शून्य जुताई से मूंग की खेती और उसके फायदे

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  • भा.कृ.अनु.प.-खरपतवार अनुसंधान निदेशालय,
    जबलपुर

26 मार्च 2022, शून्य जुताई से मूंग की खेती और उसके फायदे –

क्षेत्रफल, उत्पादन एवं उत्पादकता- मूंग भारत वर्ष में उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। वर्तमान में भारत में 3.35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल में मूंग की फसल ली जाती है। जिसमें 1.82 मिनियन टन का उत्पादन तथा 512 किग्रा./हे. की उत्पादकता प्राप्त होती है। सामान्यत: मूंग को वर्षा ऋतु में उगाई जाती है, लेकिन पिछले वर्षो से कम अवधि वाली किस्मों के बाजार में आने से पारस्परिक धान-गेहूं फसल क्षेत्रफल में ग्रीष्म ऋतु में इसका समावेश किया गया है तथा वर्षा ऋतु से अधिक या लगभग समकक्ष उत्पादकता प्राप्त हो रही है।

मूंग के लाभ

मूंग को दाल के रूप में भोजन में समावेष करने पर यह शारीरिक वजन को कम करता है एवं रक्त दाब को नियंत्रित करता है। कोलेस्ट्राल को कम कर हृदय संबंधित रोगो से रक्षा करता है। यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है एवं बाह्य संक्रमण से बचाता है। मूंग मे पोटेशियम मैग्नीशियम तथा फाइबर की मात्रा अधिक होती है। जिससे रक्त दाब नियंत्रित रहता है।

मूंग की फसल लेने में प्रमुख समस्यायें

मूंग की फसल को उगाने में जो प्रमुख समस्यायें आती है इसमें कीट, पंतगों एवं बीमारियों का प्रभाव, खरपतवारों की समस्या, अनिश्चित कालीन वर्षा, अत्याधिक तापमान इत्यादि प्रमुख हैं।

समस्याओं के समाधान

कीट पंतगो एवं बीमारियों से बचने हेतु सहनशील या सहिष्णु किस्मों का चयन कर उगाना चाहिए, जिसमें इन समस्याओं से बचा जा सकता है। यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो तो अनिश्चित कालीन वर्षा से बचा जा सकता है। साथ ही साथ ग्रीष्म कालीन मूंग की खेती संरक्षित खेती के द्वारा की जाती है, तो कम पानी की जरूरत होती है एवं अधिक वर्षा की स्थिति में पानी जमीन के निचले स्तर में अवशोषित हो जाता है एवं फसल पर इसका विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। अधिक तापमान की समस्या से बचने हेतु संरक्षित खेती एक उपयुक्त उपाय है, इसमें फसल के अवशेष खेतों में मौजूद होने के कारण तापमान को नियंत्रित रखती है।

संरक्षित खेती क्या है?

संरक्षित खेती परम्परागत कृषि से हटकर खेती की नई पद्धति है, जिसमें खेतों की कम से कम जुताई या बिना जुताई के बुआई की जाती है, पूर्व फसल के अवशेष का समुचित उपयोग किया जाता है, तथा फसलों की विविधिकरण को अपनाया जाता है।

फसल अवशेष जलाने के नुकसान

सामान्यत: यह देखा गया है कि अधिकतर किसान धान एवं गेहँू की कटाई के पश्चात् शेष बची नरबाई एवं पराली को जलाकर नष्ट कर देते हैं। यह जल्दी दूसरी फसल की बुआई के लिए प्रमुखता से किया जाता है जिससे खेतों में जीवाष्म पदार्थ की मात्रा में सतत् कमी आती है एवं मृदा की ऊपरी सतह कठोर हो जाती है जिससे मृदा की उर्वराशक्ति नष्ट होने के साथ साथ कार्बन की मात्रा में कमी हो जाती है।

  • फसल अवषेषों को जलाने सेे मृदा की भौतिक संरचना प्रभावित होती है एवं जल धारण क्षमता कम होती है।
  • फसल अवशेषों को जलाने से मृदा की जैव विविधता लगभग समाप्त हो जाती है जिससे मृदा में जैविकीय क्रियाओं में कमी आती है।
  • फसल अवषेषों को जलाने से केंचुआ की संख्या में भारी गिरावट देखी गई हैं।
  • फसल अवशेषों को जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड एवं नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। जो वातावरण को प्रदूषित करता है तथा भूमि में नाट्रोजन एवं कार्बन का अनुपात प्रभावित होता है।
  • फसल अवशेषों में आग लगाने से मेड़ों पर लगे पौधे जल जाते हैं तथा कभी-कभी गांवो में भी आग लगने की संभावना बढ़ जाती है।

मूंग में संरक्षित खेती

किस्म – हम-1 समा्रट, विराट, जनकल्याणी आई.पी.एम.-02-3, जी.ए.एम.-05 इत्यादि
बुआई का समय – फरवरी के अंतिम सप्ताह से मार्च के अंतिम सप्ताह तक
बुआई की विधि – हैप्पी सीड ड्रिल की सहायता से खेत में खड़े फसल अवशेषों के साथ

बीज दर – 25-30 किग्रा./हे.

