मधुमक्खियों की प्रमुख शत्रु माईट एवं उनका प्रबंधन
लेखक- डॉ. अभिषेक शुक्ला, कीट विज्ञान विभाग, कृषि महाविधालय, नवसारी कृषि विश्वविधालय, वघई-394730, गुजरात
06 जनवरी 2026, भोपाल: मधुमक्खियों की प्रमुख शत्रु माईट एवं उनका प्रबंधन – मधुमक्खियाँ परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, जो सीधे वैश्विक कृषि और जैव-विविधता को प्रभावित करती हैं। अन्य जीवों की तरह मधुमक्खियों के भी कई ज्ञात प्राकृतिक शत्रु पाए जाते हैं। ये मधुमक्खी की दैनिक गतिविधियों, पराग एकत्रीकरण तथा प्रजनन प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करती है। अनेक बीमारियों के समान ये प्राकृतिक शत्रु भी मधुमक्खियों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं तथा इन परिस्थितियों में इन प्राकृतिक शत्रुओं की रोकथाम भी अत्यंत आवश्यक हो जाती है। इन प्राकृतिक शत्रुओं में विभिन्न प्रकार की माईट (वरूथी) का स्थान महत्वपूर्ण है इनमें वरोआ माईट, ट्रोपिलेप्स माईट और श्वसन को बाधित करने वाली ट्रेकियल माईट बहुत महत्वपूर्ण है। प्रस्तुत लेख में मधुमक्खियों को प्रभावित करने वाली इन्हीं भिन्न-भिन्न माईट के विषय में सविस्तार जानकारी देने का प्रयास किया गया है जो हमारे मधुमक्खी पालक भाइयों के लिए उपयोगी साबित होगा।
परजीवी वरोआ माईट
परजीवी वरोआ माईट (वरोआ डिस्ट्रक्टर) दुनिया भर में मधुमक्खी आबादी के लिए एक महत्वपूर्ण खतरे के रूप में उभरा रही है। वरोआ माईट नामक यह परजीवी देश के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में फैल गया है। एक जानकारी के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया में शहद उद्योग को बचाने के लिए लाखों मधुमक्खियों को मारा भी गया है। वहां अब तक 60 लाख से ज्यादा मधुमक्खियां मारी जा चुकी हैं. यह फैसला ऑस्ट्रेलिया ने इसलिए लिया क्योंकि यह माईट अपने साथ विषाणु का भी फैलाव करने में अपनी भूमिका अदा कर रही है। यह वायरस मधुमक्खियों के लिए सबसे खतरनाक साबित हुआ है। एक अनुमान के मुताबिक, अगर यह वायरस फैला तो सिर्फ शहद उद्योग को 70 मिलियन डॉलर यानी करीब चार अरब रुपये का नुकसान हो सकता है। इतना ही नहीं, इस परजीवी वायरस ने दुनिया के सभी देशों में मधुमक्खियों को नुकसान पहुंचाया है। वरोआ माईट, मधुमक्खी को कमजोर कर देता है। ये परजीवी मधुमक्खियों का रक्त चूसती हैं और उन्हें अपंग बना देती हैं जिसके कारण वे उड़ने में अक्षम हो जाती हैं। ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में वरोआ माईट से ग्रसित हजारों मधुमक्खियों को नष्ट कर दिया गया है तथा मधुमक्खी पालकों को सतर्क रहने को कहा गया है। वरोआ माईट पहले एशिया, यूरोप, अमेरिका और न्यूजीलैंड में पायी जाती थी। इस परजीवी ने यूरोप में भारी मात्रा में नुकसान पहुंचाया है। जहां भी यह माईट पायी गयी है, वहां मधुमक्खियों की पूरी की पूरी कॉलोनियां नष्ट कर दी गई है। इस माईट का प्रभाव इतना खतरनाक होता है कि यह जिन मधुमक्खियों को ग्रसित करती है उन्हें कमजोर कर देती है, जिससे कॉलोनी में नई मधुमक्खियां अपंग पैदा होती है।
