के गुच्छों को पत्तियों के सहित तोड़कर नष्ट कर देना चाहिये।
3. प्रकाश पॉश एंव फेरोमान पॉश का प्रयोग करना चाहिए। ताकि वयस्क कीटो को नष्ट किया जा सके।
4. एन.पी.वी. न्यूक्लियर पोलीहैडोसिस वायरस 250 एल.ई.250 सूंडी के बराबर के घोल को प्रति हे.छिड़काव करेे। द्य ट्रायजोफॉस, क्लोरोपायरीफॉस 25 ई.सी. का प्रयोग करना चाहिए।

सफेद मक्खी:-

पहचान चिन्ह –
1. वयस्क सफेद मक्खी लगभग 1.5 मि.मी.लंबाई युक्त होती है।
2. जिसके पंख सफेद एंव शरीर पीला जिस पर सफेद मोमीया पाउडर की सतह होती है।
3. पौधों की पत्तियों पर नीचे की सतह पर पाये जाते है। थोड़ी सी आहट पाकर उडऩे लगते है।
4. इसके मुखांग रस चूसने वाले होते हैं।

क्षति लक्षण:-
1. इस कीट के शिषु तथा वयस्क दोनों ही हानिकारक होते हैं।
2. यह कीट मधुरस भी उत्सर्जित करता है जिस पर काली फफूंद विकसित हो जाती है।
3. ग्रसित पौधों की पत्तियां कमजोर व पीली पड़ जाती है।
4. 10-12 पीढ़ी होती है प्रतिवर्ष

नियंत्रण:-
1. फसल चक्र अपनाये।
2. जल निकास की उचित व्यवस्था करेें।
3. मिथाईल डेमेटान 25 ई.सी.का छिड़काव करें।
4. खाद व उर्वरक का संतुलन बनाये रखे।

हैलीकोवरपा आर्मीजेरा:-

पहचान चिन्ह:-
1. नव विकसित इल्ली हरे रंग की होती है पूर्ण विकसित इल्ली 35 मि.मी.लंबी हरे रंग की होती है।
2. इसका पंख विस्तार 30-40 मि.मी.होता है अग्रपंख पीली भुरे रंग के तथा इनके किनारे काले होते है
3. इसमें अग्रपाद पाये जाते है।

क्षति लक्षण:-
1. यह कीट सुंडी हानिकारक होती है जो फसल पर जून से जुलाई तक सक्रिय रहती है।
2. इल्ली प्रारंभ में कोमल टहनियों को खाती है। तथा फली अवस्था में फलियों को खाती है।
3. इसके वयस्क कीट मानसून शुरू होने पर अंडे का निरोपण करते है।

नियंत्रण:-
1. फसल की बुवाई समय पर करना चाहिये।
2. ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करनी चाहिए ।
3. 50 परभक्षी पक्षियों का फली अवस्था में फसल में छोड़ देना चाहिए।
4. प्रोफेनोफॉस 50ई.सी./ 1500 मि.ली. प्रति हेक्टेयर का छिड़काव करना चाहिए।

रेड हेरी केटरपिलर/ कामलिया कीट :-

पहचान चिन्ह:-
1. वयस्क षलभ मध्यम आकार का मजबूत शरीर वाला होता है।
2. इसके अग्र पंख सफेद रंग के होते है जिनकी किनारों पर लाल धारी होती है।
3. पश्च पंख भी सफेद रंग के होते है जिनके पर काले रंग के चार धब्बे होते है।
4. वयस्क का उदर लाल रंग का होता है जिस पर काली बिन्दियां पायी जाती है।
5. इल्लियां अपनी पूर्ण विकसित अवस्था में गहरे भूरे रंग की होती है इनका पूरा शरीर बालों से ढंका होता है उदर के प्रथम खण्ड पर पुष्ट की सतह पर दो काले धब्बे होते है।

