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  • ओमप्रकाश राजवाड़े
  • पीएचडी शस्य विज्ञान, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर

6 मार्च 2021, भोपाल । ऐसे बनायें केंचुए से खाद – हरित क्रांति के बाद निरंतर बढ़ती आबादी के लिए आहार समस्या तो कम हुई है लेकिन दिन-प्रतिदिन मृदा के अत्याधिक दोहन से पैदावार में स्थिरता आने लगी है। खनिज उर्वरकों की अधिक मात्रा तथा रसायनिक कीटनाशी व फफूंदनाशक दवाओं का बोझ मृदा की जैविक शक्ति को प्रभावित कर रहा है। भूमि की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए आज के सघन खेती के युग में प्राकृतिक खादों का प्रयोग बढ़ रहा है। इन प्राकृतिक खादों में गोबर की खाद, हरी खाद और कम्पोस्ट मुख्य हैं। ये खादें मुख्य तत्वों के साथ-साथ गौण तत्वों से भी भरपूर होती हैं।

कम्पोस्ट और केंचुआ खाद (वर्मीकम्पोस्ट) की बात की जाए तो कम्पोस्ट खाद को तैयार करने में अधिक समय व मेहनत लगती है और पोषक तत्वों की हानि भी होती है। इसके अतिरिक्त खरपतवार के बीज भी खेत में चले जाते हैं जबकि पाचन शक्ति बहुत तेज होने के कारण केंचुए कम समय में बहुमूल्य कम्पोस्ट तैयार करते हैं, जिसमें अधिक पोषक तत्व होते हैं। वर्मीकम्पोस्ट के कण कम्पोस्ट खाद से ज्यादा बारीक होते हैं और सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या भी अधिक होती है। पिछले कुछ वर्षों में जैविक कृषि पर काफी जोर दिया जा रहा है, जिसमें केंचुओं का काफी योगदान है। सूक्ष्म जीवाणु तथा केंचुए जैसे प्राणी मृदा में जैविक शक्ति के रूप में पर्याप्त मात्रा में होते हैं, जो कि मृदा की उर्वरता बढ़ाते रहते हैं। इनकी क्रियाशीलता मृदा में स्वत: ही चलती रहती है। विगत वर्षों में रसायनिक उर्वरकों व कीटनाशी रसायनों के अत्याधिक प्रयोग से मृदा प्रदूषण बढ़ा है व केंचुओं एवं अन्य जीवों की संख्या में भारी कमी आई है। केंचुआ खाद तैयार कर खेतों में प्रयोग करने से केंचुओं की संख्या खेत में बढ़ाई जा सकती है, जिससे भूमि सुधार तथा टिकाऊ खेती बढ़ावा दिया जा सके। वैज्ञानिक अरस्तु ने केंचुए को ‘मिट्टी की आंत’ के नाम से संबोधित किया है। डार्विन के अनुसार प्रतिवर्ष किसी भी उपजाऊ मिट्टी की ऊपरी आधा इंच मृदा का निर्माण केंचुओं द्वारा ही किया जाता है। गोबर, विभिन्न प्रकार के पत्ते, सब्जियां आदि खाकर केंचुए के शरीर द्वारा छोड़ा गया मल ही वर्मीकम्पोस्ट (केंचुआ खाद) कहलाता है।

वर्मीकम्पोस्ट में पाए जाने वाले सभी तत्व पानी में घुलनशील होते हैं तथा पौधों को तुरंत प्राप्त होते हैं। शोध के अनुसार अच्छी वर्मीकम्पोस्ट में नाइट्रोजन की मात्रा 2 से 3 प्रतिशत, फास्फोरस 1 से 1.5 प्रतिशत तथा पोटाश 1 से 1.5 प्रतिशत पाई जाती है। इसमें लाभदायक बैक्टीरिया, एंटीबायटिक्स, हार्मोन, एंजाइम, फफूंदी आदि भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। गुणवत्ता की दृष्टि से वर्मीकम्पोस्ट एक संपूर्ण खाद है, जिसमें सभी लाभकारी तत्व तथा सूक्ष्म जीवाणु प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। वर्मीकम्पोस्ट में केंचुओं के अंडे (कुकून) काफी मात्रा में मौजूद होते हैं। इसका अर्थ है कि जिस पौधे को आप यह खाद देंगे उसकी मृदा में ये केंचुए उत्पन्न होकर वर्मीकम्पोस्टिंग की प्रक्रिया को निरंतर जारी रखेंगे।

