नरवाई का समाधान कैसे ?

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किसानों के बीच नरवाई जलाना एक प्रथा सी बन गई है। किसान को मालूम रहता है कि वह नरवाई जलाकर वातावरण को प्रदूषित कर रहा है फिर भी वह अपने निजी सुविधा के लिये इसको नहीं छोड़ रहा है। अधिकांश किसान खेत में फसल के अवशेषों को नहीं जलाते और वह जुताई कर इन्हें भूमि में ही मिलाना पसंद करते हैं कुछ अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि मात्र 5 प्रतिशत किसान ही फसलों के अवशेष भूसे को जलाकर इसका प्रबंधन करते हैं ताकि अगली फसल की जुताई व बुआई में कोई अड़चन न आये। भूसा जलाकर उसका प्रबंधन करना सबसे सस्ता उपाय है। खेत में भूसा रहने की स्थिति में जुताई कर उसे मिट्टी में मिलाना एक कठिनाई भरा महंगा कार्य है। कटाई के लिए कम्बाईन के उपयोग बढऩे के बाद यह समस्या और बढ़ती चली जा रही है। इस कारण किसान भूसे को जुताई कर मिट्टी में मिलाने से बचना चाहते हैं और नरवाई का सहारा लेते हैं। मध्यप्रदेश का किसान खरीफ की प्रमुख फसल की बुआई प्रथम वर्षा के तुरंत बाद ही करना चाहता है ताकि उसे सोयाबीन का उत्पादन अच्छा मिले। इसके लिये वह गर्मी में ही अपने खेत तैयार करना चाहता है। खेत में गेहूं के अधिक अवशेष होने की स्थिति में यह सम्भव नहीं हो पाता। इसके लिए वह सरल उपाय नरवाई का सहारा लेता है यह स्थिति उन क्षेत्रों में अधिक रहती है। जहां की मिट्टी अधिक चिकनी रहती है। इस प्रकार की भूमि में जल भराव तथा भूमि के ठोसपन की समस्या उत्पन्न हो जाती है। इसके कारण किसान नरवाई को एकमात्र विकल्प मानता है गेहूं की अधिक उपज लेने वाले क्षेत्रों एवं खेतों में भूसे का उत्पादन भी अधिक होता है ऐसी स्थिति में भूसे को जुताई द्वारा भूमि में समायोजित करना एक कठिन कार्य हो जाता है जो किसान को नरवाई के लिये प्रेरित करता है। नरवाई के लिए हर किसान की समस्या अपनी अलग रहती है।  किसान की समस्या जाने बिना नरवाई के लिये रोकना उचित नहीं होगा। न ही नरवाई अपनाने वाले किसानों को आर्थिक रूप से दंडित करना इसका समाधान है।  इसके लिये यह आवश्यक है कि नरवाई के लिये बाध्य किसानों की समस्या का अध्ययन किया जाये और हर किसान की समस्या के आधार पर उसके निराकरण के उपाय अपनाये जाये। अवशेषों को भूमि में मिलाने के लिये नये यंत्रों तथा नई तकनीक का भी विकास हो। उन किसानों का जो भूसे का प्रबंधन बिना नरवाई के सफलतापूर्वक कर रहे हैं उनके द्वारा अपनाये जाने वाली विधि भी अन्य किसानों को प्रेरणा दे सकती है।

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