कोयंबटूर के वल्लुवन ने घाटे के नारियल बागान को बनाया मल्टी-क्रॉप मॉडल, अब ₹3 लाख प्रति एकड़ आय
22 सितंबर 2026, कोयंबटूर: कोयंबटूर के वल्लुवन ने घाटे के नारियल बागान को बनाया मल्टी-क्रॉप मॉडल, अब ₹3 लाख प्रति एकड़ आय – कभी सिर्फ नारियल की मोनोकल्चर खेती में हर साल घाटा उठाने वाले किसान वल्लुवन आज उसी जमीन पर 14 से ज्यादा फसलें उगाकर सालाना ₹2.5 से 3 लाख प्रति एकड़ तक कमा रहे हैं। कोयंबटूर जिले के वडावल्ली क्षेत्र में रहने वाले 58 वर्षीय वल्लुवन की यह कहानी परंपरागत बागवानी से मल्टी-लेयर एग्रोफॉरेस्ट्री की ओर बढ़ने की मिसाल बन गई है।
वल्लुवन ने 7 एकड़ से शुरुआत कर आज अपनी खेती को 26 एकड़ तक फैला लिया है। पहले सिर्फ नारियल के पेड़ लगाकर खेती करने पर उन्हें हर पेड़ पर करीब ₹500 खर्च के मुकाबले सिर्फ ₹300 की वापसी मिलती थी, यानी हर साल सिर्फ ₹30,000 प्रति एकड़ की मामूली और घाटे वाली आमदनी होती थी।
मोनोकल्चर से मल्टी-लेयर खेती तक का सफर
साल 2009 में लगातार हो रहे घाटे से परेशान होकर वल्लुवन ने अपनी खेती का तरीका पूरी तरह बदलने का फैसला किया। उन्होंने नारियल के पेड़ों के नीचे केले की 7 अलग-अलग किस्में, काली मिर्च, हल्दी, जिमीकंद और करी पत्ता जैसी दर्जनों फसलें एक साथ उगानी शुरू कीं।
आज उनके खेत में 30 से ज्यादा प्रजातियों के पेड़-पौधे और कुल मिलाकर 14 से अधिक फसलें एक ही जमीन पर एक-दूसरे के साथ उगाई जा रही हैं। इस बदलाव का असर सिर्फ आय पर ही नहीं, बल्कि मिट्टी की सेहत पर भी दिखा है — जैविक कार्बन की मात्रा शुरुआती करीब 0.5 प्रतिशत से बढ़कर अब कई गुना ऊपर पहुंच चुकी है।
नारियल की पैदावार भी इस बदलाव से घटी नहीं बल्कि बढ़ी है। पहले जहां हर पेड़ से औसतन 100 नारियल मिलते थे, वहीं अब यह आंकड़ा 160 फल प्रति पेड़ तक पहुंच गया है।
सूखे से निपटने की तैयारी और मान्यता
साल 2017 में कोयंबटूर क्षेत्र में भीषण सूखा पड़ा और भूजल स्तर 1,000 फीट से भी नीचे चला गया। इस मुश्किल दौर में वल्लुवन ने मल्चिंग, वर्षा जल संचयन के लिए गड्ढे बनाने और पौधों की कई परतों का सहारा लेकर पानी की खपत को पहले के मुकाबले दसवें हिस्से तक घटा दिया।
वल्लुवन बताते हैं, “पहले जब मैं सिर्फ नारियल के पेड़ उगाता था, तो मुझे घाटा होता था। लेकिन जैविक, मल्टी-लेयर और मल्टी-क्रॉप खेती अपनाने के बाद अब मैं सिर्फ एक एकड़ से औसतन ₹2.5 लाख से ₹3 लाख सालाना कमा रहा हूं।”
उनकी इस उपलब्धि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की “सॉइल हेल्थ गार्जियंस” प्रतियोगिता में वल्लुवन को तीसरा पुरस्कार मिला, और वे इस सूची में जगह बनाने वाले इकलौते भारतीय किसान हैं।
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