उरर्वक – 20 कि.ग्रा. नाईट्रोजन, 40 कि.ग्रा. फास्फोरस, 40 कि.ग्रा. पोटाश /हे.
बीज उपचार – (1) रासायनिक बीज उपचार- 3 ग्राम/किलो की दर से कार्बेन्डाजिम (वाविस्टीन) एवं थायरम या कार्बेन्डाजिम ़ मेन्कोज़ेब से उपचार करें। साथ ही थायमेथाक्जाम 3 ग्राम/किलो बीज तथा दीमक के प्रकोप को रोकने के लिये क्लोरोपायरीफॉस 5 मिली/किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।

(2) जैविक बीज उपचार- ट्राइकोडरमा, पी.एस.बी., राइजोबियम एवं स्यूडोमोनॉस सभी की 10-10 ग्राम/किलो बीज को बुआई से कुछ समय पूर्व उपचारित कर छाया में सूखा कर बुआई करना चाहिए।
सिंचाई – बुआई के तुरंत पश्चात स्प्रिंकलर विधि से 3 घण्टे की षिफ्ट पर सिंचाई करें तथा आवष्यकतानुसार 12-15 दिनों के अंतराल से सिंचाई करें।

खरपतवार प्रबंधन – खरपतवार की समस्या के निदान हेतु निम्न शाकनाशियों का प्रयोग करना चाहिए।

  • बुवाई उपरांत प्रथम सिंचाई के पश्चात् 0-2 दिन के अंदर पेंडीमेथिलीन 30 प्रतिषत की 1.0 किग्रा/हे. या पेण्डीमेथिलीन 38.7 प्रतिशत की 678 ग्रा./हे. की दर से छिडक़ाव करें। तत्पश्चात् यदि खरपतवार पूर्णतया नियंत्रित न हो तो 20 दिन की अवस्था में निम्न शाकनाशियों का प्रयोग करना चाहिए।
  • इमाजेथापायर – 70-80 ग्रा./हे. या  सोडियम एसीफ्लोरफेन$क्लोडिनाफाप – 245 ग्रा./हे.
    उपरोक्त में से किसी भी एक शाकनाषी का उपयोग 375 लीटर पानी/हे. के साथ उपयोग कर सकते हैं। जिससे खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण होता है।
  • कीट प्रबंधन – सामान्यत: ग्रीष्मकालीन मूंग की फसल में कोई विशेष कीट का प्रभाव नहीं होता है तो (यदि प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग किया जाय) फिर भी यदि कीट संक्रमित करते है, तो निम्नलिखित कीटनाषी का उपयोग किया जा सकता है।
  • रस चूसने वाले कीटों के लियें:- डाईमिथियोएट 1000 मिली/हे. या इमिडाक्लोप्रिड (48:) 150-175 मिली/हे.
  • इल्ली के प्रकोप होने पर:- इमेमेक्टिन बेन्जोएट 250 ग्राम/हे.

रोग प्रबंधन – सामान्यत: उपचारित एवं प्रतिरोधी किस्म के बीजों की बुआई करने पर किसी भी प्रकार के रोगों का संक्रमण नहीं होता हैं।

कटाई – मूंग की फसल यदि 75-80 प्रतिशत तक परिपक्व हो गयी है, तो कटाई की जा सकती है। पूर्ण पकने तक फसल को रोके रखने से फली चटक जाती है एवं उपज में नुकसान होता है।

उपज – उपज मुख्य रूप से फसल प्रबंधन पर अधिकतर निर्भर करती है अत: उपरोक्त बताई गई विधि से खेती करने पर ग्रीष्म कालीन मूंग की उपज 1.2-1.5 टन/हे. तक प्राप्त कर सकते हैं।

धान-गेहूं फसल चक्र में ग्रीष्मकालीन मूंग का समावेश

सामान्यत: मध्य भारत में धान-गेहंू एक सामान्य एवं प्रचलित फसल चक्र अपनाया जाता है। जिसमें बारम्बार अनाज कुल के फसलों को लगाने से भूमि में एक विशेष प्रकार के पोषक तत्व में कमी आ जाती है। अत: वे स्थान जहां भी सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था है, वहां गेहंू एवं धान की फसल के बीच में उपलब्ध समय पर कम अवधि (55-60 दिनों) वाली ग्रीष्मकालीन मूंग की एक अतिरिक्त फसल ले सकते हैं। इससे हमें अत्याधिक लाभ होता है, तथा मृदा की उर्वराशक्ति में वृद्धि होती है। अत: कृषक भाई ग्रीष्म कालीन मूंग लगाकर अत्याधिक लाभ कमा सकते हैं एवं भोजन में शामिल कर अपना अच्छा पोषण कर सकते हैं।

