घर के पिछवाड़े मुर्गी पालन से अधिक लाभ

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  • डी.पी. सिंह द्य अवधेश कुमार पटेल, डॉ. शैलेन्द्र सिंह गौतम
    जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय,
    कृषि विज्ञान केन्द्र, डिण्डौरी

26  मई 2021, डिण्डौरी । घर के पिछवाड़े मुर्गी पालन से अधिक लाभ – भारत जैसे विकासशील देश में जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है। यहां के निवासियों का जीवन स्तर शहरों में रहने वालों की तुलना में अपेक्षाकृत समृद्ध नहीं है। विगत वर्षो में भारत सरकार ने कुक्कुट पालन को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सुधारने का एक उत्तम साधन मानते हुए इसके विकास हेतु अनेक प्रयास किये हैं। आज मुर्गीपालन एक दृढ़ उद्योग का रूप ले चुका है। वैज्ञानिकों द्वारा किये जा रहे अनुसंधानों से विकसित नवीनतम प्रौद्योगिकी को अपनाने से मुर्गीपालन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त हुई है। व्यवसायिक प्रजातियों के विकास से प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति अण्डों एवं मांस की उपलब्धता 1961 में 7 अण्डे व 188 ग्राम से बढ़कर वर्तमान में लगभग 45 अण्डे व 1000 ग्राम अनुमानित है। यद्यपि इसमें वास्तविक वृद्धि हुई है पर ग्रामीण लोगों को इसकी उपलब्धता कम व अत्यन्त उच्च कीमतों पर होती है।

भारत में कुपोषण एवं गरीबी की समस्या को दूर करने के लिए पारम्परिक मुर्गी पालन अथवा घर के पिछवाड़े मुर्गी पालन की यह पद्धति प्राचीन काल से प्रचलित है। इसमें प्राय: 5-20 मुर्गियों का छोटा सा समूह एक परिवार के द्वारा पाला जाता है, जो घर एवं उसके आस-पास में अनाज के गिरे दाने, झाड़-फूसों के बीच कीड़े-मकोड़े, घास की कोमल पत्तियां तथा घर या होटल/ढाबे की जूठन आदि खाकर अपना पेट भरती हंै। इस प्रकार घर के रखरखाव एवं खाने-पीने पर कोई खास खर्च नहीं आता है।

नस्ल का चुनाव

वास्तव में पारम्परिक कुक्कुट पालन की भारत में अधिक प्रांसगिकता है। इस पद्धति से मुर्गी पालन के लिए उपलब्ध 11 प्रजातियों में कड़कनाथ, नर्मदा निधि वनराजा, ग्रामप्रिया, कृष्णा जे, नन्दनम-ग्रामलक्ष्मी प्रमुख है। देशी प्रजाति के पक्षियों की वृद्धि दर व उत्पादन कम होने की वजह से इनकी लोकप्रियता घटती गई। हाल ही में केन्द्रीय पक्षी अनुसंधान संस्थान इज्जतनगर, बरेली में देशी और उन्नत नस्ल की विदेशी प्रजाति की मुर्गियों को मिलाकर कुछ संकर प्रजातियां विकसित की गई हंै। इनमें कैरी श्यामा, कैरी निर्भीक, हितकारी एवं उपकारी प्रमुख है। ये प्रजातियां भारत के वातावरण एवं परिस्थितियों में अच्छा उत्पादन देने में सक्षम साबित हुई है और इनकी वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 180-200 अंडे की है।

आहार व्यवस्था

अच्छा उत्पादन एवं अधिक लाभ प्राप्त करने के लिये कुक्कुट पालकों को मुर्गियों के आहार पर ध्यान दें। प्राय: देखा गया है कि किसी विशेष मौसम में उत्पादित होने वाला एक विशेष प्रकार का अनाज ही मुर्गियों को खिलाया जाता है, जिससे पक्षियों को आवश्यक पोषक तत्व उचित मात्रा में प्राप्त नहीं होते हंै। अत: पक्षियों को वर्ष के दौरान पैदा होने वाले अनाजों को मिश्रित करके खिलायें। यदि सम्भव हो तो सम्पूर्ण आहार के रूप में उन्हें प्रोटीन, खनिज लवण व विटामिन भी दें। सम्पूर्ण आहार की मात्रा क्षेत्रीय उपलब्धता के आधार पर घटाई या बढ़ाई जा सकती है।

