दलहन में प्रमुख चना लगायें

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खेत की तैयारी : खरीफ मौसम के खाली पड़े खेतों सितंबर में या अक्टूबर के प्रारंभ में बार-बार जुताई करें ताकि बारिश की नमी का संरक्षण हो सके। खेत से कचड़ा आदि एकत्र कर नष्ट कर दें व पाटा लगाकर बुवाई का कार्य करें अथवा पलेवा लगाकर बुवाई करें।
उर्वरकों का उपयोग : मिट्टी परीक्षण की संस्तुति के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करेें सामान्य तौर पर दलहनी फसल होने के कारण चने को 20 कि.ग्रा. नत्रजन, 50 किलो फास्फोरस तथा 25 किलो पोटाश व 20 किलो सल्फर यदि फास्फोरस की आपूर्ति सुपर फास्फेट से न की गई हो। सल्फर की आपूर्ति के लिये जिप्सम का उपयोग करें। सिंचित अवस्था में जबकि असिंचित अवस्था में 10-12 कि.ग्रा. नत्रजन व 30 क्रि.ग्रा. फॉस्फोरस, 10-12 किलो सल्फर की आवश्यकता होती है। अंतिम जुताई से पूर्व 2-3 कि.ग्रा. पीएसबी कल्चर को 50 कि.ग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर खेत में भुरकाव करने से अच्छे परिणाम मिलते हैं।
बीज दर : देशी चने की 85 कि.ग्रा. जबकि बड़े आकार के काबुली चने की 125 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हे.के मान से उपयोग करें ताकि एक वर्ग मी. क्षेत्र में 25-30 पौधे हों। बुवाई के समय लाइन से लाइन 30 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी. रखे।
बीजोपचार : बीज की मृदा जनित फफूंदियों से सुरक्षा हेतु बोनी से पूर्व बीजोपचार आवश्यक है अत: थायरम या मेन्कोजेब की तीन ग्राम मात्रा अथवा कार्बेन्डाजिम या कार्बोक्सिन की 2 ग्राम मात्रा +1 ग्राम थायरम द्वारा प्रति किग्रा. की दर से उपचारित करें। फफूंदनाशक दवा से उपचार के पश्चात् 5 ग्राम राइजोबियम व 5 ग्राम पीएसवी से बीज  को निवेशित करें। राइजोबियम जीवाणु पौधों में जड़ ग्रंथियों की संख्या बढ़ाने में सहायक होते हैं जिससे भूमि में लगभग 200 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हे. वायुमंडल से स्थिर की जाती है तथा पीएसबी कल्चर जमीन में स्थिर स्फुर को घुलनशील अवस्था में लाकर पौधों को उपलब्ध करवाता है।
उन्नतशील प्रजातियां : बीज फसल उत्पादन का महत्वपूर्ण आदान है। अत: स्वस्थ, सुडौल, रोगरहित प्रजातियों का बीज बुवाई हेतु उपयोग लें।
किस्म– जे.जी. 315, जवाहर चना 218, जे.जी. 130, जे.जी. 412, जे.जी. 16,जे.जी. 11, जे.जी. 74, आईसीसीव्ही.10 (विजय), भारती, जे.के.जी. 1
शीर्ष शाखाएं तोडऩा : निंदाई करने के बाद जब चना के पौधे लगभग 20-25 से.मी. है। अथवा फूल अवस्था से पूर्व शाखायें अधिक निकलती हैं। जिससे उपज में वृद्धि होती है। असिंचित अवस्था में शीर्ष शाखायें नहीं तोड़ें।
सिंचाई : बुवाई से पूर्व खेत में भली-भांति यह तय कर लें कि पर्याप्त नमी है तभी बुवाई करें। चने की फसल में 45-60 दिन के भीतर सिंचाई करें। ध्यान रहे कि फूल आते समय सिंचाई न करें। हल्की भूमि में नमी होने पर फली लगते समय भी सिंचाई करें।
कटाई, गहाई व उपज : कटाई परिपक्व अवस्था में आने पर फलियां सूखकर पीली पड़ती हैं एवं पत्तियां झडऩे लगती हैं। इस समय कटाई करें। फसल की कटाई कर 2-3 दिन तक खेत में पड़ा रहने दें तत्पश्चात गहाई उपज करें। इस प्रकार प्रति हेक्टेयर 15-20 क्ंिवटल किस्मों के अनुसार उत्पादन मिलता है। भण्डारण दानों को भली-भांति सुखाकर 8-10 प्रतिशत नमी पर भण्डारित करें।

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