राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

स्वस्थ आहार प्रणाली एवं कृषक महिलाओं की पोषण संबंधी आवश्यकताएँ

लेखक: डॉ. निधि जोशी, विषय वस्तु विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केन्द्र, भा.कृ.अनु.प. केंद्रीय, कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल, joshinidhi894@gmail.com

17 दिसंबर 2024, नई दिल्ली: स्वस्थ आहार प्रणाली एवं कृषक महिलाओं की पोषण संबंधी आवश्यकताएँ – भारत विश्व का सातवां सबसे बड़ा देश है और विश्व की सबसे अधिक 141 करोड़ जनसंख्या यहीं निवास करती है। भारत का कुल क्षेत्रफल विश्व के क्षेत्रफल का केवल 2.4 प्रतिशत है, लेकिन इस क्षेत्रफल पर विश्व की 17 से 18 प्रतिशत आबादी रहती है। भारत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 328.7 मिलियन हेक्टेयर है। कृषि के लिए उपयुक्त भूमि 140 मिलियन हेक्टेयर है। भारत में आर्ची से अधिक जनसंख्या (54.6 प्रतिशत) कृषि कार्यों से आजीविका प्राप्त करती है।

हमारा देश बहुत-सी फसलों का अग्रणी उत्पादक है। भारत दूध, दालों और मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक है। जबकि गेहू, धान, मूंगफली, गन्ना, चाय, कपास, जूट, फल और सब्जियों के उत्पादन में भारत दूसरे स्थान पर है। इतनी खाद्य समृधता होने के बावजूद भारत मैं हर तीन में से एक बच्चा कुपोषण से ग्रस्त है। वहीं आधे से अधिक बच्चे और महिलाएँ एनीमिया यानी शरीर में खून की कमी से ग्रसित हैं। वहीं, मोटापे का दर भी बढ़ता जा रहा है। इस प्रकार हमारा देश कुपोषण का तिहरा बोझ झेल रहा है। पोषण आधारित कृषि, स्वस्थ एवं विविध आहार प्रणाली द्वारा कुपोषण, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और अति-पोषण पर काबू पाया जा सकता है।

आहार एवं पोषक तत्व

हम सभी जानते हैं भोजन शरीर की मूलभूत आवश्यकता है। संतुलित आहार से प्राप्त उचित पोषण द्वारा व्यक्ति का शरीर स्वस्थ एवं सशक्त रहता है। मानसिक स्वास्थ्य के लिए उचित पोषण और संतुलित आहार अत्यधिक आवश्यक है। आहार की स्वास्थ्य एवं रोग की स्तिथियों में महत्वपूर्ण भूमिका है। सही पोषण से बच्चों का शारीरिक तथा मानसिक विकास अच्छा होता है। उचित पोषण से उत्पादकता में बढ़ोतरी होती है, जिससे देश का बेहतर भविष्य सुनिश्चित होता है। बदलती हुई जीवनशैली को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक हो गया है की सभी आयु वर्गों में उचित तथा संतुलित पोषण को बढ़ावा दिया जाए। एक स्वस्थ और सुपोषित समाज द्वारा ही एक विकसित देश का निर्माण होता है।

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आहार के विषय में सोचते ही हमारे मस्तिष्क में अनेक चित्र उभरते हैं। आहार के अंतर्गत वह सभी खाद्य पदार्थ आते हैं जिन्हें हम खाते या पीतें हैं। हमारा आहार अनेक छोटी-छोटी इकाईयों से निर्मित है जो शरीर को पोषण प्रदान करते हैं, यह पोषक तत्व कहलाते हैं। यह पोषक तत्व शरीर में विशिष्ट कार्यों हेतु निर्धारित मात्रा में आवश्यक होते हैं। पोषक तत्वों की यह मात्रा यदि आवश्यकता से अधिक या कम होती है, तो यह स्तिथि असंतुलन की होती है जिसके परिणामस्वरुप व्यक्ति में कुपोषण (अतिपोषण या अल्पपोषण) देखा जा सकता है। इस स्तिथि में व्यक्ति बीमार हो जाता है या उसकी शारीरिक वृद्धि में रुकावट आ जाती है। पोष्टिक तत्य निम्न प्रकार के होते है-

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कार्बोहायड्रेट: यह पोषक तत्व ऊर्जा का मुख्य स्त्रोत है।
प्रोटीनः शारीरिक वृद्धि एवं उत्तकों के मरम्मत के लिए आवश्यक है।
वसाः उर्जा का संधन स्त्रोत तथा वसा में घुलनशील विटामिन को अवशोषित करने के लिए आवश्यक है।
विटामिन एवं खनिज लवणः शारीरिक प्रक्रियाओं के विनियमन तथा बिमारियों से बचाव करते हैं।
संतुलित आहार की संकल्पना: संतुलित आहार में सभी खाद्य समूहों से खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं और यह शरीर की सभी पोषक तत्वों की आवश्यकता पूर्ण करता है। कोई भी एक या दो खाद्य पदार्थ शरीर को समस्त पोषक तत्व प्रदान नहीं कर सकते। केवल विविध खाद्य पदार्थों द्वारा ही शरीर की पोषक तत्वों की आवश्यकता पूर्ण की जा सकती है। संतुलित आहार में मौजूद जैव सक्रिय एवं पादप रसायन स्वास्थ्य को बढ़ावा देते हैं और विभिन्न बिमारियों से बचाव करते हैं।

संतुलित आहार निस्सालिखित बिन्दुओं पर आधारित है-

  • आहार में विविधता होनी चाहिए। विभिन्न खाद्य पदार्थों जैसे
    फल, सब्जियों, फलियों, सूखे मेवे, साबुत अनाज एवं दुग्ध पदार्थ हमारे आहार में सम्मिलित हों।
  • ऊर्जा के व्यय एवं सेवन में संतुलन होना चाहिए, जिससे वजन को नियंत्रित रखा जा सके।
  • मोटे एवं अपरिष्कृत अनाज (जिनमें अधिक मात्रा में पोषक तत्व एवं रेशे पाए जाते हैं), उन्हें आहार में सम्मिलित करें।
  • रेशे युक्त खाद्य पदार्थों, श्री अन्न, फल, सब्जियों, साबुत दालों एवं फलियों का आहार में अधिक प्रयोग करें।
  • वसा, चीनी एवं नमक का सीमित सेवन करना।
  • एक समय पर भरपेट भोजन करने की अपेक्षा छोटे-छोटे अंतरालों पर कम मात्रा में भोजन ग्रहण करें।
  • वसा एवं तेल के माध्यम से शरीर को प्रतिदिन 30 प्रतिशत से कम एवं शक्कर से 5 प्रतिशत से कम ऊर्जा प्राप्त हो।
  • नमक का दैनिक उपयोग पांच ग्राम या उससे कम हो।
  • आहार में डालडा का उपयोग नहीं करें।
  • विभिन्न प्रकार के वनस्पति तेलों का प्रयोग, जैसे सरसों, मूंगफली, सूरजमुखी, अधिक स्वास्थ्यवर्धक होता है।
  • पर्याप्त मात्रा में पानी व अन्य तरल पदार्थों का सेवन करें।
  • उन पाक विधियों का चुनाव करें जिसके प्रयोग द्वारा पोषक तत्वों को न्यूनतम क्षति हो, उदहारणतः भाप में पकाना, प्रेशर कुक करना।
  • उच्च वसा, चीनी, नमक युक्त एवं अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का कम सेवन करें।
  • भोजन को खरीदने से पूर्व बाहरी पैकेट में दी गई जानकारी को पढ़ें।
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