प्रजनन व्यवस्था

प्राय: ऐसा देखा जाता है, कि एक बार मुर्गी खरीदने के बाद एक झुंड में उन्हीं से बार-बार प्रजनन करवाया जाता है, जिससे इन ब्रीडिंग (अन्त: प्रजनन) के दुष्प्रभाव सामने आते हंै। इससे अण्डों की संख्या निषेचन एवं प्रस्फुटन में कमी आती है तथा बच्चों की मृत्यु दर बढ़ती है। अत: इन्हें प्रतिवर्ष बदल दें। इससे अण्डा उत्पादन व प्रजनन क्षमता में वृद्धि के साथ-साथ चूजों की मृत्यु दर में कमी आती है।

सुरक्षा के आवश्यक उपाय

बीमारियों से बचाव के सम्बन्ध में जानकारी रखना प्रत्येक मुर्गी पालक के लिए आवश्यक हो जाता है।

  • मुर्गियों को तेज हवा, आँधी, तूफान से बचायें।
  • मुर्गियों के आवास का द्वार पूर्व या दक्षिण पूर्व की ओर होना अधिक ठीक रहता है जिससे तेज चलने वाली पिछवा हवा सीधी आवास में न आ सके।
  • आवास के सामने छायादार वृक्ष लगवा दें ताकि बाहर निकलने पर मुर्गियों को छाया मिल सके।
  • मुर्गियों का बचाव हिंसक प्राणी कुत्ते, गीदड़, बिलाव, चील आदि से करें।
  • आवास का आकार बड़ा हो ताकि उसमें पर्याप्त शुद्ध हवा पहुँच सके और सीलन न रहे।
  • मुर्गियाँ समय पर चारा चुग सकें इसलिए बड़े-बड़े टोकरे बनाकर रख लें।
  • कुछ व्याधियाँ मुर्गियों में बड़े वर्ग से फैलकर भंयकर प्रभाव दिखाती है जिसमें वे बहुत बड़ी संख्या में मर जाती है। अत: बीमार मुर्गियों को अलग कर दें। उनमें वैक्सीन का टीका लगवा दें।
  • मुर्गी फार्म की मिट्टी समय-समय पर बदलते रहें और जहां रोगी कीटाणुओं की संभावना हो वहां से मुर्गियों को हटा दें।
  • एक मुर्गी फार्म से दूसरे मुर्गी फार्म में दूरी रहे।
  • मुर्गियां खरीदते समय उनका उचित डॉक्टरी परीक्षण करा लें तथा नई मुर्गियों को कुछ दिनों तक अलग रखकर यह निश्चय कर लें कि वह किसी रोग से ग्रस्त तो नहीं है। पूर्ण सावधानी बरतने पर भी कुछ रोग हो ही जाये तो रोगानुसार चिकित्सा करें।
रोगों से बचाव एवं रोकथाम

मुर्गियों को विभिन्न प्रकार से संक्रामक रोगों से बचाने के लिए कुक्कुट पालकों को मुर्गियों में टीकाकरण अवश्य करा दें। जहां तक संभव हो एक गांव या क्षेत्र के सभी कुक्कुट पालकों को एक साथ टीकाकरण करवाने का प्रबंध करना चाहिए, इससे टीकाकरण की लागत में कमी आती है। बर्ड फ्लू जैसी भयानक बीमारियों से बचने के लिए मुर्गियों को बाहरी पक्षियों/पशुओं के संपर्क से बचायें। यदि कोई मुर्गी बीमार होकर मर गई हो तो उसे स्वस्थ पक्षियों से तुरन्त अलग कर दें तथा निकटस्थ पशु चिकित्सक से सम्पर्क कर मरी मुर्गी का पोस्टमाटर््म करवाकर मृत्यु के सम्भावित कारणों का पता लगायें तथा अन्य मुर्गियों को बचाने के लिए उपयुक्त कदम उठायें। इस प्रकार आधुनिक तकनीक अपनाकर पारम्परिक ढंग से मुर्गी पालन कर ग्रामीण परिवारों में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है।

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