मिट्टी का स्वास्थ्य ही भारत की खाद्य और पोषण सुरक्षा की कुंजी: विशेषज्ञों ने समन्वित नीति की आवश्यकता बताई
13 मार्च 2026, नई दिल्ली: मिट्टी का स्वास्थ्य ही भारत की खाद्य और पोषण सुरक्षा की कुंजी: विशेषज्ञों ने समन्वित नीति की आवश्यकता बताई – भारत अब केवल खाद्य सुरक्षा से आगे बढ़कर पोषण सुरक्षा की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। ऐसे में कृषि और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच का संबंध पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इसी विषय पर नई दिल्ली में आयोजित एक गोलमेज चर्चा में नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों और उद्योग जगत के विशेषज्ञों ने मिट्टी के स्वास्थ्य, फसल पोषण और कृषि आदानों के जिम्मेदार उपयोग को देश की खाद्य प्रणाली और पोषण सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
इस चर्चा में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि मिट्टी का स्वास्थ्य ही पूरे खाद्य तंत्र की नींव है। यदि मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बेहतर होगा और कृषि पद्धतियाँ वैज्ञानिक होंगी, तो इससे न केवल उत्पादन बढ़ेगा बल्कि लोगों के पोषण स्तर में भी सुधार होगा।
पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल डॉ. जतिंदर सिंह ने चर्चा की पृष्ठभूमि रखते हुए कहा कि भारत को मिट्टी के स्वास्थ्य, खाद्य उत्पादन और पोषण सुरक्षा के लिए सही दिशा तय करने के लिए ठोस रणनीतिक सुझावों की आवश्यकता है। उन्होंने आईसीआरआईईआर की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि देश के कई हिस्सों में मिट्टी का जैविक पदार्थ लगातार घट रहा है। वहीं नाइट्रोजन का उपयोग अधिक हो रहा है, लेकिन फसलों द्वारा उसकी उपयोग क्षमता कम है, जिससे पोषक संतुलन और स्थिरता पर सवाल खड़े होते हैं।
क्रिस्टल ग्रुप के चेयरमैन एमेरिटस एन.के. अग्रवाल ने कहा कि लगातार खेती के कारण मिट्टी को “रीचार्ज” करना अब जरूरी हो गया है। भारत में किसान साल में दो से तीन बार खेती करते हैं और लगभग हर प्रकार की फसल का उत्पादन करते हैं। ऐसे में देश की जिम्मेदारी केवल अपने लोगों का पेट भरना ही नहीं बल्कि वैश्विक खाद्य आपूर्ति में भी योगदान देना है। उन्होंने कहा कि टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार और निजी क्षेत्र को मिलकर काम करना होगा।
किसान-विज्ञान फाउंडेशन (KAKV) की गवर्निंग काउंसिल के सेक्रेटरी, एन.के. अरोड़ा ने “भारत में मिट्टी की सेहत, फ़ूड प्रोडक्शन और न्यूट्रिशन सिक्योरिटी: एक इंटीग्रेटेड एनालिसिस” टाइटल से थीम पेपर पेश किया।। इस श्वेत पत्र का उद्घाटन कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, भारत सरकार के कृषि आयुक्त डॉ. पी.के. सिंह ने किया।
KAKV की गवर्निंग काउंसिल के चेयरमैन प्रोफेसर वसंत गांधी ने कहा कि भारत की मिट्टी का स्वास्थ्य देश की खाद्य उत्पादन क्षमता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। पिछले दशकों में भारत ने प्रमुख खाद्यान्नों में आत्मनिर्भरता हासिल की है और चावल तथा गेहूं जैसे उत्पादों का सीमित निर्यात भी करता है, लेकिन पोषण सुरक्षा अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अनुसार देश का कुल खाद्यान्न उत्पादन 350 मिलियन टन से अधिक हो चुका है और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से लगभग 80 करोड़ लोगों को खाद्य सुरक्षा मिलती है। लेकिन उन्होंने कहा कि केवल खाद्य उपलब्धता पर्याप्त नहीं है, बल्कि पोषण की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019–21) के आंकड़ों के अनुसार भारत में पांच वर्ष से कम आयु के 35.5 प्रतिशत बच्चे अवरुद्ध विकास (स्टंटिंग) से प्रभावित हैं, 32.1 प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं और 19.3 प्रतिशत बच्चे तीव्र कुपोषण से ग्रस्त हैं। वहीं 15–49 वर्ष की आयु की 53 प्रतिशत से अधिक महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं।
विशेषज्ञों ने बताया कि इन समस्याओं के पीछे मिट्टी के स्वास्थ्य में गिरावट भी एक महत्वपूर्ण कारण है। उर्वरक उपयोग के आंकड़े बताते हैं कि देश में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ रहा है। वर्ष 2022-23 में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का कुल उपयोग 29.84 मिलियन मीट्रिक टन रहा, लेकिन एनपीके अनुपात 11.8:4.6:1 है, जो यह दर्शाता है कि नाइट्रोजन का उपयोग अन्य पोषक तत्वों की तुलना में बहुत अधिक है।
कृषि आयुक्त डॉ. पी.के. सिंह ने बताया कि केंद्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाने के लिए राज्यवार रोडमैप तैयार कर रही है। इसके तहत राज्य सरकारें अपने लक्ष्य तय करेंगी और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार योजनाएँ बनाएंगी।
उन्होंने कहा कि कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों की कई योजनाएँ मिलकर मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार ला सकती हैं। माइक्रो-इरिगेशन, मत्स्य पालन और अन्य एकीकृत कृषि योजनाओं के माध्यम से मिट्टी की गुणवत्ता, फसल उत्पादन और खाद्य गुणवत्ता में सुधार लाया जा सकता है। उन्होंने बीज कोटिंग जैसी तकनीकों के उपयोग पर भी जोर दिया, जो पौधों की शुरुआती वृद्धि और मजबूती को बढ़ाती हैं।
धानुका एग्रीटेक के चेयरमैन एमेरिटस आर.जी. अग्रवाल ने कहा कि भारत में अलग-अलग जिलों और राज्यों में कृषि उत्पादकता में काफी अंतर देखने को मिलता है, जबकि कई बार किसान एक ही बीज का उपयोग करते हैं। इसका मुख्य कारण खेती की अलग-अलग पद्धतियाँ और वैज्ञानिक मार्गदर्शन की कमी है।
उन्होंने कहा कि प्रगतिशील किसान और उच्च मूल्य वाली फसलें उगाने वाले किसान अक्सर वैज्ञानिकों या सलाहकारों की मदद लेते हैं, जो उन्हें पूरे सीजन में मिट्टी की जांच और फसल की स्थिति के आधार पर मार्गदर्शन देते हैं। उनका मानना है कि इसी प्रकार की सलाहकारी व्यवस्था छोटे और सीमांत किसानों तक भी पहुंचनी चाहिए ताकि वे अपनी मिट्टी की क्षमता के अनुसार खेती कर सकें।
गोलमेज चर्चा में भाग लेने वाले विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि भारत की दीर्घकालिक खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिए मिट्टी के स्वास्थ्य को केंद्र में रखकर नीतियाँ बनानी होंगी। इसके लिए सरकार, शोध संस्थानों, उद्योग और किसानों के बीच मजबूत सहयोग जरूरी है।
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