इथेनॉल के लिए गन्ना पड़ा महंगा, भारत अब चीनी का आयात करेगा
22 अगस्त 2026, नई दिल्ली: इथेनॉल के लिए गन्ना पड़ा महंगा, भारत अब चीनी का आयात करेगा – भारत ने चीनी आयात नीति में बड़ा बदलाव करते हुए 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह फैसला देश में त्योहारों के सबसे अधिक मांग वाले सीजन से पहले चीनी की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने और घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाने के लिए लिया गया है।
सूत्रों के अनुसार, पिछले दो महीनों में चीनी की कीमतों में करीब 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अगस्त से नवंबर के बीच त्योहारों के कारण मिठाइयों और खाद्य उत्पादों में चीनी की मांग बढ़ती है। ऐसे समय में घरेलू आपूर्ति पर बढ़ते दबाव ने सरकार को हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर किया है।
यह फैसला भारत के लिए खास महत्व रखता है, क्योंकि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक और सबसे बड़ा चीनी उपभोक्ता है। देश की चीनी नीति में अब तक किसानों, चीनी मिलों, निर्यातकों, घरेलू उपलब्धता और तेजी से बढ़ते इथेनॉल उद्योग के बीच संतुलन बनाने पर जोर रहा है।
सरकार के इस फैसले से वर्षों से चली आ रही आयात नीति में बड़ा बदलाव हुआ है। भारत में सामान्य तौर पर चीनी के आयात पर 100 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया जाता है, जिससे विदेशी चीनी घरेलू बाजार में महंगी पड़ती है। नई टैरिफ रेट कोटा व्यवस्था के तहत पात्र चीनी मिलें और रिफाइनरियां बिना आयात शुल्क के कच्ची चीनी मंगा सकेंगी और उसे रिफाइन कर घरेलू बाजार में बेच सकेंगी।
इथेनॉल के लिए गन्ने का डायवर्जन बढ़ा रहा चीनी की आपूर्ति पर दबाव
मौजूदा स्थिति भारत के गन्ना क्षेत्र में बदलती अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी है। 30 मार्च 2026 तक भारत का शुद्ध चीनी उत्पादन करीब 272.7 लाख टन रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 14.7 प्रतिशत कम है।
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने के कार्यक्रम के तहत चीनी मिलों को गन्ने और चीनी आधारित कच्चे माल का एक हिस्सा इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया है। भारत ने इथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2025-26 में पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य रखा था। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने भी अतिरिक्त गन्ने को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने को प्रोत्साहित किया है।
इस नीति ने गन्ने के लिए एक नया प्रतिस्पर्धी बाजार तैयार किया है। जिस गन्ने से चीनी बनाई जा सकती थी, उसका एक हिस्सा अब इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हो रहा है। इससे खाद्य बाजार में उपलब्ध होने वाली चीनी की मात्रा कम होती है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन पहले ही काफी बढ़ चुका है। 2024-25 चीनी सीजन में 34 लाख टन चीनी इथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट की गई, जबकि 2023-24 में यह 24 लाख टन और 2022-23 में 43 लाख टन थी। मौजूदा सीजन के लिए उद्योग के अनुमानों के अनुसार करीब 24 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा इथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट की गई है।
सरकार ने चीनी और इथेनॉल दोनों बाजारों के बीच संतुलन की जरूरत को भी स्वीकार किया है। सितंबर 2025 के एक आदेश के तहत इथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2025-26 के दौरान चीनी मिलों और डिस्टिलरियों को गन्ने के रस, चीनी सिरप और शीरे से इथेनॉल उत्पादन की अनुमति दी गई। साथ ही खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग को निर्देश दिया गया कि घरेलू चीनी उत्पादन की तुलना में इथेनॉल के लिए किए जा रहे डायवर्जन की समय-समय पर समीक्षा की जाए, ताकि देश में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहे।
अब यह मुद्दा केवल दीर्घकालिक नीति तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि सीधे बाजार की स्थिति को प्रभावित कर रहा है। इस महीने की शुरुआत में सरकार अगले सीजन में इथेनॉल के लिए डायवर्ट किए जाने वाले गन्ने की मात्रा पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रही थी, ताकि चीनी उत्पादन बढ़ाया जा सके और कीमतों पर दबाव कम किया जा सके। महाराष्ट्र और कर्नाटक में बारिश तथा फसल की स्थिति को लेकर चिंता ने अगले सीजन के उत्पादन को लेकर अनिश्चितता और बढ़ा दी है।
त्योहारों की मांग बढ़ने के समय कीमतों में तेजी
चीनी कीमतों में तेजी का समय महत्वपूर्ण है। भारत में अगस्त से नवंबर के बीच त्योहारों के कारण चीनी की खपत आमतौर पर बढ़ जाती है। इस दौरान मिठाइयों, कन्फेक्शनरी और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ती है। इस साल यह मांग ऐसे समय में बढ़ रही है जब चीनी मिलों के पास उपलब्ध स्टॉक पर पहले ही दबाव है।
भारत के सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में थोक कीमतों में तेज वृद्धि हुई है। उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, प्रमुख चीनी मिलों के एक्स-मिल भाव करीब ₹5,400 से ₹5,560 प्रति क्विंटल तक पहुंच गए हैं। प्रमुख बाजारों में भी चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं।
20 अगस्त तक भारतीय चीनी कीमतों में दो महीनों में करीब 40 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी थी। त्योहारों के दौरान मांग और बढ़ने की संभावना को देखते हुए सरकार ने कीमतों पर नियंत्रण के लिए हस्तक्षेप किया है।
हालांकि, सरकार ने मौजूदा स्थिति को केवल भौतिक चीनी की कमी के रूप में नहीं बताया है। जुलाई में सरकार ने कहा था कि एक्स-मिल कीमतों में वृद्धि मौजूदा मांग और आपूर्ति की स्थिति से पूरी तरह समर्थित नहीं है। सरकार ने जमाखोरी, सट्टेबाजी और कागजी कारोबार को भी कीमतों में वृद्धि और कमी की धारणा पैदा करने वाले कारणों में शामिल किया था।
एक साल से भी कम समय में निर्यात से आयात की ओर
चीनी आयात का फैसला भारत के चीनी बाजार के बदलते संतुलन को भी दिखाता है।
2025-26 चीनी सीजन की शुरुआत में सरकार ने चीनी निर्यात की अनुमति दी थी। शुरुआत में 15 लाख टन निर्यात की अनुमति दी गई और बाद में इस मात्रा को बढ़ाया गया। पूरे सीजन के दौरान खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने निर्यात कोटा के माध्यम से बाजार की स्थिति के अनुसार चीनी निर्यात का प्रबंधन किया।
अब एक साल से भी कम समय में स्थिति बदल गई है और भारत आयात की अनुमति दे रहा है।
नई शुल्क-मुक्त व्यवस्था के तहत करीब 10 लाख टन कच्ची चीनी भारत लाई जा सकती है। आयात की अनुमति 31 अक्टूबर तक है। अपने परिसर में कच्ची चीनी को रिफाइन करने की क्षमता रखने वाली पात्र मिलें और रिफाइनरियां इस व्यवस्था का लाभ उठा सकती हैं। इसके लिए आवेदन 21 से 28 अगस्त के बीच किए जा सकते हैं।
हालांकि, पूरे 10 लाख टन की चीनी तुरंत घरेलू बाजार में उपलब्ध नहीं होगी। आयातित कच्ची चीनी को पहले भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचना होगा और उसके बाद रिफाइन कर घरेलू बाजार में भेजा जाएगा।
सरकार ने चीनी स्टॉक रखने पर भी लगाई सीमा
चीनी आयात का फैसला कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए व्यापक कदमों का हिस्सा है। जुलाई में सरकार ने चीनी व्यापारियों के लिए 1 अगस्त से 30 नवंबर तक स्टॉक रखने की सीमा लागू की थी। व्यापारियों को अपने स्टॉक की जानकारी देनी होगी और हर सप्ताह स्टॉक की स्थिति अपडेट करनी होगी।
सरकार ने कहा था कि इस कदम का उद्देश्य जमाखोरी और सट्टेबाजी को रोकना तथा उचित कीमतों पर चीनी की लगातार उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
सरकार ने थोक उपभोक्ताओं के लिए भी अलग व्यवस्था की है। 1 सितंबर से 30 नवंबर तक प्रति माह 10 टन से अधिक चीनी का इस्तेमाल करने वाले थोक उपभोक्ता अधिकतम 15 दिनों की जरूरत के बराबर स्टॉक रख सकेंगे। इसमें कन्फेक्शनरी और खाद्य प्रसंस्करण जैसे उद्योग तथा संस्थागत खरीदार शामिल हैं।
इसका उद्देश्य ऐसे समय में बड़े उपभोक्ताओं को अतिरिक्त स्टॉक जमा करने से रोकना है, जब बाजार में आपूर्ति पर दबाव है और कीमतें बढ़ रही हैं।
आयात की अनुमति और स्टॉक सीमा दोनों को मिलाकर देखा जाए तो सरकार एक साथ बाजार के दोनों पक्षों पर काम कर रही है। एक ओर घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाने की कोशिश है, वहीं दूसरी ओर जमाखोरी और अनावश्यक स्टॉक जमा करने पर रोक लगाई जा रही है।
चीनी और इथेनॉल के बीच बढ़ता संतुलन
चीनी की कीमतों में मौजूदा तेजी ने एक बड़े नीतिगत सवाल को सामने ला दिया है।
भारत का इथेनॉल कार्यक्रम देश की ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। चीनी मिलों के लिए इथेनॉल एक अतिरिक्त आय का स्रोत है और इससे उन्हें चीनी की कीमतों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है। सरकार के लिए इथेनॉल पेट्रोल में अधिक मिश्रण के लक्ष्य को पूरा करने में मदद करता है।
लेकिन इथेनॉल के लिए डायवर्ट किया जाने वाला हर टन गन्ना चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध नहीं रहता।
जब चीनी उत्पादन अनुमान से कम होता है, तब यह संतुलन और महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में मौसम की स्थिति गन्ने की उपलब्धता को प्रभावित कर सकती है। वहीं सरकार को इथेनॉल की उपलब्धता बनाए रखने और पेट्रोल में मिश्रण के लक्ष्यों को पूरा करने की जरूरत होती है।
इससे भारत का चीनी बाजार उस दौर की तुलना में अधिक जटिल हो गया है, जब सरकार का मुख्य ध्यान बार-बार बनने वाले चीनी अधिशेष को नियंत्रित करने पर था।
सितंबर 2025 के सरकार के इथेनॉल संबंधी आदेश में भी इस संतुलन की जरूरत को स्वीकार किया गया था। इसमें घरेलू चीनी उत्पादन की तुलना में इथेनॉल के लिए किए जा रहे चीनी डायवर्जन की समय-समय पर समीक्षा की व्यवस्था की गई थी, ताकि पूरे साल पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहे।
आगे क्या होगा?
तत्काल तौर पर 10 लाख टन के आयात का उद्देश्य त्योहारों के दौरान चीनी की कीमतों में और तेजी को रोकना है।
बड़ी चुनौती 2026-27 चीनी सीजन की शुरुआत के साथ सामने आएगी। सरकार को तय करना होगा कि कितना गन्ना चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध रखा जाए और कितना इथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट किया जाए, ताकि घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी स्टॉक बना रहे।
सरकार को भविष्य में निर्यात की अनुमति देने के समय उत्पादन अनुमान, शुरुआती स्टॉक, इथेनॉल के लिए गन्ने के डायवर्जन और घरेलू खपत को एक साथ ध्यान में रखना होगा। मौजूदा सीजन ने दिखाया है कि घरेलू आपूर्ति संतुलन में बदलाव आने पर भारत कितनी तेजी से निर्यात प्रबंधन से आयात की ओर जा सकता है।
वैश्विक चीनी बाजार के लिए भी भारत का यह कदम महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक और सबसे बड़ा उपभोक्ता है। ऐसे में सीमित अवधि के लिए भी आयात बाजार में लौटना अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रवाह को प्रभावित कर सकता है और वैश्विक चीनी कीमतों को समर्थन दे सकता है। भारत की आयात मांग की उम्मीदों के बाद लंदन और न्यूयॉर्क में चीनी वायदा कीमतों में भी तेजी देखी गई है।
भारत के चीनी उद्योग के लिए यह घटनाक्रम एक नई संरचनात्मक चुनौती को सामने लाता है। एक ही गन्ने की फसल से अब खाद्य और ईंधन, दोनों रणनीतिक जरूरतें पूरी करनी हैं।
10 लाख टन का शुल्क-मुक्त आयात त्योहारों के मौसम के दौरान घरेलू बाजार के लिए अल्पकालिक राहत दे सकता है। लेकिन लंबी अवधि में बड़ा सवाल यह रहेगा कि भारत इथेनॉल उत्पादन बढ़ाते हुए घरेलू चीनी आपूर्ति पर समय-समय पर पड़ने वाले दबाव को कैसे कम करेगा, खासकर तब जब मौसम की वजह से गन्ने का उत्पादन प्रभावित हो।
खाद्य के लिए चीनी और ईंधन के लिए इथेनॉल के बीच यह संतुलन आने वाले वर्षों में भारत की चीनी नीति के सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक बनने की संभावना है।
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