भारत के मसौदा गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 में एफआरपी और उत्पादन लागत पर उठे सवाल
01 मई 2026, नई दिल्ली: भारत के मसौदा गन्ना नियंत्रण आदेश 2026 में एफआरपी और उत्पादन लागत पर उठे सवाल – अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस), जो देश के प्रमुख किसान संगठनों में से एक है, ने उपभोक्ता मामले मंत्रालय द्वारा 2 अप्रैल 2026 को जारी मसौदा गन्ना (नियंत्रण) आदेश, 2026 का कड़ा विरोध किया है। संगठन ने इस मसौदे को “किसान-विरोधी” और “कॉरपोरेट समर्थक” बताते हुए कहा है कि इससे गन्ना क्षेत्र में राजस्व वितरण का संतुलन किसानों के खिलाफ जा सकता है।
संगठन ने सरकार से 20 मई 2026 की निर्धारित समय-सीमा से पहले इस मसौदे को वापस लेने की मांग की है। ऐसा न होने पर देशभर में आंदोलन, जिसमें “चक्का जाम” भी शामिल है, की चेतावनी दी गई है।
नेतृत्व की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया
रावुला वेंकैया, एआईकेएस के महासचिव, ने मसौदे को पुराने और अप्रभावी 1966 के ढांचे को आगे बढ़ाने वाला बताया। उनका कहना है कि इसमें ऐसे प्रावधान जोड़े गए हैं जो कॉरपोरेट चीनी मिलों को लाभ पहुंचाते हैं।
वहीं, राजन क्षीरसागर, एआईकेएस के अध्यक्ष, ने किसानों के मुद्दों को विस्तार से रखते हुए कहा कि मसौदा गन्ना मूल्य निर्धारण में वास्तविक लागत को नजरअंदाज करता है और उप-उत्पादों से होने वाली आय को भी शामिल नहीं करता।
मुख्य मुद्दा: एफआरपी और उत्पादन लागत
एआईकेएस की आपत्तियों का केंद्र बिंदु गन्ने के लिए तय होने वाली उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) की गणना है। संगठन का कहना है कि इसमें सी₂ (C₂) लागत को शामिल नहीं किया गया है, जिसमें सभी इनपुट लागत, पारिवारिक श्रम और भूमि का किराया शामिल होता है।
संगठन के अनुसार, कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) द्वारा 10.25% रिकवरी पर एफआरपी ₹355 प्रति क्विंटल आंकी गई है, जबकि सी₂ लागत ₹268 प्रति क्विंटल और परिवहन व बीमा जोड़ने पर ₹274 प्रति क्विंटल बैठती है। यदि स्वामीनाथन फार्मूला (सी₂+50%) लागू किया जाए, तो यह मूल्य लगभग ₹411 प्रति क्विंटल होना चाहिए।
एआईकेएस का दावा है कि वर्तमान व्यवस्था के कारण किसानों को प्रति हेक्टेयर भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
उप-उत्पादों की आय को बाहर रखना
मसौदे के क्लॉज 3 (व्याख्या 5) में एथेनॉल, सह-उत्पादित बिजली और जैव उर्वरकों से होने वाली आय को एफआरपी निर्धारण से बाहर रखा गया है। एआईकेएस का कहना है कि इससे मिलों और कॉरपोरेट कंपनियों को लाभ होगा, जबकि किसानों को इसका कोई हिस्सा नहीं मिलेगा।
संगठन ने मांग की है कि राजस्व साझेदारी फार्मूला (आरएसएफ) लागू किया जाए, जिसके तहत चीनी और सभी उप-उत्पादों की कुल आय का 75% किसानों को 30 दिनों के भीतर दिया जाए।
मिलों के बीच दूरी बढ़ाने पर आपत्ति
एआईकेएस ने क्लॉज 6A के तहत चीनी मिलों के बीच न्यूनतम दूरी 15 किमी से बढ़ाकर 25 किमी करने का विरोध किया है। संगठन का कहना है कि इससे प्रत्येक मिल के लिए एकाधिकार क्षेत्र बन जाएगा और किसानों के पास अपनी उपज बेचने के विकल्प सीमित हो जाएंगे।
भुगतान में देरी और कमजोर प्रवर्तन
हालांकि नियम के अनुसार 14 दिनों में भुगतान होना चाहिए, एआईकेएस ने बताया कि फरवरी 2026 तक गन्ना बकाया ₹16,087 करोड़ तक पहुंच गया। संगठन का आरोप है कि भुगतान में देरी पर लगने वाला ब्याज शायद ही कभी लागू किया जाता है।
एआईकेएस ने मांग की है कि भुगतान में देरी होने पर मिलों के बैंक खातों को स्वतः जब्त किया जाए और प्रबंधन पर आपराधिक कार्रवाई हो।
अन्य प्रमुख मुद्दे
एआईकेएस ने मसौदे में कई अन्य कमियों की ओर भी ध्यान दिलाया है:
- खांडसारी और गुड़ इकाइयों के लिए प्रभावी निगरानी तंत्र का अभाव
- गन्ने की गुणवत्ता के नाम पर मनमानी कटौती की संभावना
- स्टैंडअलोन एथेनॉल इकाइयों को बैंक गारंटी से छूट
- कटाई और परिवहन लागत पर कोई नियमन नहीं
- कटाई के बाद समय पर पेराई सुनिश्चित करने का अभाव
- चीनी रिकवरी दर के सत्यापन के लिए पारदर्शी व्यवस्था का अभाव
रंगराजन समिति की सिफारिशों की अनदेखी
एआईकेएस ने कहा कि मसौदा रंगराजन समिति की सिफारिशों से हटकर है, जिसमें राजस्व साझेदारी, दूरी नियम समाप्त करने और क्षेत्रीय सुधारों का सुझाव दिया गया था।
एआईकेएस की प्रमुख मांगें
संगठन ने सरकार के सामने निम्नलिखित मांगें रखी हैं:
- एफआरपी को सी₂ लागत से जोड़ना (₹411 प्रति क्विंटल आधार)
- सभी उप-उत्पादों पर राजस्व साझेदारी लागू करना
- समय पर भुगतान सुनिश्चित करना और सख्त दंड प्रावधान
- कटौतियों पर नियंत्रण और थर्ड-पार्टी जांच
- खांडसारी इकाइयों पर सख्त निगरानी
- किसानों के बकाया को जब्त न किया जाए
- कटाई, परिवहन और रिकवरी में पारदर्शिता सुनिश्चित करना
संगठन ने किसानों से अपील की है कि वे 20 मई 2026 से पहले मंत्रालय को अपने सुझाव और आपत्तियाँ भेजें।
एआईकेएस क्या चाहता है?
एआईकेएस का कहना है कि गन्ना क्षेत्र में केवल मूल्य आधारित प्रणाली पर्याप्त नहीं है। संगठन एक ऐसी व्यवस्था चाहता है जिसमें किसानों को चीनी और उसके सभी उप-उत्पादों से होने वाली आय में हिस्सा मिले।
सरकार इस मसौदे पर क्या रुख अपनाती है, यह आने वाले समय में गन्ना क्षेत्र की दिशा तय करेगा।
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