क्षति लक्षण:-
1. इस कीट की रूयेदार सुंडी हानिकारक होती है जो अपने काटने चबाने वाले मुखांग से पत्तियों और पौधों के कोमल भागों को खाती है।
2. वयस्क मादा पत्तियों के निचले सतह तक अंडे देती है अंडे खसखस के दानों के समान हल्के पीले रंग के होते है जो कि पकने पर काले रंग के हो जाते हैं।
3. यह साधारणत: तीन चार दिन में फूटते हैं।
4. जून मानसून से प्यूपा सक्रिय होता है उसमें वयस्क पंखी बाहर आती है।
5. एक वर्ष मे एक पीढी होती है इसमे पूर्ण रूपांतरण पाया जाता है।

नियंत्रण:-
1. अंड समूहो को और सुंडीयों को हाथ से एकत्रित कर केरोसिन मिश्रित पानी में डालकर नष्ट करना चाहिये।
2. एक खेत व दूसरे खेत के बीच नाली बनाकर केरोसीन तेल डालकर नियंत्रित कर सकते है।
3. ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करे।
4. ट्राईजोफॉस 40 ई.सी 800 मि.ली./हेक्टेयर का छिड़काव करें।
5. नीम के तेल का उपयोग कर इल्लियों को नष्ट करे।
6. फसल चक्रण अपनाये।
7. बेसिलस थुरेंजिंएसिस या ब्लूबेरिबेसियाना 1ली.या 1किलो ग्राम प्रति हे.के हिसाब से छिड़काव करे।
8. एन.पी.वी. 250 एलई को प्रति हे.से छिड़काव करे।

ब्लू बीटल:-

पहचान चिन्ह:-
1. इस कीट का वयस्क चमकदार हरे तथा भूरे तांबिया रंग के पंख होते है।
2. जिसकी लंबाई 3 से 8 इंच की होती है।
3. पांच छोटे छोटे सफेद रंग के कवर उदर की आखिरी भाग पर होती है।
4. बीटल की चार अवस्था होती है पूर्ण रूपांतरण पाया जाता है।
5. अंडे छोटे सफेद रंग के तथा आकार के होते है।
6. लार्वा वी आकार का होती है जो कि उदर पर दिखाई देती है।
7. मई जून में आक्रमण करती है।
8. नर छोटा होता है मादा की अपेक्षा अंड निरोपण मृदा में होता है मादा एक वर्ष में 600 अंडे देती है।
9. ग्रब सबसे ज्यादा क्षति पहुंचाता है।

नियंत्रण:-
1. खेत में बेसिलस पोपीली का छिड़काव फसल की दूधिया अवस्था में करना चाहिए।
2. नेमेटोड हेटेरोराबिडिटिस बेक्टीरियोफॉरा को प्रयोग कर जैविक नियंत्रण करना चाहिए।
3. फसल चक्रण अपनाना चाहिए। द्य ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करके कीटो का नियंत्रण कर सकते है।

ग्रासहॉपर :-

पहचान चिन्ह:-
1. प्रौढ़ टिड्डा हरे पीले रंग का 35 से 50 मि.मी.का लंबा होता है।
2. इसके अग्र वक्ष के पाश्र्व में तीन लंबवत् काली रेखाएं होती है
3. इनके मुखांग काटने चबाने वाले तथा श्रृंगिकाए शुण्डीकार होती है।
4. इनकी पिछले टांग उछलने के लिए लंबी होती है टीबीयां नीले रंग की होती है

क्षति लक्षण:-
1. इस कीट के शिषु एंव वयस्क दोनों ही हानिकारक होती है। विशेषत: शिषु अधिक हानि करते हैं।
2. इनका आक्रमण अगस्त से सितम्बर में अधिक होता है।
3. इसके आक्रमण 20 से 30 प्रतिशत तक पौधे की क्षति होती है।
4. इसमें अपूर्ण रूपांतरण पाया जाता है।
5. वयस्क का जीवनकाल 21 से 31 दिन का होता है।

नियंत्रण:-
1. गहरी जुताई करें।
2. मानसून के शुरू होते ही प्रकाश प्रपंच लगाने से इनकी संख्या कम हो जाती है।
3. निम्फ को जलाकर नष्ट कर देना चाहिये।
4. ट्राईजोफॉस 40 ई.सी.800 मि.ली.तथा क्लोरोपायरिफॉस 25 ई.सी.का प्रयोग करना चाहिए।

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