फसलों को खरपतवारों से बचाएं : लाभ कमाएं

Share this

ऐसे पौधों एवं वनस्पतियों को खरपतवार कहा जाता है, जो किसी संदर्भ में अवांछित होते हैं। ये फसलों में, घास के मैदान में, बागों में हो सकते हैं। प्राय: निंदाई करके इन्हें निकाल दिया जाता है। दुनियाभर में खरपतवारों की लगभग 30 हजार प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से लगभग 18 हजार प्रजातियां फसलों को खासा नुकसान पहुंचाती हैं।
खरपतवार फसलों से तीव्र प्रतिस्पर्धा करके भूमि में निहित नमी एवं पोषक तत्वों के अधिकांश भाग को शोषित कर लेते हैं, फलस्वरूप फसल की विकास गति धीमी पड़ जाती है तथा पैदावार कम हो जाती है। खरपतवारों की रोकथाम से न केवल फसलों की पैदावार बढ़ाई जा सकती है, बल्कि उसमें निहित प्रोटीन, तेल की मात्रा एवं फसलों की गुणवत्ता में वृद्धि की जा सकती है। प्राकृतिक गुण के आधार पर विभिन्न फसलों में उगने वाले खरपतवारों को मुख्यत: तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है-
घास वर्ग के खरपतवार- घास वर्ग के खरपतवारों की पत्तियां पतली और लंबी होती हैं तथा इन पत्तियों के अन्दर समानांतर धारियां पाई जाती है। ये एक बीजीय पौधे होते हैं जैसे-सांवां (इकाइनोक्लोवा कोलोनम या इकाइनोक्लोवा कुसगेली), कोदों (इल्यूसिन इंडिका), मकड़ा (डैक्टाइलोक्टेनियम इजिप्टियम), दूब (साइनोडोन डैक्टाइलोन), वनचरी (सोरगम हैल्पैन्स), गिनिया घास (पानिकम डिकोटोमाईफलोरम)।
चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार- इस प्रकार के खरपतवारों की पत्तियां प्राय: चौड़ी होती है तथा ये अधिकतर दो बीज पत्रीय पौधे होते हैं- साठी (द्रायन्थेमा पोर्टुलकास्द्रम), कनकवा (कोमेलिना बैंगालेंसिस), कोन्दरा (डाइजेरा अर्वेन्सिस), भांगद (कैनाबिस सटाइवा), कंटीली चौलाई (अमरेन्थस स्पाइनोसस), मकोय (सोलेनम नाइग्रम), बड़ी दूधी (यूफोर्बिया हिरूटा), हजार दाना (फाइल्थैस निरूरी), जल भंगरा (एक्लिप्टा एल्बा), पुनर्नवा (बोरहेविया डिफयूजा) और गाजर घास (पार्थीनियम हिस्टोफोरस)।
सेज- सेज वर्गीय खरपतवार भी घास की तरह ही दिखते हैं, परन्तु इनका तना बिना जुड़ा हुआ, ठोस तथा यदा-कदा गोल की अपेक्षा तिकोना होता है।
प्रमुख खरपतवार – मस्टा, सावंक, झरनिया, बेसक, कनकी, महकुआ, काला भंगरा, फुलवारी, खाकी, छतरी वाला डिल्ला, डिल्ला, डिल्ली, मोथा, दूब घास, जलकुम्भी, बड़ी दुधी, छोटी दुधी, पथरचटा (खरपतवार),हाइड्रिला, लुनिया, मकरा, बलराज, जंगली नील, बंदरा बंदरी, साठी, कटीली चौलाई, चौलाई, केना

खरपतवारों के प्रकोप से क्षति- खरीफ फसलों में रबी मौसम की फसलों की तुलना में खरपतवारों के प्रकोप से अधिक क्षति होती है। सामान्यत: खरपतवार फसलों को प्राप्त होने वाली नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश, कैल्शियम और मैग्नीशियम का भारी मात्रा में उपयोग कर लेते हैं। इसके साथ-साथ खरपतवार फसलों के लिए नुकसानदायक रोगों और कीटों को भी आश्रय देकर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अलावा कुछ जहरीले खरपतवार जैसे गाजर घास (पार्थनियम), धतूरा, गोखरू, कांटेदार चौलाई आदि न केवल उत्पाद की गुणवत्ता को घटाते हैं बल्कि मनुष्य और पशुओं के स्वास्थ्य के प्रति खतरा उत्पन्न करते हैं। खरपतवारों द्वारा फसल में होने वाली क्षति की सीमा, फसल, मौसम तथा खरपतवारों के प्रकार तथा उनकी संख्या पर निर्भर करती है, अत: सभी फसलों में खरपतवारों की उपस्थिति के कारण समान क्षति नहीं होती है। विभिन्न फसलों में इस क्षति का स्तर 34.3 प्रतिशत से लेकर 89.8 प्रतिशत तक हो सकता है। जैसे धान की फसल में खरपतवारों से 30 से 35 प्रतिशत, मक्का, बाजरा, दलहन और तिलहन में 18 से 85 प्रतिशत, गन्ना में 38.8 प्रतिशत, कपास में 47.5 प्रतिशत, चुकंदर में 48.4 और सबसे अधिक प्याज में 90.7 प्रतिशत हानि होती है।
इसके अलावा खरपतवार भूमि की नमी सोख लेते हैं और मुख्य फसल में पानी की कमी हो जाती है। वहीं, खरपतवारों के कारण सब्जियों की फसलों में रंग की चमक में अंतर आ जाता है। फसलों के बीजों के साथ कई बार जहरीले खरपतारों के बीज मिश्रित हो जाते हैं, इससे किसानों को उनकी उचित कीमत नहीं मिल पाती है। जो किसान प्रमाणित या आधार बीज उत्पन्न कर रहे हों, उन्हें इस बात का विशेष ध्यान रखना होता है, क्योंकि यदि इनकी मात्रा 2 फीसदी से अधिक हो तो उनका प्रमाणित या आधार बीज खारिज कर दिया जाता है।
कब करें खरपतवार नियंत्रण- खरपतवारों के प्रकोप के कारण होने वाली हानि की सीमा कई बातों पर निर्भर करती है। फसलों में किसी भी अवस्था में खरपतवार नियंत्रण करना समान रूप से आर्थिक दृष्टि से लाभकारी नहीं होता है। इसलिए प्रत्येक फसल के लिए खरपतवारों की उपस्थिति के कारण सर्वाधिक हानि होने की अवधि निर्धारित की गई है। इस अवस्था/अवधि को क्रांतिक अवस्था कहते हैं।
कैसे करें खरपतवारों का नियंत्रण- किसान खरपतवारों को अपनी फसलों में विभिन्न विधियों जैसे कर्षण, यांत्रिकी, रसायनों तथा बायोलोजिकल विधि आदि का प्रयोग करके नियंत्रण कर सकते हैं। लेकिन पारंपरिक विधियों के द्वारा खरपतवारों का नियंत्रण करने पर लागत तथा समय अधिक लगता है, इसलिए रसायनों के द्वारा खरपतवार जल्दी व प्रभावशाली ढंग से नियंत्रित किये जाते हैं और यह विधि आर्थिक दृष्टि से लाभकारी भी है।

Share this
Advertisements

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *