किसानों की सफलता की कहानी (Farmer Success Story)

इंजीनियर किसान को मिल रही दुगुनी कीमत

परम्परागत तरीके से बनी तुअर दाल

  • इंदौर (विशेष प्रतिनिधि)

28 मार्च 2023, इंजीनियर किसान को मिल रही दुगुनी कीमत यदि कृषि में नवाचार किए जाएं तो किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिल सकता है। इसे सिद्ध किया है ग्राम बामोरा तहसील उज्जैन के सॉफ्टवेयर इंजीनियर एवं उन्नत कृषक श्री राजाराम गोयल ने। इन्होंने प्राकृतिक खेती से उत्पादित तुअर की हस्तचलित घट्टी से दाल बनाई। गुणवत्ता और स्वाद में बेजोड़ होने से इन्हें इस दाल की बाजार से दुगुनी कीमत मिल रही है। हालात यह है कि ग्राहकों के आर्डर की पूर्ति 3-4 माह में कर पा रहे हैं। सरकार की किसानों की आय दुगुनी करने की मंशा को इन्होंने चरितार्थ किया है।

श्री राजाराम गोयल ने कृषक जगत को बताया कि सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनने के बाद प्रतिष्ठित कंपनियों में नौकरी की, लेकिन मन तो खेती में ही लगता था, इसलिए दो साल पहले नौकरी छोडक़र स्वयं की 4 बीघा जमीन में खेती शुरू की। तुअर की फसल लेना शुरू किया। अंतरवर्तीय  में सब्जियां लगाईं। खरीफ में मूंग/उड़द भी लगाया। उत्पादन अच्छा मिला। नया प्रयोग यह किया कि हस्त चलित परम्परागत पत्थर की घट्टी से दाल बनाकर बेची। प्रतिसाद अच्छा मिला,तो आसपास के किसानों की 20 बीघा जमीन अनुबंध पर किराए से ले ली। जिसमें अलग-अलग देसी और अन्य किस्में लगाईं। 15 बीघा में 60 साल पुराना देसी तुअर बीज बोया। उत्पादन 3 क्विंटल/बीघा का मिला। एक अन्य किस्म में 8 क्विंटल/बीघा का उत्पादन भी मिला। 7 बीघा में महाराष्ट्र की तुअर किस्म गजब-5 लगाई है। इसकी दो बार तुड़ाई होती है, जो हाथ से की जाती है। पहली तुड़ाई में 3 क्विंटल/बीघा का उत्पादन मिला, जबकि दूसरी तुड़ाई में 4 क्विंटल/बीघा उत्पादन होने की उम्मीद है।

श्री गोयल ने बताया कि पूर्णत: प्राकृतिक रूप से उत्पादित तुअर की परम्परागत तरीके से हाथ घट्टी से दाल बनाई जाती है, जिसमें गांव की अनुभवी उम्रदराज महिलाओं की मदद ली जाती है, जिससे उन्हें भी रोजगार मिल जाता है। यह प्राकृतिक शुद्ध देसी तुवर दाल 220 रु किलो बिकती है, जबकि बाजार में रसायन वाली मशीन निर्मित दाल की कीमत अभी 110 रु किलो है। दुगुनी कीमत में भी लोग खरीदने को तैयार है। इस दाल की विशेषताएं बताते हुए उन्होंने कहा कि इसे पकाने के लिए कुकर की जरूरत नहीं पड़ती है। इसे तपेली या हांडी में बनाया जा सकता है। इसमें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक एसिड बाहर निकल जाता है। दूसरी खास बात यह है कि इसे तपेली में बनाने पर दाल की मात्रा भी कम लगती है, जबकि कुकर में पकाने पर दाल दुगुनी लेनी पड़ती है। यह दाल पानी में पूर्णत: घुलनशील और स्वाद में भी उत्तम है। गुणवत्ता अच्छी होने से मांग अच्छी है, लेकिन हर माह 3 क्विंटल तक के ही आर्डर लेते हैं। इसीलिए ग्राहकों की मांग की पूर्ति करने में 3-4  माह लग जाते हैं, फिर भी ग्राहक इस प्राकृतिक और देसी तरीके से निर्मित तुअर दाल का इंतजार करते हैं।

देवास के श्री दीपक राव के साथ मिलकर श्री गोयल 500 किसान सदस्यों वाली उनकी  ‘श्री दीप ज्योति किसान प्रोड्यूसर कम्पनी’ में भी सहयोग करते हैं। इस कम्पनी द्वारा कोई सरकारी आर्थिक सहायता नहीं ली गई है। यहाँ किसानों को प्रशिक्षित कर उन्हें बीज से लेकर बाजार तक में मदद की जाती है। इनका जैविक बाजार भी है,जहाँ प्राकृतिक सब्जियों, दालों के अलावा प्राकृतिक गुड़, कच्ची घानी का शुद्ध तेल आदि खाद्य सामग्री उपलब्ध है। इसके लिए कच्चा माल सदस्य किसानों द्वारा ही उपलब्ध कराया जाता है। यहाँ सदस्य किसानों को एक एकड़ में एक लाख तक की कमाई के लिए आश्वस्त किया जाता है।

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