कोदो और कुटकी की खेती: उन्नत तकनीक, किस्में और औषधीय लाभ
भोपाल: वर्तमान में कोदो और कुटकी की खेती (Focus Keyphrase) वर्तमान में एक लाभदायक व्यवसाय बन चुकी है। इसलिए, किसानों को इसकी वैज्ञानिक तकनीक समझना आवश्यक है। सबसे पहले, बात करते हैं इसके पोषण की। यह अनाज प्रोटीन और फाइबर से भरपूर है। इसके साथ ही, इसमें कई औषधीय गुण भी पाए जाते हैं।
मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में कोदो और कुटकी की खेती पारंपरिक रूप से की जाती रही है, जिसे अब वैज्ञानिक तरीके से उन्नत बनाया जा रहा है।
कोदो: ‘शुगर फ्री’ चावल और पोषण का आधार
कोदो (वानस्पतिक नाम: Paspalum scrobiculatum) की खेती मुख्य रूप से अनाज के लिए की जाती है। कोदो भारत का एक प्राचीन अन्न है जिसे प्राचीन काल में ऋषि अन्न माना जाता था। इसे कम बारिश वाले क्षेत्रों में मुख्य रूप से उगाया जाता है। इसकी फसल को ‘शुगर फ्री चावल’ के तौर पर पहचाना जाता है। कोदो की खेती कम मेहनत वाली खेती है, जिसकी बुवाई बारिश के मौसम के बाद की जाती है।
इसका उपयोग उबालकर चावल की तरह खाने में किया जाता है। प्रयोग करने से पूर्व इसके दाने के ऊपर उपस्थित छिलके को कूटकर हटाना आवश्यक रहता है। कोदो के दानों से जो चावल निकलता है, उसे स्थानीय बोली में ‘भगर के चावल‘ के नाम से उपवास में भी खाया जाता है। इसके दाने में 8.3% प्रोटीन, 1.4% वसा तथा 65.9% कार्बोहाइड्रेट पाई जाती है।
कुटकी: विषम परिस्थितियों की रक्षक फसल
कुटकी (वैज्ञानिक नाम: Panicum sumatrense) वर्षा ऋतु की फसलों में सबसे पहले तैयार होने वाली धान्य प्रजाति है। पिछड़े और आदिवासी क्षेत्रों में इसे सबसे अधिक पसंद किया जाता है, जहाँ छत्तीसगढ़ में इसे ‘चिकमा‘ नाम से भी जाना जाता है। प्रतिकूल मौसम के प्रति सहनशीलता के कारण इसे अक्सर ‘गरीबों की फसल’ की संज्ञा दी गई है।
उत्पादन की दृष्टि से यह जल्दी पकने वाली फसल है, जो सूखा और जल-भराव जैसी विषम परिस्थितियों को आसानी से सहन कर लेती है। पोषक तत्वों के मामले में यह एक अत्यंत समृद्ध लघु धान्य है। इसके 100 ग्राम दाने में 8.7 ग्राम प्रोटीन, 75.7 ग्राम कार्बोहाइड्रेट और 5.3 ग्राम वसा के साथ-साथ 8.6 ग्राम रेशा (फाइबर) पाया जाता है। खनिज तत्वों की बात करें तो इसमें कैल्शियम एवं फास्फोरस भी प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं।
खेती और क्षेत्रीय महत्व
लघु धान्य फसलों की खेती खरीफ के मौसम में की जाती है। सांचा, काकुन एवं रागी को मक्का के साथ या रागी को कोदो के साथ मिश्रित फसल के रूप में लगाया जाता है।
- पकने की अवधि: ये फसलें 60-80 दिनों में पककर तैयार हो जाती हैं। अगस्त के अंतिम सप्ताह या सितंबर के प्रारंभ में जब अन्य खाद्यान्न महंगे होते हैं, तब ये फसलें महत्वपूर्ण आधार बनती हैं।
- प्रमुख क्षेत्र: जबलपुर संभाग में ये फसलें अधिकतर डिण्डौरी, मण्डला, सिवनी एवं जबलपुर जिलों में ली जाती हैं।
भूमि का चयन एवं तैयारी
हल्की भूमि जिसमें पानी का निकास अच्छा हो, कोदो और कुटकी की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। उथली और कम उपजाऊ मिट्टी में भी यह फसल अच्छी पैदावार देती है। कोदो-कुटकी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे लगभग हर प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। जहाँ अन्य अनाज वाली फसलों का उत्पादन कठिन होता है, वहाँ भी ये फसलें अच्छी उपज देती हैं।