पहचान और हानि: ये परजीवी दिखने में लाल-भूरे रंग की होती है। वरोआ माईट एक तिल के आकार का परजीवी है जो मधुमक्खी के छत्ते पर हमला करती है। वरोआ माईट नग्न आंखों से मुश्किल से दिखाई देती है, इसका माप लगभग 1-1.8 मि. मी. है। वरोआ माईट एक बाह्यपरजीवी (एक्टोपैरासाईट) है जो विशेष रूप से मधुमक्खियों को निशाना बनाती है। ये माईट एशिया की मूल निवासी है। इस माईट ने सर्वप्रथम एशियाई मधुमक्खी (एपिस सेराना) को ग्रसित किया था। अब वरोआ माईट यूरोपीय मधुमक्खियों पर भी हमला करती पायी गयी है। यह माईट मधुमक्खी पालन में उपयोग होने वाले उपकरणों के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैलती है साथ ही साथ एक परजीवित मधुमक्खी से दूसरी स्वस्थ मधुमक्खी तक फैलती है।
जीवन चक्र के दो मुख्य चरण: इस परजीवी माईट के जीवन चक्र दो अवस्थाओं में पूर्ण होती है: फ़ोरेटिक चरण तथा प्रजनन चरण।
फ़ोरेटिक चरण: वयस्क माईट, वयस्क मधुमक्खियों के शरीर से चिपक जाती हैं और मधुमक्खी का खून (हिमोलिम्फ) चूसती है तथा केवल वयस्क मादा वरोआ माईट ही वयस्क मधुमक्खियों का परजीवीकरण करती है। वयस्क नर केवल लार्वा और प्यूपा पर ही जीवन निर्वाह करते है और अंडे सेने के बाद वे ब्रूड कोशिकाएं भी नहीं छोड़ते है। इससे मधुमक्खियां कमजोर हो जाती हैं और उन्हें द्वितियक संक्रमणों और विषाणु संक्रमणों के प्रति संवेदनशील बनाती है।
प्रजनन चरण: वयस्क मादा वेरोआ माईट प्रीकैपिंग चरण में मधुमक्खी ब्रूड कोशिकाओं (विशेष रूप से ड्रोन ब्रूड) में प्रवेश करती हैं और ब्रूड सेल बंद होने के बाद दो से पांच अंडे देती हैं। ये 0.5 मि. मी. लंबे अंडे कोशिकाओं के नीचे, दीवारों पर और कभी-कभी सीधे लार्वा पर रखे जाते हैं। पहले अंडे से नर निकलता है और दूसरे अंडे से तथा उसके बाद के अंडों से मादा पैदा होती है। अंडे सेने के बाद, वरोआ माईट वयस्क अवस्था में पहुँचने से पूर्व पहले दो लार्वा अवस्थाओं (जिन्हें ‘प्रोटोनिम्फ’ और ‘ड्यूटोनिम्फ’ कहा जाता है) से गुजरते है। नर वरोआ माईट को विकसित होने में लगभग 5 से 6 दिन और मादा माईट को 7 से 8 दिन लगते हैं। नर तथा मादा में समागमन प्राय: ब्रूड सेल में ही होता है। नर वरोआ माईट थोड़े समय के बाद कोशिका के भीतर मर जाते हैं। युवा मादा वरोआ माईट, विकसित होती हुई मधुमक्खी के साथ ब्रूड सेल से निकलती है। वरोआ माईट 2 सप्ताह के बाद अन्य ब्रूड कोशिकाओं में अंडे देती है। वयस्क मादा वरोआ माईट आमतौर पर 2 महीने तक जीवित रहती है।
वरोआमाईट के लक्षण और प्रभाव: कम संक्रमण वाली कालोनियों में आमतौर पर बहुत कम लक्षण दिखाई देते हैं, हालांकि जैसे-जैसे वरोआ माईट की संख्या बढ़ती है, इसकी उपस्थिति के लक्षण भी और अधिक स्पष्ट हो जाते है। वरोआ माईट का बहुत अधिक संक्रमण 3 से 4 वर्षों के भीतर दिखाई देता है और इसके परिणामस्वरूप मधुमक्खियों के अल्पविकसित शिशु, अपंग और ख़राब उड़ान वाली मधुमक्खियां, परागण के बाद कॉलोनी में मधुमक्खियों की वापसी की कम दर, मधुमक्खियों की आयु में कमी और श्रमिक मधुमक्खियों के वजन में कमी से प्रदर्शित होती है। वरोआ प्रभावित कॉलोनी के लक्षण: जिन्हें आमतौर पर परजीवी वरोआ सिंड्रोम कहा जाता है, में असामान्य ब्रूड पैटर्न, धँसी हुई और चबाई हुई कैपिंग और कोशिका के नीचे या किनारे पर लार्वा शामिल हैं। यह अंततः मधुमक्खियों की आबादी में गिरावट और कॉलोनी के पतन और मृत्यु का कारण बनता है। यह मधुमक्खी कॉलोनियों पर कई हानिकारक प्रभाव डालता है जैसे कि
