फसल की खेती (Crop Cultivation)

रबी का मुखिया चना

रबी का मुखिया चना – चना प्रमुख दलहनी फसल है तथा विश्व में सबसे अधिक भारत में पैदा किया जाता है।
जलवायु/भूमि : चना उत्तर भारत तथा दक्षिण भारतीय क्षेत्र में सफलता से लिया जाता है। इसके लिए क्षारीय भूमि को छोड़कर सभी प्रकार की भूमि उपयुक्त होती है ।

उन्नत किस्में : जेजी-12, जेजी-130, जेजी-6, जेजी-14, जेजी-16, जेजी-218, जेजी-226, जेजी-412, दिग्विजय, विशाल, काक-2, जेजीजी1,2,3, आईसीसीव्ही-2, 10, 37, जाकी-92-18, आरबीजी-201, आरबीजी-202 ।

बुआई समय: 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक।

खेत की तैयारी : सामान्य रूप से ऐसा देखा गया है कि चने के खेत की तैयारी में कृषक उपेक्षा करके स्वयं का नुकसान कर लेते हंै। ऊबड़-खाबड़़ ढेलों से भरे खेत में चने की बुआई कतई ना की जाये। खेत अच्छा बनाएं तथा गोबर की बिना सड़ी खाद का उपयोग कतई ना किया जाये इससे दीमक लगने की आशंका रहती है।

Advertisement
Advertisement

चने की उपज बढ़ाने का आसान तरीका

  • आखिरी जुताई के समय 250 किलो जिप्सम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से डालने से दाने सुडौल व चमकदार बनते हंै।
  • दीमक और कटुआ लट से बचाव के लिए क्विनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो प्रति हेक्टर के हिसाब से भुरककर आखिरी जुताई करें।
  • हमेशा प्रमाणित बीज की बोयें।
  • फली छेदक लट चने की प्रमुख दुश्मन है। फेरोमेन ट्रेप का उपयोग करें। जैविक कीटनाशक एनपीव्ही 250 एलई या बी.टी. 750 मिली 400-500 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

खाद/उर्वरक : दलहनी फसलों में वायुमंडल से नत्रजन समेटने की क्षमता रहती है। इस कारण चने की फसल को नाईट्रोजन देने की आवश्यकता नहीं रहती है। परन्तु शुरू में यदि 12 किलो यूरिया तथा 200 किलो एसएसपी अथवा 100 किलो डीएपी/हे. दिया जाए तो अच्छा उत्पादन मिल सकता है।

Advertisement
Advertisement

बीज दर : अच्छे उत्पादन के लिए 3 लाख 50 हजार पौधे/हे. अथवा 35 पौधे प्रति वर्ग मीटर हों तो उचित होगा वैसे 80 से 100 किलो बीज पर्याप्त होता है।

विधि : कतार से कतार 30 से.मी. तथा 10 से.मी. गहराई पर बुआई करें।

सिंचाई : चना सामान्यत: वर्षा आधारित स्थिति में बोया जाता है, फिर भी यदि सिंचाई जल उपलब्ध हो तो दो सिंचाई बोनी के 40-45 दिनों बाद और दूसरी 60 से 65 दिनों बाद (फलियां बनना शुरू हो जाती हैं) की जाए। किसी भी स्थिति में गहरी काली मिट्टी वाले क्षेत्र में यदि शीतकालीन वर्षा हो गई हो तो सिंचाई ना की जाए अन्यथा चना गैरा जाएगा।

कटाई /गहाई भंडारण : समय से की जाये तथा अच्छी तरह सुखाकर भ्ंडारण करें।

उपज : 10 से 15 क्विंटल/हे.

Advertisement
Advertisement

पौध संरक्षण

चने का बीज उपचार थाईरम + कार्बेन्डाजिम या थाईरम + बेनोमिल 2:1 के अनुपात में किया जाये। उसके बाद राईजोबियम कल्चर एवं पीएसबी 5-5 ग्राम से भी उपचारित करें।
उकठा या फ्यूजेरियम विल्ट : रोग का प्रकोप फसल बोने के तीन सप्ताह बाद से शुरू होता है। यह रोग देश के समस्त चना उगाने वाले क्षेत्र में हानि पहुंचाता है।

लक्षण :

  • छोटे रोगी पौधे गिर कर मर जाते हैं किन्तु उन पर ऊपर बताए अनुसार किसी प्रकार की फंफूद नहीं उगती।
  • पूर्ण विकसित रोगी पौधे की पत्तियांं तथा शाखायें मुरझाकर लटक जाती हैं और अंतत: पौधा पीला होकर सूख जाता है।
  • रोगी पौधे की जड़ सड़ती नहीं है लेकिन चीरने पर उसके अंदर लम्बाई में भूरी या काली पट्टी दिखाई देती है।
  • रोग का प्रकोप फूल अवस्था में अधिक होता है।

रोकथाम :

  • फसल नवम्बर के प्रथम पक्ष में बोयें।
  • उकठा रोग निरोधक जातियों का प्रयोग करें। अधिकांश नई जातियां इस रोग के लिए अवरोधी या सहनशील हैं।
  • जिन खेतों में रोग अधिक है वहां तीन साल तक चना न लें।
  • चना के साथ अलसी अंतरवर्तीय फसल के रूप में लें जिसमें हर 2 लाईन के बाद 1-2 लाईन असली की रहे।

चने की इल्ली सबसे बड़ी दुश्मन है। इसके बचाव के लिए खेतों मे टी आकार की बांस की खूटियां पक्षियों को आसरा देने के उद्देश्य से लगाएं, फेरोमेन ट्रेप लगाकर नर कीट का नाश करके प्रजनन क्रिया में बाधा डालें। एक मीटर क्षेत्र में 3-4 इल्ली होने पर नीम बीज सत 5 प्रतिशत का छिड़काव करें। रसायनिक नियंत्रण मेें प्रोफेनोफास 50 ई.सी. 1.5 लीटर/हे. की दर से 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। खरपतवार नियंत्रण फ्लूक्लोरोलिन 0.75 से 1 किलो सक्रिय तत्व/हे. भूमि में बुवाई के पूर्व छिड़क दें।

Advertisements
Advertisement
Advertisement