कम्पोस्ट तैयार करने वाले केंचुओं को दो समूहों में बांटा गया है:
इंडोजेइक, इंपीजेइक
इन समूहों की प्रजातियों में से 1. यूडीलस यूजीनी 2. आइसिनिया फेटीडा 3. पेरीबोनी इक्सकेवेटस मुख्यत: कम्पोस्टिंग के लिए उपयुक्त पाई गई हैं।

केंचुओं के मुख्य गुण
  • केंचुए वायु संचार करने वाले पदार्थों को तोड़कर महीन कणों में बदलने एवं पूर्ण रूप में मिलाने के लिए जाने जाते हैं।
  • जैविक रूप में ये पूरी प्रणाली में सडऩे- गलने व तोडऩे की प्रक्रिया को बढ़ाने में सहायक होते हैं।
  • वर्मीकम्पोस्ट खाद मेड़ बनाकर या गड्ढों में बनाई जाती है। इनका आकार 3 फीट चौड़ा, 1.5 फीट ऊंचा/गहरा और लंबाई आवश्यकतानुसार रखी जाती है।
    अनुपयोगी और व्यर्थ पदार्थ जैसे-फसल अवशेष, पशुशाला एंव घर का कूड़ा, रसोई का कचरा, ग्रामीण व शहरी कूड़ा, वानिकी अवशेष, औद्योगिक अवशेष आदि प्रयोग किए जाते हैं। विभिन्न पदार्थों की मात्रा का अनुपात इस प्रकार होता है-60 प्रतिशत कूड़ा -करकट, 30 प्रतिशत गोबर और 10 प्रतिशत खेत की मिट्टी। सबसे नीचे कड़बी या लंबी तूड़ी की एक पतली परत फैलाकर, उसके ऊपर एक 5-6 से.मी. मोटी गोबर की परत और 3-4 से.मी. मिट्टी की परत फैलाते हैं। उसके ऊपर 40-45 से.मी. व्यर्थ पदार्थ एवं कूड़ा-करकट की परत डालकर 3-4 से.मी. पतली परत गोबर की डालते हैं। इस तरह पूरी मेड़ या गड्ढा भरते हैं और उसको अच्छी तरह से पानी में भिगोया जाता है, फिर उसमें केंचुए छोड़ दिये जाते हैं। इस मेड़ या गड्ढे को फटी व पुरानी जूट की बोरी, फसल अवशेष अथवा कड़बी से ढककर उसको पानी से गीला कर दिया जाता है।
  • वर्मीकम्पोस्ंिटग छाया में या अस्थायी झोपड़ी या स्थायी ढांचा बनाकर या पेड़ के नीचे कर सकते हैं। गर्मी के दिनों में 2-3 बार, बरसात और सर्दी में आवश्यकतानुसार पानी देते रहते हैं, जो 50-75 प्रतिशत जल धारण क्षमता के समान हो। एक घनमीटर पदार्थ में 400-500 केंचुए काफी होते हैं। वर्मीकम्पोस्ट की ऊपरी परत 30-35 दिनों में तैयार हो जाती है और पूरी परत 70-90 दिनों में तैयार होती है। खाद बनने के बाद में इसमें पानी छिड़कना बंद कर देते हैं और सूखी कम्पोस्ट को इक_ा कर लिया जाता है। केंचुए नमी में रहना पसंद करते हैं, इसलिए जब कम्पोस्ट सूखती है तो केंचुए नीचे की नम सतह पर चले जाते हैं। जब दोबारा से उसी स्थान पर कम्पोस्टिंग पदार्थ रखा जाता है तो ये केंचुए दोबारा ऊपर आकर कम्पोस्टिंग करने लगते हैं। इस तरह बार-बार कम्पोस्टिंग पदार्थ में केंचुए मिलाने की आवश्यकता नहीं होती है।
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यह वर्मीकम्पोस्ट यूनिट से निकलने वाला द्रव होता है, इसमें पोषक तत्व विद्यमान होते हैं। इसको इक_ा करने के लिए यूनिट के एक तरफ ढलान बनाकर एक पतला पाइप लगा दें। उसे इक_ा करने के लिए पाइप के सिरे पर एक गड्ढा खोदकर उसमें एक बाल्टी रख दें। इसका प्रयोग हम सभी प्रकार की फसलों में छिड़काव के लिए कर सकते हैं। अत: स्थानीय संसाधनों से केंचुआ खाद तैयार कर किसान इसे अपने खेत में प्रयोग करके भूमि सुधार तथा टिकाऊ खेती में प्रगति लाने के अतिरिक्त इससे अपना लघु व्यवसाय भी शुरू कर सकते हैं और आर्थिक लाभ कमा सकते हैं।

