स्मार्ट खेती का दौर: क्या एआई किसान का नया साथी बनेगा?
मयूर नरेंद्र पाटिल, वेस्ट निमाड़ एग्रो प्रोड्यूसर कंपनी पानसेमल, जिला बड़वानी म प्र 9595068889
20 दिसंबर 2025, नई दिल्ली: स्मार्ट खेती का दौर: क्या एआई किसान का नया साथी बनेगा? – भारत की खेती आज एक अहम मोड़ पर खड़ी है। खेत में खड़ा किसान अब सिर्फ यह नहीं सोचता कि फसल कितनी होगी, बल्कि यह भी सोचता है कि बारिश समय पर होगी या नहीं, लागत कैसे निकलेगी, बाजार में सही दाम मिलेगा या नहीं। ऐसे समय में जब हर फैसला जोखिम से भरा है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता—यानी एआई—को खेती का नया सहारा बताया जा रहा है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या एआई सच में किसान की ताकत बनेगा, या फिर यह भी एक ऐसी तकनीक साबित होगी जो शहरों में तो चर्चा बटोरती है, लेकिन गांवों तक आते-आते कमजोर पड़ जाती है? आज एआई की बातें बड़ी-बड़ी बैठकों और सरकारी मंचों पर खूब होती हैं।
ड्रोन, सैटेलाइट से मिली जानकारी, मिट्टी की जांच, अपने आप चलने वाली सिंचाई व्यवस्था और बीमारी पहचानने वाले ऐप—ये सब सुनने में बहुत आधुनिक लगते हैं। लेकिन ज़मीन की सच्चाई कुछ और ही कहती है। भारत के करीब 86 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत हैं। उनके पास सीमित ज़मीन, सीमित आमदनी और सीमित संसाधन हैं। ऐसे में यह कहना कि एआई खेती की तस्वीर बदल देगा, उतना ही मुश्किल है जितना यह मान लेना कि गांव में 5G आते ही कृषि क्रांति हो जाएगी। फिर भी, एआई ने खेती में कुछ नई उम्मीदें ज़रूर जगाई हैं। आज मौसम की जानकारी पहले से ज़्यादा सही मिल रही है, जिससे किसान सही समय पर बुवाई कर सकता है। ड्रोन से फसल की तस्वीर लेकर बीमारी का जल्दी पता चल जाता है, जिससे खर्च कम होता है और नुकसान भी घटता है।
पानी की कमी वाले इलाकों में एआई आधारित सिंचाई तकनीक ने पानी बचाने का रास्ता दिखाया है। बाजार से जुड़ी जानकारी मोबाइल पर मिलने से किसान को यह समझ आने लगा है कि कौन-सी फसल उसे फायदा दे सकती है। साफ है कि एआई में संभावनाएँ हैं। लेकिन हर उम्मीद के साथ कुछ सवाल भी जुड़े हैं। आज भी कई गांवों में इंटरनेट की रफ्तार इतनी धीमी है कि ऐप खुलते-खुलते किसान का भरोसा ही टूट जाता है। बहुत से किसानों के पास स्मार्टफोन तो हैं, लेकिन वे इतने सक्षम नहीं कि भारी ऐप आसानी से चला सकें। ऊपर से ज़्यादातर एआई प्लेटफॉर्म अंग्रेज़ी में हैं, जबकि किसान अपनी स्थानीय भाषा में ही सहज महसूस करता है। डिजिटल समझ बढ़ाने की बातें कागज़ों में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत अभी भी पीछे है। एआई तकनीक का खर्च भी एक बड़ा रोड़ा है। ड्रोन सर्वे, सेंसर और स्मार्ट उपकरण आज भी ज़्यादातर बड़े किसानों तक सीमित हैं।
छोटे किसान के लिए यह तकनीक अभी सपना ही लगती है। जब किसान पहले से ही खाद, बीज और डीज़ल के दामों से जूझ रहा है, तो उससे यह उम्मीद करना कि वह महंगी तकनीक अपनाएगा, सही नहीं लगता। एक और अहम मुद्दा है डेटा का। आज खेती से जुड़ा डेटा “नया सोना” बन चुका है। मिट्टी, पानी, मौसम और फसल की जानकारी कंपनियों के लिए बहुत कीमती है। लेकिन किसान को यह शायद ही बताया जाता है कि उसका डेटा कैसे इस्तेमाल हो रहा है और उससे फायदा कौन उठा रहा है। अगर नियम साफ नहीं हुए, तो एआई किसान को मज़बूत करने के बजाय उसे तकनीक पर निर्भर बना सकता है। इसके साथ ही, एआई पर जरूरत से ज्यादा भरोसा भी खतरे से खाली नहीं है। खेती हमेशा से प्रकृति के साथ तालमेल का काम रही है।
स्थानीय मौसम, मिट्टी की आदत और कीटों का व्यवहार—इन सबकी समझ किसान अपने अनुभव से हासिल करता है। एआई अनुमान लगा सकता है, लेकिन हर बार सही नहीं हो सकता। इसलिए तकनीक को सलाहकार बनाना ठीक है, मालिक बनाना नहीं। सबसे बड़ा सवाल यही है—किसान को इससे सीधा फायदा क्या मिलेगा? खेती की असली समस्या सिर्फ उत्पादन नहीं, बल्कि सही दाम और बाजार तक पहुंच है। अगर एआई किसान को सही कीमत दिलाने में मदद करे, बिचौलियों का दबाव कम करे और जोखिम घटाए, तभी यह तकनीक वाकई काम की होगी। सिर्फ खेत से डेटा इकट्ठा करने से किसान की ज़िंदगी नहीं बदलती। यह खतरा भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि अगर एआई आधारित खेती पूरी तरह कंपनियों के हाथ में चली गई, तो किसान का नियंत्रण कमजोर पड़ जाएगा। फैसले अगर मोबाइल ऐप लेने लगें, तो किसान सिर्फ उपयोगकर्ता बनकर रह जाएगा।
भारत की खेती के लिए यह रास्ता खतरनाक हो सकता है। इसलिए ज़रूरी है कि एआई का इस्तेमाल किसान को सशक्त बनाने के लिए हो, न कि उसे नियंत्रित करने के लिए। फिर भी, एआई को नकारना समाधान नहीं है। सही दिशा में इस्तेमाल किया जाए, तो यह पानी बचाने, बीमारी रोकने और बाजार से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। इसके लिए सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और निजी कंपनियों को मिलकर किसानों की ज़रूरत के हिसाब से तकनीक तैयार करनी होगी। एआई को किसान का सच्चा साथी बनाने के लिए तीन बातें सबसे ज़रूरी हैं—गांवों में तेज़ और सस्ता इंटरनेट, सरल और किफायती तकनीक, और साफ व पारदर्शी नियम। सबसे अहम बात यह है कि खेती से जुड़ा डेटा किसान का ही माना जाए। अंत में यही कहा जा सकता है कि एआई खेती का भविष्य बन सकता है, लेकिन तभी जब किसान उसकी केंद्र में हो। तकनीक तभी सफल होगी जब वह किसान के अनुभव और समझ के साथ मिलकर आगे बढ़े। एआई किसान का साथी बन सकता है—लेकिन यह फैसला किसान करेगा, कोई एल्गोरिदम नहीं।
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