1. शारीरिक विकार: प्रभावित मधुमक्खियों के पंख विकृत हो सकते हैं, उनका पेट छोटा हो सकता है और उनका बाह्यकंकाल कमजोर हो जाता है।
2. जीवनक्षमता में कमी: वरोआ माईट, श्रमिक मधुमक्खियों के जीवनकाल को छोटा कर देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप श्रमिकों अपनी कॉलोनी का दैनिक काम काज कम कर देती है तथा इससे कालोनी की कार्य क्षमता भी कम हो जाती है।
3. वायरसका फैलाव: वयस्क मादा वरोआ माईट बहुत सक्रिय होती है और छत्तों के आसपास या वयस्क मधुमक्खियों के बीच घूमती रहती है। इस व्यवहार का मतलब है कि वरोआ माईट एक प्रभावी वायरस वाहक के रूप में भी कार्य करती है तथा एक-एक मधुमक्खी के बीच वायरस को स्थानांतरित करती है। वरोआ माईट कई प्रकार के वायरस के वाहक का कार्य करती है इनमें विकृत पंख विषाणु (डिफोर्मड विंग वायरस) और एक्यूट बी पैरालिसिस विषाणु प्रमुख है।
वरोआमाईट का आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव: मधुमक्खी पालन पर वरोआ माईट का आर्थिक प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके संक्रमण के परिणामस्वरूप शहद का उत्पादन बहुत ही कम हो जाता है, इनकी कॉलोनियाँ कमजोर हो जाती है और उपचार और प्रबंधन लागत का खर्च बहुत बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, मधुमक्खीयों द्वारा परागण सेवाएं, जो वैश्विक कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, खतरे में पड़ गया है। जब मधुमक्खी कालोनियां पर्यावरणीय प्रभावों तथा वरोआ माईट से नष्ट हो जाती हैं, तो फसल की पैदावार पर बहुत अधिक प्रतिकूल असर पड़ता है तथा जैव विविधता में भी भारी गिरावट आती है। इससे कृषि के साथ-साथ प्राकृतिक पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ता है।
प्रबंधन एवं नियंत्रण उपाय:
1. रासायनिक नियंत्रण: प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले कार्बनिक एसिड और एसेंशियल तेल शामिल हैं। वरोआ माईट की आबादी को नियंत्रित करने के लिए फॉर्मिक एसिड, ऑक्सालिक एसिड और लैक्टिक एसिड का उपयोग किया जाता है लेकिन इनके अत्यधिक उपयोग से वरोआ माईट में इनके प्रति प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो जाती है अंत: इनका प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
2. जैविक उपाय: वरोआ-प्रतिरोधी मधुमक्खी किस्मों का प्रजनन और उनका विकास करना इसका प्रमुख घटक है। इसमें मधुमक्खियों की ऐसी किस्मों का विकास करना जो स्वच्छ व्यवहार वाली (ग्रुमीग व्यवहार) होती है । वरोआ माइट नियंत्रण हेतु वरोआ माईट प्रतिरोधी मधुमक्खियों की किस्मों का उपयोग, रसायनों पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकता है।
3. यांत्रिक उपाय: ड्रोन ब्रूड हटाने की तकनीक वरोआ माईट की आबादी को कम करने में मदद करती है। वरोआ माईट से संक्रमित फ़्रेमों को समय पर हटाने से वरोआ माईट की आबादी को कम किया जा सकता है।