- मिट्टी का प्रकार: ये फसलें उतार-चढ़ाव वाली, कम जल धारण क्षमता (Water Holding Capacity) वाली और उथली सतह वाली कमजोर भूमियों में भी आसानी से उगाई जा सकती हैं।
- उपयुक्त भूमि: हल्की भूमि, जिसमें पानी की निकासी (Drainage) की अच्छी व्यवस्था हो, इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। यदि जल निकासी का प्रबंध उत्तम हो, तो लघु धान्य फसलें प्रायः सभी प्रकार की मिट्टी में अच्छा प्रदर्शन करती हैं।
- खेत की तैयारी: 1. गर्मी की जुताई: सबसे पहले गर्मी के मौसम में खेत की एक गहरी जुताई करें। 2. जुताई व बखर: मानसून की पहली वर्षा होने के बाद पुनः खेत की जुताई करें या बखर चलाएं। 3. मिट्टी का भुरभुरा होना: खेत को तब तक तैयार करें जब तक मिट्टी अच्छी तरह से भुरभुरी न हो जाए, जिससे बुवाई के समय बीजों का अंकुरण सही तरीके से हो सके।
बीज का चुनाव एवं बीज की मात्रा
फसल की अच्छी पैदावार के लिए सही बीज और उचित मात्रा का चयन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- किस्मों का चयन: किसान अपनी भूमि के प्रकार के अनुसार ही उन्नत किस्म के बीजों का चुनाव करें। विशेषकर हल्की पथरीली व कम उपजाऊ भूमि के लिए जल्दी पकने वाली जातियों का चयन करना लाभदायक होता है।
- बीज की मात्रा (प्रति हेक्टेयर): * कतारों में बुवाई (Line Sowing): 8-10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।
- छिटकवां बोनी (Broadcasting): 12-15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर।
- बुवाई की विधि: हालांकि लघु धान्य फसलों को पारंपरिक रूप से छिटकवां विधि से बोया जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार कतारों में बुवाई करना अधिक फायदेमंद है।
- लाभ: कतारों में बोनी करने से निंदाई-गुड़ाई (Weeding) में आसानी होती है, पौधों को समान पोषण मिलता है और अंततः कुल उत्पादन में वृद्धि होती है।
कोदो की उन्नत किस्में (Improved Varieties of Kodo)
भूमि की उर्वरता और पानी की उपलब्धता के आधार पर सही किस्म का चुनाव उत्पादन बढ़ा सकता है। कोदो की प्रमुख उन्नत किस्में और उनकी विशेषताएं नीचे दी गई हैं:
| किस्म का नाम | पकने की अवधि (दिन) | मुख्य विशेषताएं | औसत उपज (क्विं./हे.) |
| जवाहर कोदो 48 (डिण्डौरी-48) | 95-100 | पौधों की ऊंचाई 55-60 सेमी होती है। | 23-24 |
| जवाहर कोदो 43 | 100-105 | पौधों की ऊंचाई 55-60 सेमी। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त और सूखा सहन करने में सक्षम। | 20-22 |
| जवाहर कोदो 41 | 105-108 | दानों का रंग हल्का भूरा। पौधों की ऊंचाई 60-65 सेमी। | 20-20 |
| जवाहर कोदो 62 | 50-55 | पौधों की ऊंचाई 90-95 सेमी। पत्ती के धारीदार रोग के प्रति प्रतिरोधी। कम उपजाऊ भूमि के लिए उत्तम। | 20-22 |
| जवाहर कोदो 76 | 85-87 | यह किस्म ‘तने की मक्खी’ (Stem Fly) के प्रकोप से मुक्त रहती है। | 16-18 |
| जी.पी.यू.के. – 3 | 100-105 | दाना बड़ा और गहरे भूरे रंग का। पूरे भारत में खेती के लिए अनुशंसित। | 22-25 |
कुटकी की उन्नत किस्में (Improved Varieties of Kutki)
