डीएससी के एकीकृत जल प्रबंधन से बदल रही तस्वीर

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हरी-भरी पहाडिय़ां और तीन-तीन फसलें

(मनीष पाराशर)

इंदौर। महू तहसील का पहाड़ी क्षेत्र नवंबर-दिसंबर माह की सर्दी बीतते-बीतते सूखा बयड़ा और पथरीली पहाड़ी का रूप धर लेता था। जिस मृदा में पानी की बूंदें नहीं, वहां कैसी हरियाली। आज यहां सब कुछ बदला-सा है। एक रपटे पर कपड़े धोती श्रीमती जमुनाबाई बताती हैं कि हमारा परिवार तीसरी फसल भी ले रहा है, क्योंकि पानी आसानी से मिलने लगा है।
9 गांवों में रोका पानी- एकीकृत जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन कार्यक्रम 02 के तहत कार्पोरेट पार्टनर आईटीसी लि. के माध्यम से डेवलपमेंट सपोर्ट सेंटर (डीएससी) के टीम लीडर श्री विनयकुमार त्रिपाठी बताते हैं मेहंदीकुंड, बडग़ोंदा, मलेंडी एवं तिंछा जैसे यहां के 9 गांवों में पानी रोको अभियान ने तस्वीर बदल दी है। हमने 6 नालों का चयन किया, जहां बरसाती पानी व्यर्थ बह जाता था। अलग-अलग 23 स्थानों पर स्टापडेम, चेकडेम, रपटे आदि संरचनाओं का निर्माण किया। ऐसे सैकड़ों किसान हैं, जो एकीकृत जलग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम 02 के तहत इन गांवों में 5 हजार हे. रकबे में सिंचाई कर भरपूर उत्पादन ले रहे हैं।
आधारभूत सुविधाओं पर ध्यान- डीएससी के श्री अमितमणि त्रिपाठी बताते हैं योजना के लिए बंजर जमीन की अधिकता, अत्यधिक भूक्षरण, पेयजल की कमी, भूगर्भीय जल का अतिशय उपयोग, रोजगार एवं सिंचाई सुविधाओं का अभाव जैसे तथ्यों पर ध्यान दिया जाता है।
क्या कहते हैं किसान- किसान श्री रामजीलाल डाबर ने कृषक जगत को बताया पहले हम नलकूप या कुओं पर आधारित थे। छोटे-छोटे डेम बनने से हमें पानी आसानी से मिल रहा है। वहीं तिंछा के श्री गोपालजी राठौर ने बताया पानी की सुलभता है, इसकी शुद्धता और कृषि तकनीकी पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
इनका कहना है-जिला पंचायत इंदौर जिला वाटरशेड सेल सह डाटा सेंटर के जिला परियोजना अधिकारी डॉ. के.एस. गर्ग के अनुसार बरसात आधारित क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर अकाल जैसी स्थिति को टालना तथा रोजगार अवसर बढ़ाकर यहां के बाशिंदों का सामाजार्थिक विकास करना वाटरशेड मिशन का उद्देश्य है। स्थानीय निवासियों के सहयोग से इसमें हमें सफलता मिल रही है।

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