4. निगरानी: चीनी शेक या अल्कोहल वॉश जैसी विधियों का उपयोग करके, वरोआ माईट की आबादी की नियमित रूप से निगरानी की जा सकती है और यह नियंत्रण का एक तरीका प्रदान कर सकता है।
2. ट्रोपिलेप्स माईट
ट्रॉपिलेप्स माईट एक परजीवी माईट है जो मुख्य रूप से मधुमक्खी शिशुओं और वयस्कों को प्रभावित करती है। यह मुख्य रूप से एशियाई क्षेत्रों में पायी जाती है, लेकिन मधुमक्खी पालन उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण खतरा है और मधुमक्खियों के परजीवी के रूप में अपना जीवन व्यतीत करती है। ट्रोपिलेप्स माइट (ट्रोपिलेप्स क्लारी और ट्रोपिलेप्स मर्सिडेसी) की दो प्रजातियां यूरोपीय मधु मक्खियों (एपिस मेलिफेरा) पर परजीवीकरण करती पायी गयी हैं। यह माईट एक बाह्य-परजीवी (एक्टो-पैरासिटिक) माईट है जो नर और श्रमिक मधुमक्खियों के प्यूपा के रक्त (हिमोलिम्फ) को चूसती है, साथ ही ये ब्रूड पर भी प्रजनन करती है।
पहचान: ये माईट लाल-भूरे रंग की, लगभग 1.0 मि.मी. आकार की तथा 0.5 मि.मी. चौडी, अति सक्रिय माईट है। ये माईट, प्रायः वरोआ माईट के आकार से लगभग एक तिहाई ही होती है। इनके शिशु चार जोडी पैर वाले होते हैं तथा इनके पैरों की पहली जोड़ी प्रायः: श्रृंगिका की तरह सीधी होती है और इनका शरीर खंडित होता है। यह माईट तेजी से चलती है, जिसे छत्ते के निरीक्षण के दौरान आसानी से देखा भी जा सकता है। ब्रूड कोशिकाओं में पाए जाने वाले युवा शिशु तथा प्यूपा सफेद रंग के होते हैं और मधुमक्खी के शिशुओं का भक्षण करते समय आमतौर पर ये गतिहीन हो जाती हैं।
जीवनचक्र और प्रजनन: ट्रॉपिलेप्स माईट का जीवन चक्र कई मायनों में वरोआ माईट के समान ही होता है, क्योंकि दोनों माईट प्रजातियाँ बाह्य-परजीवी है जो मधुमक्खी के प्रारंभिक चरणों को परजीवी बनाती हैं। हालाँकि, वरोआ माईट की तुलना में इसकी प्रजनन दर अधिक होने के कारण इस माईट का जीवन-चक्र बहुत छोटा होता है। मादा ट्रॉपिलेप्स माईट, ब्रूड कोशिकाओं में अंडे देती हैं। ट्रॉपिलेप्स माईट अपना जीवन चक्र 7 से10 दिनों में पूरा करता है, जिससे इनकी संख्या तेजी से बढ़ती है।
मधुमक्खियों पर प्रभाव: ट्रॉपिलैप्स माईट के संक्रमण से मधुमक्खी कालोनियों को गंभीर नुकसान होता है
1. विकृति: विकासशील मधुमक्खियों में शारीरिक असामान्यताएं जैसे विकृत छत्ते और वयस्क मधुमक्खियों में नाटापन, क्षतिग्रस्त पंख, पैर तथा पेट आदि दिखना सामान्य है इससे परजीवी माईट सिंड्रोम और कॉलोनी में गिरावट (कोलेप्स) आदि देखे जाते हैं।
2. ब्रूड का विनाश: ट्रॉपिलैप्स माईट के संक्रमण से मधुमक्खी कालोनियों की ब्रूड कोशिकाएं पूरी तरह से नष्ट हो जाती हैं।
3. कमज़ोर कॉलोनी: ट्रॉपिलैप्स माईट के संक्रमण से मधुमक्खी कॉलोनी कमजोर हो जाती है और उत्पादकता कम हो जाती है। यहां से मधुमक्खी कॉलोनी छोड़कर दूसरे स्थान पर जाने लगती है और ये इस माईट को नए स्थानों पर तेज़ी से फैलाती भी है। ये माईट वायरस को भी फैलाती हैं जो कॉलोनी के स्वास्थ्य और रोग की संवेदनशीलता को बहुत अधिक प्रभावित करती है।
नियंत्रण के उपाय:
1.निगरानी: ब्रूड सेल की नियमित निगरानी करने से इसकी सही समय पर पहचान की जा सकती है।
2.जैविक उपायों से: माईट-प्रतिरोधी मधुमक्खियों का चयन करके भी इसका प्रभावी तरीके से नियंत्रण किया जा सकता है।
