ऊसर भूमि कैसे सुधरे ?

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लवणीय: वे मृदायें जिनमे केवल घुलनशील लवणों का समावेश होता है जो कि सूखे मौसम में भूमि पर सफेद परत के रूप में जमा हो जाते हैं जिन्हें किसान खार, रेह या खारी आदि नामों से जानते हंै।
क्षारीय: ऐसी मृदाओं में घुलनशील लवणों का समावेश तो नहीं होता पर विनिमयशील सोडियम की अधिकता होती है जिससे मृदा कि भौतिक दशा खराब हो जाती है अधिक नमी से कीचड़ व सूखने पर कठोर हो जाती है तथा गड्ढों में बरसात का गंदा पानी कई दिनों तक भरा रहता है व सूखने पर सिंचाई के धोरों व अन्य उभरे हुये स्थानों पर काले भूरे रंग की सतह बन जाती है जिसे किसान काली ऊसर, खारच आदि नामों से जानते है।
लवणीय एवं क्षारीय: इन मृदाओं में घुलनशील लवणों एवं विनिमयशील सोडियम दोनों ही अधिक होते हैं। इनके लक्षण क्षारीय भूमि से मिलते-जुलते हंै तथा प्राय: हमारे राज्य में आधी से ज्यादा ऊसर इसी श्रेणी की है।
लवणीयता एवं क्षारीयता के प्रभाव: लवणीयता से मृदा विलियन में लवणों कि सांध्रता बढऩे से पौधों में पानी की संग्रणता मृदा में नमी होने के बावजूद भी नहीं हो पाती है तथा पौधे मुरझा जाते हैं । भूमि में क्षारीयता सोडियम की अधिकता से होती है जोकि अन्य पोषक तत्वों जैसे कैल्शियम एवं मैग्नीशियम के शोषण पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है जिससे सूक्ष्म तत्वों की प्राप्यता भी घट जाती है एवं फसल उत्पादन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
ऊसर भूमि सुधार:
ऊसर भूमि सुधार से हमारा तात्पर्य ये है कि उपयुक्त भूमि सुधार सामग्री के प्रयोग करके भूमि सुधार प्रक्रियाओं द्वारा भूमि को अवांछित लवणों एवं क्षारों से मुक्त करना है ताकि फसल उत्पादन सफलता पूर्वक किया जा सके।

ऊसर भूमि का तात्पर्य ऐसी भूमि से है जिनमे घुलनशील लवणों एवं विनिमयशील सोडियम का अधिक मात्रा में समावेश अलग-अलग या एक साथ होता है जिनका पौधों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिससे पौधों की बढ़वार रुक जाती है। ये मृदायें प्राय: तीन प्रकार की होती हैं।

इसकी तीन विधियां हैं
भौतिक एवं यांत्रिक: भूमि लवणीय हो या क्षारीय सर्वप्रथम भूमि सुधार हेतु भौतिक एवं यांत्रिक विधियों का ही प्रयोग होता है जैसे कि-

