नीलक्रांति योजना से बदली छिंदवाड़ा जिले के असलम खान की तक़दीर
5 करोड़ तक पहुंचा मत्स्य बीज उत्पादन, 8 लाख हुई वार्षिक आय
12 जनवरी 2026, छिंदवाड़ा: नीलक्रांति योजना से बदली छिंदवाड़ा जिले के असलम खान की तक़दीर – जिले के विकासखण्ड जामई के ग्राम दातला निवासी श्री असलम खान आज जिले में मत्स्यबीज उत्पादन के क्षेत्र में एक सफल एवं प्रेरणादायी उद्यमी के रूप में पहचाने जाते हैं। लेकिन यह सफलता उन्हें सहज ही नहीं मिली। इसके पीछे उनका संघर्ष, मेहनत और सरकारी योजनाओं का सही उपयोग छिपा है।
पूर्व में श्री असलम खान वर्षा ऋतु के दौरान नदियों एवं तालाबों से अंडे वाली मछलियाँ एकत्र कर पारंपरिक (देशी) पद्धति से मत्स्यबीज उत्पादन करते थे। सीमित संसाधनों और तकनीकी ज्ञान के अभाव में उनका उत्पादन बहुत कम होता था। परिणामस्वरूप वे प्रतिवर्ष केवल 20 से 50 लाख मत्स्यबीज ही तैयार कर पाते थे, जिससे उनकी वार्षिक आय मात्र ₹40,000 से ₹50,000 तक सीमित रह जाती थी। वर्ष 2018 में उन्होंने मत्स्य विभाग से संपर्क किया और मत्स्य विभाग छिंदवाड़ा के माध्यम से भारत सरकार की नीलक्रांति योजना के अंतर्गत मत्स्य बीज उत्पादन इकाई की स्थापना के लिए आवेदन किया। योजना के अंतर्गत उन्हें ₹25.00 लाख की इकाई लागत पर ₹10.00 लाख का अनुदान स्वीकृत हुआ। इसके बाद उन्होंने अपनी निजी भूमि पर आधुनिक एवं वैज्ञानिक तकनीकों से युक्त मत्स्य बीज उत्पादन इकाई की स्थापना की।
नई तकनीकों को अपनाने और वैज्ञानिक पद्धति से कार्य करने का परिणाम यह हुआ, कि जहाँ पहले उनका उत्पादन सीमित था, वहीं अब वे प्रतिवर्ष 4 से 5 करोड़ मत्स्यबीज का उत्पादन करने लगे हैं। उत्पादन में इस अभूतपूर्व वृद्धि से उनकी आय में भी उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई है। वर्तमान में श्री असलम खान प्रतिवर्ष ₹6.00 से ₹8.00 लाख तक की शुद्ध आय अर्जित कर रहे हैं। आर्थिक समृद्धि के साथ-साथ उनकी इकाई ने सामाजिक विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस मत्स्यबीज उत्पादन इकाई के माध्यम से स्थानीय स्तर पर 10 से 15 लोगों को स्थायी एवं अस्थायी रोजगार उपलब्ध हो रहा है, जिससे ग्रामीण आजीविका भी सुदृढ़ हुई है। श्री असलम खान की यह इकाई आज न केवल उनकी सफलता की कहानी है, बल्कि क्षेत्र के अन्य मत्स्य कृषकों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बन चुकी है। उनकी यह सफलता की कहानी यह संदेश देती है कि यदि परंपरागत कार्यों को आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं के सहयोग से किया जाए, तो ग्रामीण क्षेत्रों में भी आर्थिक उन्नति और आत्मनिर्भरता संभव है।
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