राज्य कृषि समाचार (State News)

गृहिणी से मत्स्य उद्यमी तक: सुजाता भुइयां की प्रेरक कहानी

31 मार्च 2026, भोपाल: गृहिणी से मत्स्य उद्यमी तक: सुजाता भुइयां की प्रेरक कहानी – ओडिशा के संभलपुर जिले के हीराकुंड जलाशय के शांत पानी में एक ऐसी कहानी आकार ले रही है, जो संघर्ष, हिम्मत और बदलाव की मिसाल बन चुकी है। इस कहानी के केंद्र में हैं स्म्ट. सुजाता भुइयां, जिन्होंने एक साधारण गृहिणी से सफल मत्स्य उद्यमी बनकर यह साबित कर दिया कि अगर अवसर और सही मार्गदर्शन मिले, तो महिलाएं किसी भी क्षेत्र में नई पहचान बना सकती हैं।

घर की जिम्मेदारियों के बीच सुजाता के मन में हमेशा यह इच्छा थी कि वे परिवार की आय में योगदान दें। इसी सोच ने उन्हें मछली पालन की ओर कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने Pradhan Mantri Matsya Sampada Yojana (PMMSY) के तहत केज कल्चर तकनीक को अपनाया। शुरुआत आसान नहीं थी—कभी पानी की गुणवत्ता की समस्या, कभी मछलियों के आहार का प्रबंधन, तो कभी घर और काम के बीच संतुलन। कई बार थकान और असमंजस भी हुआ, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

उनकी जिंदगी में असली बदलाव तब आया, जब उन्हें ICAR-Central Inland Fisheries Research Institute (ICAR-CIFRI) और ओडिशा मत्स्य विभाग से प्रशिक्षण और वैज्ञानिक मार्गदर्शन मिला। संभलपुर में आयोजित “जलाशयों में केज कल्चर” प्रशिक्षण कार्यक्रम में उन्होंने भाग लिया। इस प्रशिक्षण में उन्हें सिर्फ किताबों की जानकारी ही नहीं, बल्कि मैदान में काम करके सीखने का मौका मिला—जैसे मछलियों का सही स्टॉकिंग, पानी की गुणवत्ता बनाए रखना, सही मात्रा में फीड देना और बीमारियों से बचाव।

धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया। जो काम कभी कठिन लगता था, वही अब उनकी ताकत बन गया। आज स्थिति यह है कि सुजाता हर साल 25–30 मीट्रिक टन मछली उत्पादन कर रही हैं और इससे उन्हें 7 से 10 लाख रुपये तक की आय हो रही है। यह सिर्फ आमदनी नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की पहचान है।

उनकी सफलता की गूंज तब पूरे देश में सुनाई दी, जब Mann Ki Baat Episode 132 में प्रधानमंत्री Narendra Modi ने उनकी कहानी का जिक्र किया। उस दिन सुजाता के लिए यह सिर्फ सम्मान नहीं था, बल्कि उनके संघर्ष और मेहनत की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान थी।

Dr. Pradip Dey, निदेशक, ICAR-CIFRI ने भी उनकी सफलता को सराहते हुए कहा कि यह उदाहरण दिखाता है कि जब वैज्ञानिक तकनीकें जमीन तक पहुंचती हैं और सही तरीके से अपनाई जाती हैं, तो वे ग्रामीण जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि केज कल्चर जैसी तकनीकें खासकर महिलाओं और युवाओं के लिए आय बढ़ाने का बड़ा माध्यम बन सकती हैं।

आज सुजाता सिर्फ एक सफल मछली पालक नहीं हैं, बल्कि अपने गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं। अब गांव की कई महिलाएं उनसे सीखने आती हैं, उनसे सलाह लेती हैं और उनके साथ जुड़कर आगे बढ़ने की कोशिश कर रही हैं।

सुजाता की यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि बदलाव सिर्फ नीतियों या योजनाओं से नहीं आता, बल्कि इच्छाशक्ति, मेहनत और सही मार्गदर्शन से आता है। हीराकुंड के पानी में तैरती मछलियों के साथ-साथ अब वहां उम्मीद और आत्मनिर्भरता के नए सपने भी तैर रहे हैं।

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