फसल की खेती (Crop Cultivation)

नींदा नियंत्रण से बढ़ता सोयाबीन उत्पादन

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सोयाबीन भारतवर्ष की एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल

सोयाबीन भारतवर्ष की एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है देश में इसकी खेती लगभग 65 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जाती है। जिससे प्रतिवर्ष लगभग 78 लाख टन उत्पादन प्राप्त होता है सोयाबीन उगाने वाले राज्यों में मध्यप्रदेश का क्षेत्रफल (39 लाख हेक्टेयर) तथा उत्पादन (25.9 लाख टन) की दृष्टि से प्रथम स्थान पर है। परन्तु औसत उपज (8.5 क्विंटल/हे.) में अन्य राज्यों जैसे महाराष्ट (12 क्विंटल/हे.) आदि से बहुत कम है तथा देश की औसत उपज से लगभग आधी है। यद्यपि पिछले दशक महाराष्ट, राजस्थान आदि राज्यों में सोयाबीन के क्षेत्रफल में वृद्धि हुई है लेकिन मध्यप्रदेश में क्षेत्रफल 42 लाख हेक्टेयर से घटकर 39 लाख हेक्टेयर हो गया है। जिसका प्रमुख कारण है कि कई क्षेत्रों में निरन्तर उत्पादकता में कमी होने के कारण सोयाबीन की खेती फायदेमंद न होना। प्रदेश में सोयाबीन की कम उपज होने के अनेकों कारण हैं लेकिन किसानों द्वारा सोयाबीन की फसल में निंदाई, गुड़ाई हेतु मजदूर समय पर न उपलब्ध होने के कारण नींदा नियंत्रण सही समय पर न करना तथा सोयाबीन में नींदानाशियों के प्रयोग की समुचित जानकारी न होने के कारण किसान भाई अपनी सुविधानुसार कभी भी और कैसे भी नींदा नियंत्रण करते रहते हैं या फिर फसल को ऐसा ही छोड़ देते हैं परिणामस्वरूप बहुत कम उपज प्राप्त होती है। कभी-कभी तो फसल नींदा नियंत्रण के अभाव में पूर्णत: नष्ट हो जाती है और किसानों को सोयाबीन की खेती से असाधारण हानि होती है।

(क) चौड़ी पत्ती वाले नींदा

इस प्रकार के नींदाओं की पत्तियां चौड़ी होती हैं तथा ये मुख्यत: दो बीज पत्र पौधे होते हैं। सोयाबीन में प्रमुख रूप से महफौआ (एजीरेटम कोनीजाइड्स), जंगली चौलाई (एमेरथस बिरिडिस), सफेद मुर्ग (सिलोसिया अरजेंसिया), जंगली जूट (कॉरकोरस एकुटैन्गुल), बन मकोय (फाइजेलिस मिनिया), हजारदाना (फाइलेंथस निरूरी) तथा कालादाना (आइपोमिया) आदि चौड़ी पत्ती वाले नींदाओं की समस्या अधिक होती है।

(ख) घास कुल के नींदा

इस कुल के नींदाओं की पत्तियां संकरी एवं लम्बी होती हैं तथा पत्तियों में समानान्तर शिराएं पाई जाती हैं। ये प्राय: एक बीजपत्रक पौधे होते हैं। सोयाबीन में संकरी पत्ती वाले नींदा जैसे सांवा (इकाईनोक्लोआ कोलोना) तथा कोंदो (इल्यूसिन इण्डिका) की समस्या अधिक होती है।

(ग) मौथा कुल के नींदा

इस कुल के नींदाओं की पत्तियां लम्बी तथा तना ठोस व तीन से छ: किलारी होता है। मौथा कुल के नींदाओं में मुख्यत: कत्थई मौथा (साइप्रस रोटन्टस) तथा पीला मौथा (साइप्रस इरिया) की समस्या सोयाबीन में अधिक पाई जाती है।

