संपादकीय (Editorial)

कृषि लाभकारी कैसे बने

22 जुलाई 2021, भोपाल । कृषि लाभकारी कैसे बने – वर्तमान में कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिये सभी स्तर पर प्रयास चलाये जा रहे हैं। चाहे वो कृषक हो या कृषि विभाग के मैदानी कार्यकर्ता अथवा शासन की नीतियां हों, सभी में कृषि को लाभकारी बनाने का समावेश किया जा रहा है। वास्तविकता यही है कि किसी प्रकार से यदि खेती की लागत में कमी हो गई हो तो खेती अपने आप लाभकारी होने लगेगी। कृषि अनुसंधानों द्वारा विकसित तथा सिफारिश की गई अनेकों सिफारिशों में कम लागत में अधिक आमदनी के कुछ सुझाव हैं जिनको अपनाने में अतिरिक्त व्यय नहीं करना पड़ता है परंतु लाभ अत्यधिक प्राप्त किया जा सकता है। यह समय बुआई का है खरीफ की प्रमुख फसलों में सोयाबीन, धान, कपास, ज्वार, मक्का तथा अन्य लघु धान्य आती हंै जिनकी बुआई की जाना है। जैसा कि सर्वविदित है पिछले कुछ वर्ष पहले सोयाबीन फसल की परसी थाली प्रकृति ने हाथों से छीन ली थी। शासन के प्रयासों के बाद भी पर्याप्त अच्छा बीज उपलब्ध कराना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं हैै। कृषकों के सम्पर्क से ज्ञात हुआ है कुछ बीज बाहर से तथा कुछ पिछले वर्ष का बचा है का उपयोग इस वर्ष किया जाना है।

सोयाबीन के बारे में सतत बताया तथा चेताया भी गया है कि भंडार में यह रखी सामग्री एक अनाज है, बीज कदापि नहीं है उसे बीज बनाने के लिए उसकी छंटाई-छनाई तथा तीन प्रकार के बीजोपचार इस वर्ष तो अत्यंत जरूरी हंै क्योंकि यदि खराब कूड़ा-कचरा वाला अनाज खेतों में पहुंच गया तो इसका असर अंकुरण पर होगा। अच्छा अंकुरण अधिक उत्पादन की प्रथम सीढ़ी है। अनुसंधान बताता है अनाज की केवल छंटाई-छनाई से 2-3 क्विंटल तक का उत्पादन/हे. बढ़ाया जा सकता है साथ में यदि बीजोपचार कर दिया गया हो तो यह सोने में सुहागा जैसा होगा और उत्पादन में 5 क्विंटल/ हेक्टर तक का इजाफा किया जाना कोई असंभव बात नहीं है। सोयाबीन का अंकुरण परीक्षण करके ही उसकी बीज दर निर्धारित की जाये ताकि प्रति ईकाई पौध संख्या पर्याप्त हो सके। अंकुरण परीक्षण बिना खर्च के घर में ही किया जा सकता है। इन कार्य में कोई अधिक खर्च नहीं आयेगा। परंतु लाभ जरूरी ही होगा। अन्य खरीफ फसलों के अनाज को भी बीज बनाकर ही बोया जाये। बोआई समय पर की जाना जरूरी है परंतु बुआई मानसून की सक्रियता पर निर्भर रहती है कम से कम 4 इंच पानी गिरने के बाद ही बुआई की जाये। ग्रामीण क्षेत्रों में बुआई की लड़य्या दौड़ में अक्सर गलत समय और गलत खेत में बोनी की जाकर बीज बर्बाद हो जाता है चूंकि इस वर्ष बीज की त्राही-त्राही मची हुई है। पूर्ण विवेक एवं धीरज से जांच पड़ताल के बाद ही बुआई की जाये। बीज अधिक गहरा ना जावे तथा अंकुरण उपरांत खेतों में 10 दिनों तक तकाई कराके चिडि़य़ा, तोता से कोमल कोपलों को बचाया जाये ताकि उपलब्ध पोषक तत्व का उपयोग केवल पौधे ही कर सकें। अधिक से अधिक क्षेत्र में अंतरवर्तीय फसल पद्धति अपनाई जाये ताकि ‘मोनोकल्चर’ एक ही फसल बोकर किसी आपदा को आमंत्रित नहीं किया जाये। बीज/उर्वरक मिश्रण पर पूर्ण विराम लगे ताकि महंगे उर्वरकों के उपयोग का पूर्ण दोहन हो सके साथ ही संतुलित उर्वरक उपयोग भी किया जाये, मेढ़ों पर अरंडी तथा अरहर लगाकर अतिरिक्त कमाई के साधन बनाये जायें। कृषकों को चाहिये कि उनके हाथों में कम लागत की तकनीकी का अंगीकरण करना है तो अभी से उसके लिये प्रयासरत हो जायें और लक्षित उत्पादन में अपना योगदान प्रदान करें।

Advertisements
Advertisement
Advertisement
Advertisements
Advertisement
Advertisement