बारानी खेती और जल संरक्षण

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बारानी खेती और जल संरक्षण

बारानी अर्थात् वर्षा आधारित क्षेत्र जो कि देश में 65-70 प्रतिशत है में जल संरक्षण के महत्व से सभी परिचित हैं। जल संरक्षण के उचित प्रबंधन में कमियों के चलते इस विशाल क्षेत्र से उत्पादन आकांक्षाओं से कम होता है। परिणामस्वरूप औसत उत्पादकता का स्वरूप ही बदल जाता है। हमारे देश में बारानी खेती का आधार दक्षिण-पश्चिम मानसून है इसके द्वारा कुल वर्षा का लगभग 74 प्रतिशत भाग इसी से पूरा होता है यह वर्षा जून से सितम्बर के मध्य होती है जो बारानी खेती के लिये अमृत के समान है।

देश की औसत वर्षा लगभग 1150 मि.मी. है जो पर्याप्त है परंतु इस वर्षा का वितरण बहुत ही असमान है एक ओर जहां राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में औसत वर्षा 100 मि.मी. से भी कम है तो दूसरी ओर चेरापूंजी में औसत वर्षा 10,000 मि.मी. तक हो जाती है परंतु इसके उचित प्रबंधन होने से ना केवल राजस्थान में वर्षा की कमी होती बल्कि वर्षा उपरांत चेरापूंजी जैसे क्षेत्र में भी कमी हो जाती है मानसून के द्वारा उपलब्ध कीमती जल पहाड़ों, खेतों से निकलकर नाले, नदियों में बहकर अपने साथ हजारों क्विंटल कीमती भूमि भी बहाकर ले जाता है और सब कुछ समुद्र की भेंट चढ़ जाता है।

मानसून की इस विषमता के कारण देश में कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ की स्थिति बन जाती है और अनेकों चुनौतियों का सामना शासन और कृषकों को करना होता है। बारानी क्षेत्रों में सतत प्रचार-प्रसार, मैदानी कार्यकर्ताओं कृषि विशेषज्ञों के द्वारा किये जाने के बावजूद भी इस क्षेत्र की उत्पादकता सिंचित क्षेत्रों की तुलना बहुत कम होती है। परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों में गरीबी ने अपना डेरा डाल रखा है यदि वर्षा आधारित खेतों में उचित जल प्रंबधन के उपाय जैसे वर्षा के दौरान खेत से बहते जल को रोककर मेढ़बंदी करके किया जाये तो भूमि के जलस्तर में इजाफा होगा और बोई गई फसलों में लंबे समय तक पर्याप्त नमी उपलब्ध हो सकेगी।

जैसे की पूर्व में सुझाया गया था इसकी तैयारी ग्रीष्मऋतु मेें ही कर ली जाना चाहिये खेत की गहरी जुताई ताकि अधिक गहराई तक वर्षा जल समा जाये शेष जल को खेत के निचले हिस्से में जमा करके उसका उपयोग प्राणरक्षक सिंचाई के रूप में किया जा सके। वर्षा जल को खेत का पानी खेत में और गांव का पानी गांव के आधार में मानकर उसे फालतू बहने पर रोक लगायें, इस कार्य से एक तीर से दो शिकार होंगे खेतों में पर्याप्त नमी के साथ-साथ खेतों की ऊपरी सतह से कीमती मिट्टी के क्षरण पर भी रोक लग सकेगी अनुसंधान बताता है कि खेत के ऊपर की दो इंच भूमि बहुत अच्छी और कीमती होती है जिसे बहाकर समुद्र में भेजने के बजाय अपने खेतों पर संजों कर रखें, अनुसंधान यह भी बताता है कि इस एक-दो इंच भूमि के बनने में सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं अतएव बेकाबू वर्षा जल के बहाव पर उसका संरक्षण किया जाना आज की महती आवश्यकता है। ढालू खेतों में पट्टीदार खेती करके जल एवं भूमि का संरक्षण किया जा सकता है। वर्तमान में केंद्र एवं राज्य की सरकार बारानी क्षेत्रों में वर्षाजल का समुचित उपयोग के लिए उन क्षेत्रों में समग्र एवं स्थाई प्रयास करने पर जोर दे रही है।

देश के वर्षा सिंचित क्षेत्रों की समस्या पर विशेष ध्यान देने एवं जल संरक्षण के लिये राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण की स्थापना भी की गई है। जो बारानी खेती में वर्षा जल संरक्षण के उपयोग के ठोस उपाय जो अनुसंधान आधारित है का विस्तार प्रचार- प्रसार किया जा रहा है। माना जाता है कि आने वाले समय में यदि इस जल का संरक्षण गंभीरता से नहीं किया गया तो अगली लड़ाई जल के लिये हो सकती है। कृषकों से आग्रह है कि इस वर्ष से ही वर्षा जल के उचित प्रबंधन पर और अधिक गंभीरता से कार्य करंे ताकि बारानी क्षेत्रों से अधिक उत्पादन प्राप्त करके गरीबी की लड़ाई का पटाक्षेप हो सके।

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