3.रासायनिक उपचार: प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले कार्बनिक एसिड और एसेंशियल तेलों का समय आने पर इस माईट के नियंत्रित हेतु प्रयोग किया जा सकता है।
3.श्वांसनाली की माईट(एकरापिस वुडी)
श्वांस नाली की माईट, एक्रेपिस वुडी एक अति सूक्ष्म माईट है जो मधुमक्खियों की श्वसन तंत्र को संक्रमित करती है। यह मधुमक्खी की उड़ान और समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। एक्रेपिस वुडी मधुमक्खियों के श्वसन तंत्र की एक सूक्ष्म, आंतरिक माईट है, जो रानी मधुमक्खियों, ड्रोन और श्रमिक मधुमक्खियों को संक्रमित करती है।
ये माईट, मधुमक्खीयों के श्वसन पथ को अंदर से संक्रमित करती है और वही पर प्रजनन करती है और मधुमक्खी के रक्त (हेमोलिम्फ) को चूस कर अपना जीवन निर्वाह करती है। ये संक्रमित मधुमक्खी की सांस लेने की क्षमता को प्रभावित करती है। ये माईट विभिन्न रोगज़नक़ों के लिए श्वासनली की सतह को खोल देती है और पंख की मांसपेशियों में वायु प्रवाह को कम कर देती है। इसके परिणामस्वरूप मधुमक्खियाँ कमजोर और बीमार हो जाती हैं और उनका जीवनकाल काफी कम हो जाता है।
जीवनचक्र और प्रजनन: इस माईट का पूरा जीवन चक्र एक संक्षिप्त प्रवास अवधि को छोड़कर मधुमक्खी के श्वासनली के अंदर ही पूरा होता है। श्रमिक मधुमक्खियाँ अपनी कोशिकाओं से बाहर आने के 24 घंटों के भीतर मादा माईट, वयस्क मधुमक्खियों की श्वासनली में प्रवास करती है और जीवन भर या जब तक उनकी मेजबान मधुमक्खी मर नहीं जाती तब तक वहीं रहती है। एक बार में मेजबान मधुमक्खी के अंदर, प्रत्येक मादा माईट 3 से 4 दिनों की अवधि में 5 से 7 अंडे देती है और जीवन भर अंडे देती रहती है। अंडे 3 से 4 दिनों में फूटते हैं और लार्वा अवस्था से गुजरती हैं, फिर वयस्क चरण तक पहुँचने से पहले भिन्न अवस्थाओं से गुजरती है। नर को पूरी तरह विकसित होने में 11 से 12 दिन लगते हैं, जबकि मादाओं को 14 से 15 दिन लगते हैं।
मधुमक्खियों पर प्रभाव: ये माईट आकार में अतिसूक्ष्म होती है और इसलिए सामान्यतया नग्न आंखों से दिखाई नहीं देती है। संक्रमण के कोई विश्वसनीय अथवा दिखाई देने वाले कोई लक्षण नहीं होते हैं, जिससे इसका पता लगाना अत्यंत ही मुश्किल हो जाता है। एक सामान्य वक्ष पर पायी जाने वाली श्वासनली स्पष्ट, रंगहीन या हल्के क्रीम-पीले रंग की होती है। इसके विपरीत, संक्रमित श्वासनली का रंग फीका पड़ जाता है और माईट ग्रसन के परिणामस्वरूप धीरे-धीरे खराब हो जाती है। गंभीर रूप से संक्रमित मधुमक्खियों की श्वासनली भूरे धब्बों और पपड़ी जैसे घावों के साथ काली दिखाई देती है। इस माईट से ग्रसित मधुमक्खियों के पंख कमजोर हो जाते है जिससे प्रभावित मधुमक्खियाँ ठीक से उड़ नहीं पातीं हैं और पंखों को विषम कोण से पकड़ना एक सामान्य विशेषता है।
नियंत्रण के उपाय:
1. निगरानी: श्वासनली संक्रमण की जांच के लिए विशेष उपकरण का उपयोग किया जाता है।
2. रासायनिक उपचार: फॉर्मिक एसिड या अन्य लक्षित समाधानों का उपयोग किया जाता है।
3. जैविक विधियाँ: मधुमक्खी कालोनियों की प्राकृतिक प्रतिरक्षा को मजबूत करना एक बहुत अच्छी विधि है।
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