 

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ग्रीष्मकालीन मूंग की फसल में संरक्षित खेती के लाभ

  • जुताई की लागत में कमी – संरक्षित खेती अपनाने से खेतों को किसी भी प्रकार की जुताई को आवश्यकता नहीं होती है। जिससे प्रक्षेत्र तैयार करने की लागत में कमी आती है। यह लागत लगभग रूपये 2100-2500 प्रति एकड़ होती है। इसे किसान शुद्ध बचा सकता है।
  • डीजल/ईधन की लागत में कमी – इस विधि से खेती करने में जुताई नहीं करने पर लगभग प्रति जुताई 5 लीटर/एकड़ की शुद्ध बचत होती है। इस प्रकार किसान प्रति एकड़ लगभग 15-18 लीटर ईंधन बचा सकता है।
  • पानी की बचत – इस विधि से खेती करने पर किसान प्रति फसल 1-2 सिंचाई बचा लेता है। इसका मुख्य कारण खेतों में पड़े फसल अवशेष वाष्पोत्सर्जन से होने वाले नुकसान को रोकना है। साथ ही साथ सिंचाई की अवधि को भी कम कर सकते है। क्योंकि खेतों के निचले सतह पर नमी होने के कारण खेत जल्दी ही तर हो जाता है।
  • विद्युत उपयोग में कमी- संरक्षित खेती में खेतों को 1-2 सिंचाई कम लगने तथा सिंचाई की अवधि भी कम लगने से अनुपातनुसार विद्युत उपभोग में कमी कर सकते है, एवं खेती में लागत को कम कर सकते हैं।
  • उर्वरक उपयोग में कमी– संरक्षित खेती अपनाने से उस खेत में फसल अवशेष का जमाव होता है, जो समय गुजरने के पश्चात् अपघटित होकर पोषक तत्वों का स्त्राव करते हैं, जिसे पौधे उपयोग करते है, इससे उर्वरक उपयोग को कम कर लागत में कमी कर सकते है
  • रासयनिक कीटनाषकों एवं शाकनाशियों का कम उपयोग – संरक्षित खेती का प्रयोग बारम्बार करने पर खेतों में मित्र कीटों की संख्या में इजाफा होता है, जो फसल में लगने वाले कीटों का भक्षण कर कीटनाशकों की लागत को कम करते हंै। इसी तरह फसल अवशेषों को मृदा सतह पर स्थिर रखने से सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि होती है, जो खरपतवार के बीजों को नष्ट कर देते हैं। साथ ही साथ मृदा की सतह में, एक परत बनने के कारण सूर्य की किरणें मृदा तक नहीं पहुंच पाती जिससे खरपतवार के बीजों का अंकुरण प्रभावित होता है। फलस्वरूप शाकनाशियों के उपयोग एवं उससे होने वाली लागत को कम किया जा सकता है।
  • मृदा की भौतिक संरचना में सुधार – संरक्षित खेती अपनाने से मृदा की स्थूल घनत्व में कमी, रन्ध््राावकाश में वृद्धि तथा मृदा की जलधारण क्षमता में वृद्धि होती है।द्य मृदा की रासायनिक स्थिति में सुधार – खेतों की जुताई न करने, फसल अवशेषों को मृदा में छोडऩे तथा फसल विविधिकरण में दलहनी फसलों के समावेश से रासायनिक संरचना में सुधार होती है।
  • मृदा की जैविक संरचना में सुधार – संरक्षित खेती अपनाने से मृदा में सूक्ष्म जीवों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि होती है, जिससे मृदा अवयवों का विघटन तीव्र होता है, एवं फसलों के लिए उपलब्ध पोषक तत्वों में वृद्धि होती है।
  • वातावणीय प्रदूषण में कमी – परम्परागत विधि से खेती करने पर पूर्व फसल के अवशेषों को जला दिया जाता है। जिससे कार्बन डाई ऑक्साइड एवं नाइट्रस आक्साइड का उत्सर्जन होता है, जो वातावरण तथा सामान्य जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। अत: संरक्षित खेती अपनाकर पर्यावरणीय प्रदूषण से छुटकारा प्राप्त कर सकते है।
  • उपज एवं गुणवत्ता में वृद्धि – संरक्षित खेती के सिद्धांतों के अनुरूप खेती करने पर फसल की लागत में कमी तथा उपज में लगभग 15-20 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है, तथा गुणवत्ता में वृद्धि पायी गयी है।
  • समय की बचत – संरक्षित खेती अपनाने से एक फसल की कटाई तथा दूसरी फसल की बुआई के बीच के समय को बचा सकते हैं, क्योंकि इस विधि में हैप्पी सीड ड्रील का उपयोग कर उसी दिन या अगले दिन अगली फसल की बुआई कर सकते है। जिससे उस फसल को उचित समय पर कटाई कर संग्रहित किया जा सके।

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