नींदाओं से हानियां-

सोयाबीन मुख्यत: खरीफ मौसम (वर्षा ऋतु) में उगाई जाती है। वर्षा ऋतु में भूमि का अधिक तापक्रम (35-400 डिग्री से.गे्र.), समुचित नमी और ऑक्सीजन के चलते नींदाओं के बीज का अंकुरण लगातार होता रहा है परिणामस्वरूप खरीफ मौसम में नींदाओं की समस्या ज्यादा जटिल होती है। प्रयोगों से यह सिद्ध हो गया है कि यदि सोयाबीन में नींदाओं का समुचित नींदा नियंत्रण समय पर नहीं किया गया तो विभिन्न प्रकार के नींदा सोयाबीन के फसलीय पौधों से जगह, प्रकाश एवं खाद व उर्वरकों द्वारा भूमि में दिए गए पोषक तत्वों के लिए स्पर्धा करते हैं। फलस्वरूप फसलीय पौधों की वृद्धि एवं विकास धीमा पड़ जाता है और अंत में उपज में 25 से 70 प्रतिशत तक की कमी हो जाती है। सोयाबीन की फसल में समुचित नींदा नियंत्रण के अभाव में नींदा 30-60 कि.ग्रा. नत्रजन, और 40-100 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर के हिसाब से भूमि से शोषित कर लेते हैं। इसके अलावा नींदा फसल को नुकसान पहुंचाने वाले अनेक प्रकार के कीड़े एवं बीमारी जनक रोगाणुओं को भी आश्रय देते हैं तथा फसल नष्टï होने का अंदेशा बना रहता है।

नींदा निंयत्रण कब करें?

सामान्यत: से कीड़े-मकोड़े, रोग व्याधि लगने पर ही उनके नियंत्रण की ओर ध्यान दिया जाता है लेकिन नींदा तो सोयाबीन की बोनी करने के बाद से ही साथ-साथ उगते हैं। किसान नींदाओं को तब तक बढऩे देते हैं जब तक कि वे हाथ से पकड़कर उखाडऩे योग्य न हो जाएं और उस समय तक नींदा फसल को नुकसान कर चुके होते हैं। सोयाबीन के पौधे प्रारंभिक अवस्था में नींदाओं की अपेक्षा धीरे बढ़ते हैं और नींदाओं से स्पर्धा करने में सक्षम नहीं होते हैं। अत: सोयाबीन को शुरूआत में नींदा रहित रखना आवश्यक होता है। यहां पर ध्यान रखने वाली बात है कि फसल को हमेशा न तो नींदा रहित रखा जा सकता है न ही ऐसा करना आर्थिक दृष्टि से लाभकारी होता है। अत: क्रांतिक अवस्था के दौरान फसल में नींदा नियंत्रण करके फसल को नींदा रहित रखा जाए तो सोयाबीन की अच्छी उपज प्राप्त होती है तथा क्रांतिक अवस्था निकल जाने के बाद निंदाई करने से उपज में कोई वृद्धि नहीं होती। सोयाबीन में यह क्रांतिक अवस्था बोनी के 20-45 दिनों के बीच होती है।

नींदाओं से कैसे निपटें?

नींदाओं की रोकथाम में ध्यान देने योग्य बात यह है कि नींदा नियंत्रण सही समय पर करें उसके लिए आप कोई भी विधि अपनाएं। किसान भाई सोयाबीन की फसल में नींदाओं की रोकथाम निम्र तरीकों से कर सकते हैं:-

निवारक विधि

इस विधि में से सभी क्रियाएं शामिल होती हैं जिनके द्वारा सोयाबीन के खेतों में नींदाओं को फैलने से रोका जाता है। उदाहरण के रूप में प्रमाणित बीजों का प्रयोग, अच्छी तरह सड़ी कम्पोस्ट एवं गोबर खाद का प्रयोग बोनी करने वाले यंत्रों के प्रयोग से पूर्व अच्छी तरह से उनकी सफाई इत्यादि।

यांत्रिक विधि

यह नींदाओं पर काबू पाने की सरल, सस्ती एवं प्रभावी विधि है। सोयाबीन की फसल की बोनी के 20-45 दिनों के मध्य का समय नींदाओं से स्पर्धा की दृष्टिï से नाजुक होता है। अत: पहली निंदाई, बुवाई के 20-25 दिन बाद तथा दूसरी निंदाई 40-45 दिन बाद करना ज्यादा प्रभावकारी होता है। जिन क्षेत्रों की भूमि हल्की से मध्यम किस्म की हो वहां बतर होने की स्थिति में सोयाबीन के कतारों के बीच हाथ चलित हो बोनी के 20-25 दिन चलाना चाहिए तथा 40-45 दिन बाद हाथ से निंदाई करना चाहिए।

रसायनिक विधि

वर्तमान समय में अनेकों नींदानाशी बाजार में उपलब्ध हैं जिनका उपयोग करके किसान भाई सोयाबीन की फसल में सभी प्रकार के नींदाओं का प्रभावकारी ढंग से नियंत्रण कर सकते हैं तथा सोयाबीन से अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं। रसायनिक विधि अपनाने से सोयाबीन की फसल प्रारंभिक काल से ही नींदा रहित है, साथ ही नींदाा नियंत्रण करने में प्रति हेक्टेयर खर्च कम (रु. 1000-1200/हे.) और कम समय में अधिक क्षेत्र में नींदा नियंत्रण सम्भव हो जाता है।

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