कुटकी अपनी जल्द पकने की क्षमता और विषम परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए जानी जाती है। यहाँ इसकी कुछ प्रमुख किस्में दी गई हैं:
| किस्म का नाम | पकने की अवधि (दिन) | मुख्य विशेषताएं | औसत उपज (क्विं./हे.) |
| जवाहर कुटकी 4 | 75-80 | एकल (Sole) और मिश्रित फसल के लिए उपयुक्त। सूखा प्रतिरोधी और शूट फ्लाई (Shoot Fly) व हेड स्मट के प्रति प्रतिरोधी। | 13-15 |
| जवाहर कुटकी 1 (डिण्डौरी-1) | 75-80 | बीज हल्का काला और बाली की लंबाई लगभग 22 सेमी होती है। | 8-10 |
| जवाहर कुटकी 2 (डिण्डौरी-2) | 75-80 | इसका बीज हल्का भूरा और आकार में अण्डाकार (Oval) होता है। | 8-10 |
| जवाहर कुटकी 8 | 80-82 | दाना हल्का भूरा। पौधे की लंबाई 80 सेमी और प्रति पौधा 8-9 कल्ले (Tillers) निकलते हैं। | 8-10 |
| सी.ओ. (C.O.) – 2 | 80-85 | पौधे की लंबाई 110-120 सेमी। यह संपूर्ण भारत में खेती के लिए अनुशंसित है। | 9-10 |
| पी.आर.सी. (PRC) – 3 | 75-80 | इसके पौधे की लंबाई 100-110 सेमी होती है और यह अच्छी उपज देती है। | 22-24 |
बोनी का समय, बीजोपचार एवं बोने का तरीका
फसल की सफलता सही समय पर बोनी और उचित बीजोपचार पर निर्भर करती है। इससे न केवल पौधों का विकास अच्छा होता है, बल्कि रोगों का खतरा भी कम हो जाता है।
बुवाई का समय
यदि किसान कोदो और कुटकी की खेती से अधिकतम लाभ लेना चाहते हैं, तो उन्हें मानसून की पहली वर्षा के तुरंत बाद बुवाई कर देनी चाहिए। देर से बुवाई करने पर कीटों का प्रकोप बढ़ने की संभावना रहती है।
- बोनी का समय:
- लघु धान्य फसलों की बोनी वर्षा (मानसून) आरंभ होने के तुरंत बाद कर देनी चाहिए।
- शीघ्र बोनी के लाभ: जल्दी बोनी करने से उपज अच्छी मिलती है और कीटों व रोगों का प्रभाव न्यूनतम रहता है।
- विशेष टिप: कोदो में मानसून आने के 10 दिन पूर्व ‘सूखी बोनी’ करने से अन्य विधियों की तुलना में अधिक पैदावार प्राप्त होती है।
- सावधानी: जुलाई के अंत में बोनी करने से ‘तना मक्खी’ (Stem Fly) कीट का प्रकोप बढ़ने की संभावना रहती है।
- बीजोपचार (Seed Treatment):
- बोनी से पहले बीज को मैन्कोजेब या थायरम (3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) से उपचारित करें।
- इससे बीज जनित रोगों और मिट्टी से फैलने वाली बीमारियों से फसल की सुरक्षा होती है।
- बोने की विधि और दूरी:
- कतार से कतार की दूरी: 20-25 सेंटीमीटर।
- पौधों से पौधों की दूरी: 7 सेंटीमीटर।
- गहराई: बीजों को 2-3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए।
- पौधों की संख्या: बेहतर उत्पादन के लिए प्रति हेक्टेयर कोदो में 6-8 लाख और कुटकी में 8-9 लाख पौधों की संख्या बनाए रखना आवश्यक है।
खाद एवं उर्वरक का उपयोग
आमतौर पर किसान कोदो-कुटकी की खेती बिना किसी उर्वरक के करते हैं, लेकिन संतुलित पोषक तत्वों का उपयोग करने से उपज में आशातीत वृद्धि देखी गई है।
- उर्वरक की मात्रा (प्रति हेक्टेयर):
- कुटकी: 20 किलोग्राम नत्रजन (Nitrogen) और 20 किलोग्राम स्फुर (Phosphorus)।
- कोदो: 40 किलोग्राम नत्रजन और 20 किलोग्राम स्फुर।
- उर्वरक देने का सही समय और तरीका:
- बुवाई के समय: नत्रजन की आधी मात्रा और स्फुर की पूरी मात्रा बुवाई के समय आधार खाद के रूप में दें।
- टॉप ड्रेसिंग: नत्रजन की शेष आधी मात्रा बुवाई के तीन सप्ताह के भीतर, निंदाई-गुड़ाई का कार्य पूरा करने के बाद खेत में डालें।
