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18 जनवरी 2021, भोपाल। अब बारी है चौकसी की- रबी फसलों की बुआई का कार्यक्रम लगभग प्राय: पूरा हो चला है। हाल ही में हुई वर्षा के कारण भूमि में नमी की उपलब्धता का लाभ उठाकर विलम्ब से बोये जाने वाले गेहूं का रकबा भी बढ़ा होगा। बुआई उपरांत फसलों के रखरखाव मुख्यत: पौध संरक्षण कार्यों में यदि कोताही की गई तो लक्षित उत्पादन के लक्ष्य को छूना असंभव होगा। इसलिये सतत खेत की निगरानी करते रहना चाहिये। मौसम विभाग के द्वारा प्रसारित प्रसारण को सुनकर फसल सुरक्षा का पुख्ता प्रबंध रखना होगा। वर्तमान में देश के उत्तरी क्षेत्रों में बर्फवारी के कारण तापमान गिरते जा रहा है। गिरते तापमान में सबसे बड़ा खतरा पाले का होता है, पाला पलक मारते ही फसलों को चौपट करने की क्षमता रखता है यही कारण है कि तापमान पर पैनीनजर रखते हुए पाला का अंदेशा होते ही शाम के समय कूड़ा/कचरा जला कर खेतों में धुआं फैलाना सबसे उत्तम बचाव हो सकता है। इससे दो लाभ होते हैं। कूड़े/कचरे से निजात तथा पाले से बचाव, धुआं के कारण वातावरण और फसलों के बीच एक हल्की सी परत का निर्माण होता है और गिरते तापमान से बचाव होकर पाले की स्थिति टल जाती है।

आलू फसल पर पिछेती झुलसा (लेटब्लाईट) के प्रकोप की खबर है यह रोग भी पल भर में प्रलय करने की क्षमता रखता है, इसका भी सीधा संबंध तापमान, आद्र्रता से होता है। शाम के समय कोई भी ताम्रयुक्त फफूंदनाशी जैसे धानुकॉप, ब्लाईटाक्स 50, फाईटोलान, ब्लूकापर, अनुकाप, विलकाप, देवीकाप के दो छिड़काव 15 के अंतर से करने से इस रोग से आलू फसल बचाई जा सकती है। उल्लेखनीय है कि मावठे के पानी के साथ-साथ गेहूं के सबसे बड़े दुश्मन गेरूआ रोग की फफूंदी हिमालय पालनी पहाड़ी से हवा द्वारा स्थानान्तर होकर मैदानी क्षेत्र में लगे गेहूं पर आक्रमण करती है विशेषकर स्थानीय किस्मों के गेहूं के खेत जो नदी किनारों पर है वहां मावठा गिरने के 14-15 दिनों के भीतर गेरूआ प्रगट हो सकता है निचली पत्ती पर चोरी-छिपे इसका विस्तार होता रहता है जहां से पनपा गेरूआ अन्य क्षेत्रों में गेहूं पर रोग फैलाने में सक्षम हो जाता है।

वर्षा आधारित गेहूं जिसकी बुआई अक्टूबर में हो चुकी है की चौकसी की जाये तो अच्छा होगा। बचाव के लिए डाईथेन एम 45 का एक छिड़काव कर दिया जाये ताकि अनजाने में पनपते गेरूआ के विस्तार पर रोग लग सके। रबी दलहनी में चने की फसल पर इल्ली हमेशा सक्रिय रहती है यह इल्ली पूरे विश्व में चने की फसल के लिये एक चुनौती है परंतु इससे बचाव के साधन हमारे हाथों में होता है। यदि उनका अंगीकरण सभी कृषक करें तो इससे मुकाबला सरल हो जायेगा। वास्तविकता यह है कि खेतों में मित्र कीट इस समय क्रियाशील रहते हैं यदि जहरीली दवाओं का उपयोग एकाएक शुरू कर दिया गया हो तो इन कीटों के जीवन पर संकट आ जायेगा इस कारण पहले खेतों में टी आकार की खूटियां, चने की खुटाई, फेरोमेन ट्रेप इत्यादि लगायें इल्ली के प्रथम दर्शन के बाद पहले जैविक कीटनाशकों का उपयोग करें यदि उससे लाभ नहीं मिल पा रहा है तो चने की घेंटी अवस्था में ही कीटनाशकों का उपयोग किया जाये यदि उपरोक्त सीमाओं को लांघ कर एकाएक जहरीले कीटनाशकों का उपयोग से कृषकों की लड़य्या दौड़ प्रवृत्ति से प्रभावित होकर किया गया हो तो लाभ की जगह हानि अधिक होगी. इल्लियों से लड़ाई एक जुआं का खेल हो जायेगा। जिसमें धीरे-धीरे रकम खर्चहोती जायेगी और नतीजा सिफर रहेगा। इस कीट से निपटने के लिये पहले बचाव के सिद्धांतों का पालन करें फिर उपचार को अहमियत दी जाये तभी सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो सकें।

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