पौध संरक्षण रसायनों की खपत कम क्यों ?

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देश व प्रदेश के किसान पौध संरक्षण के प्रति उदासीन हैं। इस कारण देश में पौध संरक्षण रसायनों की खपत मात्र 0.6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। एशिया महाद्वीप के अन्य देशों में यह खपत जापान में 12.0 किलो, चीन में 13.0 किलो तथा ताइवान में 17.0 किलो प्रति हेक्टेयर है। देश में पौध संरक्षण रसायनों की खपत का बहुत बड़ा भाग अमानक कृषि रसायनों का रहता है जो फसल सुरक्षा कर कृषि उत्पादन में अपना कोई योगदान नहीं देते हैं परन्तु इनका उपयोग करने वाले किसानों की आर्थिक दशा को और कमजोर बना देते हैं। इसके साथ-साथ ये अमानक रसायन कीटों में इन रसायनों के प्रति प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने में भी योगदान करते हैं क्योंकि इन रसायनों में सक्रिय पदार्थ की मात्रा कम रहती है जो कीटों में प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने में सहायक होती है। इन अमानक कीट रसायनों के सस्ते होने के कारण कभी-कभी वृहद क्षेत्र में उपयोग होने से कीट नियंत्रित न होने के कारण पूरी फसल नष्ट होने की परिस्थितियां बन जाती है जैसा कि पिछले वर्ष पंजाब में अमानक कीटनाशकों के उपयोग के कारण 3 लाख 32 हजार हेक्टेयर में उगाई गई कपास की फसल कीटों के प्रकोप के कारण नष्ट हो गयी थी जिसके लिए पंजाब सरकार को 673 करोड़ रुपये मुआवजे के तौर पर किसानों को देने पड़े थे। देश को यह नुकसान रसायन, उत्पादन व विदेशी मुद्रा के तौर पर कई गुना उठाना पड़ा। अमानक कृषि रसायनों के उत्पादन, बिक्री आदि में प्रतिबंध लगाने में सरकारें अभी भी उदासीन दिखाई दे रही है। इन पर प्रतिबंध के लिए कोई ठोस उपाय अपनाये जाने की कोई आधार रूप में नहीं दिखाई दे रही है। यदाकदा कृषि रसायनों के नमूने फेल होने के समाचार सुनाई देते हैं, परन्तु उन पर की गई कार्यवाही की सूचना सार्वजनिक नहीं हो पाती है। इन परिस्थितियों में सामान्यत: देश व किसान के हित को न देखकर उत्पादन तथा विक्रेता के हितों को प्राय: देखा जाता है। यदि यही परिस्थितियां बनी रही तो पंजाब के किसानों के पिछले वर्ष के आंदोलन की स्थिति अन्य प्रदेशों में भी बन जाये तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा। अमानक कीटनाशकों से किसान को भी दूर रहना होगा। उसे उपयोग में लाये जाने वाले प्रत्येक कृषि रसायन के प्रभाव व उपयोगिता का आकलन करना होगा, अन्यथा इसके परिणाम उसे ही भुगतने होंगे। राज्य सरकारों को भी अमानक कृषि रसायनों के उत्पादन तथा बिक्री पर लगाम लगाना होगी ताकि कृषि रसायनों के प्रति किसान का विश्वास बढ़ सके और वह भी जापान चीन की तरह इन का उपयोग कर फसलों की उत्पादकता बचा सकें।

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