खेत की तैयारी में मशीनें मददगार

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8 अप्रैल 2021, भोपाल ।  खेत की तैयारी में मशीनें मददगार – प्रकृति की आंख मिचौली के बीच-बचते बचाते आखिर रबी फसलों की कटाई-गहाई, भण्डारण का उपसंहार चल रहा है। अच्छे परिणाम की स्थिति स्पष्ट नजर आ रही है। खेती एक निरंतर क्रिया है। जैसे समय की गति को कोई नहीं रोक पाया। वर्तमान की खेती भी उसी समय की धुरी से बंधी चलती है और चलती रहती है। शायद ही कोई ऐसा वक्त हो जब खेती से जुड़ा कोई कार्य न करना हो। कटाई, गहाई, भण्डारण के साथ-साथ जायद फसलों के रखरखाव, पूर्व में लगी कद्दूवर्गीय जायद फसलों के रखरखाव के साथ खाली खेतों की तैयारी पूरी निष्ठा और महत्वपूर्ण मानकर की जाये तो भविष्य की खेती अच्छी होगी। सफलता कदम चूमेगी। इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है। वर्तमान में कम्बाईन से अधिकतर गेहूं की फसल काटी जाती है जो कि रबी की प्रमुख फसल है। कटाई उपरान्त बचे अवशेषों को जलाने की क्रिया पर तो करीब-करीब अंकुश लग चुका है। शायद ही अब कोई कृषक ऐसे होंगे जो नरवाई जलाने के कुप्रभाव से परिचित ना हो। वर्तमान में स्ट्रारीपर का उपयोग प्राय: हर जगह होने लगा है इससे कृषकों को भूसे जो पशुओं के लिये आवश्यक है मिल जाता है और अतिरिक्त आय भी सम्भव हो चुकी है यह यंत्र बहुत ही उपयोगी साबित हुआ है।

उल्लेखनीय है कि शासन द्वारा इस यंत्र को खरीदने के लिए अनुदान की पात्रता भी है। शासन द्वारा कुछ चयनित जिलों में ‘कस्टम हायरिंगÓ नाम से खेती के लिए उपयोगी यंत्रों कृषकों को किराये पर दिये जाने की सुविधा भी उपलब्ध है इसके अलावा रोटावेटर जो कि ट्रैक्टर के पी.टी.ओ. से चलाया जाता है। खेत की जुताई के लिए बहुत ही उपयोगी है। केवल एक बार में ही भूमि की तैयारी अच्छी तरह से निपटा देता है। इसके उपयोग से भूमि की तैयारी के मद में खर्च होने वाली राशि से 20-25 प्रतिशत तक की बचत सम्भव है। इसके उपयोग से भूमि में उपलब्ध कुछ जिद्दी खरपतवार भी नष्ट हो जाते हैं। इस यंत्र की एक और विशेषता है कि धान के खेतों में पडलिंग (मचाई) का कार्य भी बड़ी सरलता से किया जा सकता है। इस यंत्र के क्रय पर भी शासन द्वारा अनुदान की पात्रता है। कहने का तात्पर्य यह है कि आज की खेती में मशीनों का उपयोग समय, श्रम और अर्थ तीनों की बचत करना सम्भव हो गया है। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई कार्य एक परिणाम अनेक माने जाते हैं। मिट्टी का भुरभुरापन मानसून के जल को अधिक से अधिक समेटने की क्षमता को बढ़ाता है। कहना ना होगा परन्तु यह सत्य है कि आज भी देश की 60 से 70 प्रतिशत खेती वर्षा आधारित ही है और भूमि में जल का खजाना जितना भरपूर होगा असिंचित फसलों को लाभ उतना ही होगा। उत्पादकता बढ़ सकेगी।

आमतौर पर खरीफ फसल गहरी जड़ों वाली होती है। भूमि में जितनी गहराई तक नमी रहेगी पौधे उतने ही अच्छे विकसित हो सकेंगे। खेत की तैयारी से कीट, रोग के अवशेष जो मिट्टी में छिपे रहते हैं। उनका भूमि के ऊपर आना स्वाभाविक हो जाता है। गर्मी के 45-46 डिग्री से.मी. तापमान में अवशेष नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार खरपतवारों के बीज जो नमी पाकर अंकुरित हो जाते हैं उन्हें भी मिट्टी में भीतर समेटा जाकर जैविक खाद जैसा उपयोग किया जाना सम्भव हो जाता है। ध्यान रहे खेत अच्छी तरह एक बार बनता है जिस पर खरीफ-रबी और आंशिक क्षेत्र में जायद फसलों का दबाव बनाता है। इस कारण इस ग्रीष्मकालीन खेत की तैयारी को 12 माह के हिसाब से ही किया जाना चाहिए। अब चूंकि यंत्र सभी कार्य के लिए उपलब्ध हंै। उनका उपयोग गम्भीरता से खेत बनाये ऊबड़-खाबड़ जगह की मिट्टी समेट कर गड्ढों में भरकर समतलीकरण करें ताकि खेत एक काली चादर से चमके इसके साथ-साथ मेढ़ों की सफाई भी की जाये तो सोने पर सुहागा होगा।

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