  • ऊसर समस्याओं से प्रभावित भूमि कि मेड़बंदी एवं उसके बाद प्रतिवर्ष जुताई करना चाहिए यह विधि चारागाह के लिए प्रयोग की जाती है
  • भूमि की खुदाई कर समस्याग्रस्त मिट्टी को हटा देना चाहिए एवं अच्छी खाद युक्त मिट्टी उस खेत में डाल देनी चाहिए यह विधि मुख्य रूप से छोटे पैमाने पर ही उपयुक्त है।
    जैविक : कार्बनिक पदार्थो के प्रयोग से मृदा में पानी की रिसाव क्षमता बढ़ती है एवं इनके सडऩे के दौरान कार्बन डाईऑक्साइड गैस निकलती है जिससे कई प्रकार के कार्बनिक अभज बनते है एवं मृदा क्षारीयता कम हो जाती है तथा मृदा में सूक्ष्म जैविक क्रियायें भी सक्रिय हो जाती हैं। इस तरीके में पेड़-पौधों की पत्तियां, हरी खाद एवं चारा, केचुएं की खाद डालकर भूमि सुधार किया जाता है इस विधि में अधिक समय लगता है तथा पुर्णरूप से सुधार संभव नहीं है।
    रसायनिक विधि: यह विधि तीनो विधियों से उपयुक्त है इसमें रसायनिक भूमि सुधारकों के प्रयोग क साथ-साथ भौतिक प्रक्रियाओं का भी प्रयोग किया जाता है जिससे खराब भूमि जल्दी ही फसल उत्पादन हेतु सही हो जाती है इस विधि में मुख्य रूप से ये प्रक्रियाएं की जाती है-
    जुताई : इस विधि में समस्याग्रस्त भूमि की मई – जून में तीन चार बार डिस्क प्लाऊ द्वारा गहरी जुताई करें जिससे भूमि की कठोर परत टूट सके।
    मेड़बंदी : इस में खेत को ढलान के अनुसार छोटे- छोटे प्लाटों में बांट लें और इनके चारों ओर 30 सेमी. ऊंची मेड़ बना लेनी चाहिए एवं पूरे खेत के चारो ओर 3 फीट ऊंची मेड़ बना लें।
    समतलीकरण : खेत जुताई एवं बड़े क्यारी बनाने के बाद खेत को मशीन से समतल करना चाहिए।
    निकास नाली निर्माण : खेत क चारों ओर बड़ी मेड़ बनाने के साथ ही ढलान के अनुसार 2-3 फीट की नाली बना लेनी चाहिए जिससे बारिश के अधिक पानी का निकास हो सके।
    भूमि सुधारकों का प्रयोग : यदि लवणीय भूमि है तो पूरे खेत में पानी भरना चाहिए जिससे घुलनशील लवण का रिसाव हो जाता है परन्तु यदि भूमि क्षारीय व लवणीय क्षारीय है तो भूमि सुधारकों का प्रयोग करे इनके लिए जिप्सम बहुत ही उपयुक्त सुधारक है जिप्सप की मात्रा की मई- जून माह में जुताई करके 15 सेमी. गहराई तक मिला दें। यदि खेत कि मिट्टी चिकनी हो तो 100 क्विंटल बालू मिटटी एवं 100 क्विंटल गोबर खाद प्रति हेक्टेयर दर से मिला दे यह प्रक्रिया 7-10 वर्ष बाद फिर दोबारा करें यदि सिंचाई का पानी खराब हो तो 2-3 वर्ष बाद ही जिप्सम मिलायें तथा प्रति वर्ष मिट्टी एवं पानी जांच कराएं।
    लवणों का रिसाव: इस विधि में वर्षा का पानी खेत में 8 से 10 दिन तक भरा रखें और निकास नाली द्वारा निकाले उसके बाद उचित नमी पर खेत की जुताई करें यह क्रिया तीन-चार बार दोहराएं ताकि भूमि जल्दी ही लवणों से मुक्त हो जाये। फसल उत्पादन भूमि सुधार के दौरान अधिक वर्षा वाले क्षेत्रो में धान की फसल और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ढेंचा की फसल हरी खाद के लिए लें।

लवणीय एवं क्षारीय भूमियों की पहचान

  • बरसात या सिंचाई का पानी क्षारीय भूमि में कई दिनों तक भरा रहता है जबकि लवणीय भूमि में पानी का भराव नहीं होता है।
  • लवणीय भूमि में धरातल पर रुका हुआ पानी साफ रहता है जबकि क्षारीय भूमि में गहरे काले रंग का हो जाता है।
  • लवणीय भूमि में शुष्क मौसम में सफेद रंग कि परत भूमि पर ढक जाती है जबकि क्षारीय भूमि में ऐसा नहीं होता है।
  • क्षारीय भूमिगत जल प्राय: मीठा होता है जबकि लवणीय एवं लवणीय क्षारीय भूमि में खारा होता है।
  • लवणीय भूमि अद्र्धशुष्क क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है जबकि क्षारीय भूमि अद्र्धशुष्क एवं नम क्षेत्रों में पाई जाती है।
  • सामान्य एवं लवणीय भूमि में पौधों की जड़े 45-90 सेमी. गहरी जा सकती है जबकि क्षारीय भूमि में कठोर परत होने के कारण केवल 10-15 सेमी. तक ही जाती है।
  • पानी का निकास एवं रिसाव लवणीय भूमि में सामान्य होता है जबकि क्षारीय भूमि में कम होता है।
  • सामान्य व लवणीय भूमि में अकोशिकीय रंध्रता 10-30 प्रतिशत तक होती है जबकि क्षारीय भूमि में केवल 2 प्रतिशत ही होती है जिससे पौधों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
  • डॉ. सुरेश कुमार जाट
  • राहुल कुमार सिंह
  • डॉ. रतनलाल सुवालका
  • डॉ. शंकरलाल गोलाडा
    email : sandeeph64@gmail.com
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