- जैव उर्वरक (Bio-Fertilizer) का प्रयोग:
- बेहतर मृदा स्वास्थ्य और अधिक उपज के लिए बुवाई के समय पी.एस.बी. (PSB) जैव उर्वरक का उपयोग अवश्य करें।
- मात्रा: 4 से 5 किलोग्राम पी.एस.बी. कल्चर को 100 किलोग्राम मिट्टी या कंपोस्ट खाद के साथ मिलाकर प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में फैलाएं।
निंदाई-गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण
फसल की अच्छी बढ़वार के लिए खेत को खरपतवार मुक्त रखना और पौधों के बीच सही दूरी बनाए रखना आवश्यक है।
- समय: बुवाई के 20 से 30 दिनों के भीतर एक बार हाथ से निंदाई (Hand Weeding) अवश्य करनी चाहिए।
- रिक्त स्थान की पूर्ति (Gap Filling): जहाँ बीज न उगे हों या खाली स्थान रह गए हों, वहाँ अधिक घने उगे हुए पौधों को उखाड़कर लगा देना चाहिए। इस प्रक्रिया को ‘रोपाई’ या ‘गैप फिलिंग’ कहते हैं, जिससे खेत में पौधों की संख्या उपयुक्त बनी रहती है।
- उपयुक्त समय: निंदाई और रोपाई का यह कार्य बुवाई के 20-25 दिनों के अंदर पूरा कर लेना चाहिए।
- विशेष सुझाव: यह कार्य हल्की बारिश (पानी गिरते समय) के दौरान करना सर्वोत्तम होता है, क्योंकि नमी होने से पौधों की जड़ें जल्दी पकड़ लेती हैं और मिट्टी नरम होने से निंदाई आसान हो जाती है।
फसल की कटाई, गहाई एवं भंडारण
सही समय पर कटाई और वैज्ञानिक तरीके से भंडारण करने पर अनाज की गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहती है।
- कटाई और गहाई: फसल पूरी तरह पक जाने पर कोदो और कुटकी को जमीन की सतह से ऊपर काटें।
- कटी हुई फसल को खलिहान में रखकर अच्छी तरह सुखाएं।
- सुखाने के बाद बैलों की सहायता से गहाई (Threshing) करें और उड़ावनी (Winnowing) कर दानों को भूसे से अलग कर लें।
- भंडारण की स्थिति: * भंडारण से पूर्व दानों को धूप में अच्छी तरह सुखाना चाहिए ताकि नमी का स्तर 12 प्रतिशत या उससे कम हो जाए।
भंडारण करते समय सावधानियाँ
भंडारण के दौरान अनाज को नमी और कीटों से बचाने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें:
- भंडार गृह की बनावट: भंडार गृह का फर्श जमीन की सतह से कम से कम दो फीट ऊँचा होना चाहिए ताकि जमीन की सीलन अनाज तक न पहुँचे।
- नमी से बचाव: भंडार गृह के आसपास जल-जमाव की समस्या नहीं होनी चाहिए।
- दरारों की मरम्मत: कोठी, बण्डा या भंडार गृह की दीवारों में यदि दरारें हों, तो उन्हें अच्छी तरह बंद कर दें। यदि दरारों में कीड़े हों, तो उन्हें चूने से पुताई कर नष्ट कर दें।
- दीर्घकालिक भंडारण: कोदो की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका भंडारण कई वर्षों तक किया जा सकता है, क्योंकि इसके दानों में कीड़ों का प्रकोप प्राकृतिक रूप से कम होता है। अन्य लघु धान्य फसलों को भी 3 से 5 वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
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कोदो-कुटकी की खेती इस उन्नत तकनीक अपनाकर किसान न केवल अपनी लागत कम कर सकते हैं, बल्कि भरपूर पैदावार प्राप्त कर स्वास्थ्य के लिए वरदान माने जाने वाले इस ‘श्री अन्न’ का बेहतर संरक्षण भी कर सकते हैं।
1. भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान (IIMR)
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