तैयार केंचुआ खाद की पहचान

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  • तैयार वर्मीकम्पोस्ट चाय के पाउडर की तरह दिखाई देता है। यह भार में बहुत हल्का होता है। इससे किसी भी प्रकार की अवांछनीय गंध नहीं आती है।
  • तैयार वर्मीकम्पोस्ट के गड्ढे से केंचुए इधर-उधर रेंगते हुए दिखाई दें तो समझ लेना चाहिए कि खाद बनकर तैयार हो गई है।
वर्मीकम्पोस्ट बनाते समय ध्यान देने योग्य बातें-
  • केंचुए गर्मी व धूप के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इस कारण वे अंधेरे एवं ठंडे नम स्थान में रहना पसंद करते हैं। अत: शेड चारों तरपफ से ढका हुआ हो।
  • जिस कचरे से खाद तैयार करनी है उसमें कांच, पत्थर, प्लास्टिक तथा धातु के टुकड़े नहीं हो।
  • खाद बनाने की पूरी अवधि में प्रत्येक परत में लगभग 30 प्रतिशत नमी का स्तर बनाए रखें। टैंक का निर्माण ऐसी जगह करें जहां पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो।
  • टैंक की सतह सख्त बनायें, जिससे केंचुए जमीन में नीचे न घुस जाएं एवं तल में पर्याप्त ढाल हो, जिससे अनावश्यक जल को निकाला जा सके।
  • केंचुओं को खाने वाले जीव-जंतुओं जैसे-चींटी, कीड़े-मकोड़े एवं पक्षियों से उनकी रक्षा करें।
रसायनिक उर्वरकों की तुलना में वर्मीकम्पोस्ट का महत्व

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  • वर्मीकम्पोस्ट बनाना बहुत सस्ता व आसान होता है। इसे सामान्य किसान अपने फार्म पर तैयार कर सकते हैं, जबकि रसायनिक उर्वरक फार्म पर नहीं बनाया जा सकता।
  • वर्मीकम्पोस्ट में बहुत सारे पोषक तत्व एवं हार्मोन्स पाए जाते हैं, जबकि रसायनिक उर्वरकों में कुछ ही पोषक तत्व पाए जाते हैं।
  • वर्मीकम्पोस्ट द्वारा मृदा की उर्वरा व उत्पादन शक्ति बढ़ती है, जबकि रसायनिक उर्वरकों के लगातार उपयोग से भूमि की उर्वराशक्ति का क्षीण होती है।
  • रसायनिक उर्वरकों की तुलना में वर्मीकम्पोस्ट का फसलों पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता है।
  • वर्मीकम्पोस्ट द्वारा कीट-पतंगे व भू-जनित रोगों का प्रकोप भी कम होता है। वर्मीकम्पोस्ट के प्रयोग से मिट्टी भुर भुरी हो जाती है। इससे उसमें पोषक तत्व व जल संरक्षण की क्षमता बढ़ जाती है। हवा का आवागमन भी मिट्टी में ठीक रहता है।
  • वर्मीकम्पोस्ट का ह्यूमस अवयव मृदा धन आयन विनिमय क्षमता को सुधारता है। इससे पोटाश, कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता आसान हो जाती है।
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