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राज्य कृषि समाचार (State News)

रीवा: धान, रागी और दलहन में पत्ती लपेटक कीट का प्रकोप, वैज्ञानिकों ने बताए बचाव के उपाय

04 अक्टूबर 2026, भोपाल: रीवा: धान, रागी और दलहन में पत्ती लपेटक कीट का प्रकोप, वैज्ञानिकों ने बताए बचाव के उपाय – मध्य प्रदेश के रीवा जिले के गंगेव ब्लॉक के कई गांवों में धान, रागी और दलहनी फसलों में पत्ती लपेटक कीट (लीफ फोल्डर) का प्रकोप देखा गया है। कृषि वैज्ञानिकों की टीम ने खेतों का दौरा कर किसानों को इससे बचाव के उपाय बताए।

वैज्ञानिकों की यह टीम गंगेव ब्लॉक के राजहा, बेलवा कुर्मियान, बेलवा बरदगवां और देवास गांवों में पहुंची, जहां धान के साथ-साथ रागी, अरहर, उड़द और मूंग की फसलों का भी निरीक्षण किया गया।

कैसे पहचानें इस कीट का प्रकोप

पत्ती लपेटक कीट की इल्ली पौधे की पत्तियों को आपस में लपेट लेती है और उसके भीतर छिपकर पत्ती की हरी सतह को खुरचकर खाती है। इससे पत्तियों में प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया बाधित हो जाती है, जिसका सीधा असर पैदावार पर पड़ता है।

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खेतों के दौरे के दौरान मौजूद रहे कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एल. वर्मा ने किसानों को बताया कि फसल की नियमित निगरानी कर प्रकोप के शुरुआती लक्षण दिखते ही नियंत्रण के उपाय शुरू कर देना चाहिए।

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किन दवाओं का करें छिड़काव

वैज्ञानिकों ने किसानों को कई दवाओं में से किसी एक के इस्तेमाल की सलाह दी है। इंडोक्साकार्ब 14.5 एससी या 15.8 ईसी का 15 लीटर पानी में 15 से 20 मिलीलीटर घोल बनाकर छिड़काव किया जा सकता है।

इसके अलावा इमामेक्टिन बेंजोएट 5 प्रतिशत का 15 लीटर पानी में 10 से 12 ग्राम घोल बनाकर भी छिड़काव किया जा सकता है। गंभीर प्रकोप की स्थिति में फ्लूबेंडियामाइड 8.33 प्रतिशत और डेल्टामेथ्रिन 5.56 प्रतिशत के मिश्रण का 15 लीटर पानी में 12 मिलीलीटर घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी गई है।

वैज्ञानिकों ने यह भी सुझाव दिया कि एक ही दवा का बार-बार इस्तेमाल करने से कीट में उस दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता बन सकती है, इसलिए समय-समय पर दवा बदलते रहना चाहिए।

दौरे में कृषि विस्तार अधिकारी शिवशरण सरल, आत्मा परियोजना के तकनीकी प्रबंधक दीपक कुमार श्रीवास्तव और कृषि विस्तार अधिकारी बबीता साकेत व युगल किशोर प्रधान भी मौजूद रहे। टीम ने किसानों को संतुलित खाद प्रबंधन, मिट्टी की सेहत बनाए रखने और फसल विविधिकरण को लेकर भी जानकारी दी।

नमी ज्यादा रहने से बढ़ा प्रकोप

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक पिछले कुछ दिनों से इलाके में नमी ज्यादा बने रहने और बादलों के छाए रहने की वजह से पत्ती लपेटक कीट का प्रकोप तेजी से फैला है। ऐसे मौसम में इल्लियों की संख्या जल्दी बढ़ती है, इसलिए शुरुआती लक्षण दिखते ही नियंत्रण जरूरी हो जाता है।

वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी कि वे खेत की नियमित निगरानी करें और अगर पत्तियां मुड़ी हुई या सफेद धारीदार नजर आएं, तो समझ लें कि कीट का प्रकोप शुरू हो चुका है। ऐसी स्थिति में बिना देर किए सिफारिश की गई दवाओं का छिड़काव करना चाहिए।

रसायन के साथ जैविक उपायों पर भी जोर

छिड़काव के अलावा वैज्ञानिकों ने किसानों को कुछ जैविक उपाय अपनाने की भी सलाह दी। उनका कहना है कि खेत की मेड़ों और आसपास की घास-फूस की सफाई रखने से कीट के छिपने और पलने की जगह कम हो जाती है।

इसके साथ ही खेत में पक्षियों के बैठने के लिए टी-आकार की खूंटियां (बर्ड पर्चर) लगाने से भी इल्लियों को खाने वाले पक्षी खेत की ओर आकर्षित होते हैं, जिससे प्राकृतिक तरीके से भी कीट नियंत्रण में मदद मिलती है। वैज्ञानिकों ने किसानों को यह भी सलाह दी कि छिड़काव सुबह या शाम के समय ही करें, जब तेज धूप न हो, ताकि दवा का असर बेहतर तरीके से हो सके।

टीम ने किसानों को यह भी समझाया कि छिड़काव से पहले दवा की मात्रा का सही हिसाब लगाना जरूरी है, क्योंकि जरूरत से कम छिड़काव असर नहीं दिखाता और जरूरत से ज्यादा छिड़काव फसल व मिट्टी दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। किसानों से यह भी कहा गया कि किसी भी दवा का इस्तेमाल करने से पहले पैकेट पर लिखी जानकारी ध्यान से पढ़ें और जरूरत पड़ने पर नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विस्तार अधिकारी से सलाह लें।

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