फसल की खेती (Crop Cultivation)

मध्य भारत में गेहूं की वैज्ञानिक खेती कैसे करें

मध्य भारत में गेहूं की वैज्ञानिक खेती कैसे करें – मध्य क्षेत्र के अंतर्गत मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश का बुंदेलखण्ड एवं दक्षिणी राजस्थान सम्मिलित हैं। मध्य भारत का गेहूं गुणवत्ता में पूरे देश में अग्रणी है। मध्य क्षेत्र, भारत ही नहीं अपितु विश्व में अपने सुंदर, सुडौल, आकर्षक, चमकदार रंग एवं अन्य गुणों से परिपूर्ण मध्य प्रदेश गेहूं के लिये जाना जाता है। मध्य भारत के गेहूं विकास के लिये भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान क्षेत्रीय केन्द्र, इन्दौर में निम्न कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं।

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  • प्रजातियों का विकास : अधिक उत्पादकता, शीघ्र पकने वाली तथा सूखारोधी प्रजातियों का विकास।
  • अनुमोदित तकनीकों के मूल्यांकन एवं पुनसर््थापन द्वारा उत्पादन लागत कम करना।
  • खरीफ फसल कटाई के बाद खेत की सीमित जुताई।
  • अधिक जल-उपयोग क्षमता वाली प्रजातियों का विकास।
  • जल-उपयोग क्षमता बढ़ाने के लिये सस्य तकनीक।
  • गेहूं की खेती में पौध संरक्षण रसायनों का उपयोग सीमित करना।
  • ड्यूरम/मालवी गेहूं का विकास।

कम पानी की किस्में (चंदौसी किस्में) : इस गेहूं को आष्टा/सीहोर शरबती या विदिशा/सागर चन्दौसी के नाम से उपभोक्ताओं एवं आटा उद्योगों में प्रिमियम गेहूं के रूप में जाता है। यह गेहूं अपनी चमक, आकार, स्वाद, और उच्च बाजार भाव के लिये सुप्रसिद्ध है। मध्य भारत की भूमि और जलवायु उत्तम गुणों वाले गेहूं के उत्पादन के लिये वरदान है। कम सिंचाई की चंदौसी प्रजातियॉँ केवल 1-2 सिंचाई में 20-40 क्विंटल/हेक्टेयर उत्पादन में सक्षम हैं।

मालवी/कठिया (ड्यूरम) किस्में : प्रकृति ने मध्य भारत को मालवी/कठिया गेहूं उत्पादन की अपार क्षमता प्रदान की है। इस क्षमता का पर्याप्त दोहन कर वांछित लाभ लिया जा सकता है। मालवी गेहूं का विशिष्ट स्वाद है अत: इसका विभिन्न व्यंजनों में उपयोग किया जाता है। मालवी गेहूं में प्रोटीन तथा येलो पिगमेंट की अधिकता है। साथ ही इसमें कुछ खनिज तत्व (लोहा, जस्ता, तांबा आदि) उपस्थित हैं जो शरीर के लिये लाभदायक हैं। नवीन मालवी/कठिया किस्मों में कम सिंचाई की आवश्यकता, अधिक उत्पादन, गेरूआ महामारी से बचाव व अधिकतम पोषण के गुण होते हैं। देश की गेहूं की खेती को गेरूआ महामारी से मुक्त रखने के लिये, मध्य भारत में ड्यूरम (मालवी) गेहूं की खेती एक नितांत वैज्ञानिक आवश्यकता है। खाद्यान्न एवं पोषण सुरक्षा के लिये मालवी गेहूं की खेती अवश्य करें।

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पिछेती खेती : पछेती खेती का अर्थ है गेहूं की देर से बुवाई करना। मध्य भारत में समान्यत: दिसम्बर-जनवरी में पछेती गेहूं की बुवाई की जाती है। इस अवस्था में फसल को पकने के लिये कम समय मिलता है तथा तापमान अधिक होने के कारण केवल पिछेती गर्मी सहने वाली नई प्रजातियों की ही खेती लाभदायक होती है। ये प्रजातियाँ 100-105 दिन मे पक जाती हैं तथा इनसे 35-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज ली जा सकती है।
खेती के तरीके में बदलाव : गेहूं की खेती में अधिक लाभार्जन तथा सतत उत्पादकता बनाये रखने के लिये अनुसंधान के आधार पर, संस्थान ने नई प्रजातियों के साथ-साथ खेती के तरीके में भी कुछ बदलाव की अनुशंसा की है, इनमें प्रमुख हैं:-

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खेत की तैयारी : सितम्बर-अक्टूबर में सोयाबीन/खरीफ कटाई के बाद लगभग 6-8 दिनों तक खेत की जमीन मुलायम रहती है। अत: जितना जल्दी हो सके आड़ी एवं खड़ी, केवल दो जुताई (पंजा या पावड़ी द्वारा) भारी पाटा के साथ करें ।

बुवाई का समय : अगेती बुवाई अर्थात् असिंचित तथा अर्धसिंचित खेती में 20 अक्टूबर से 10 नवम्बर, सिंचित समय से बुवाई में 10-25 नवम्बर, तथा देरी से बुवाई में दिसम्बर माह में एवं अत्यंत देरी से बुवाई में जनवरी माह (प्रथम सप्तााह) में बुवाई अच्छी रहती है।

किस्मों का चयन : उन्नत खेती के लिये सुलभ प्रमाणित बीजों का ही उपयोग करें। प्रमाणित और आधारीय बीजों के उपयोग से, उपज अधिक मिलती है तथा उपज की गुणवत्ता बनी रहती है। गेहूं की सफल खेती का अहम पहलू उपयुक्त किस्मों का चुनाव है। अन्य लागतों का प्रभाव भी उन्नत किस्मों पर ही निर्भर करता है (तालिका)।

बीज दर : 1000 दानों के वजन के आधार पर बीज की दर निर्धारित करें। सामान्य तौर पर छोटे दानों की किस्मों के लियेे100 किलो प्रति हेक्टेयर एवं बड़े दानों वाली किस्मों का 125 किलो प्रति हेक्टेयर बीज उपयोग में लें। (क्रमश:)

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