जैविक खेती विकल्प नहीं अनिवार्यता

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वास्तव में प्राकृतिक रूप से उत्पादित वे समस्त जैव पदार्थ जो प्राय: वनस्पतियों तथा जीव-जंतुओं के अवशेषों के सडऩे-गलने के फलस्वरूप प्राप्त होते हैं और खेतों में मिलाए जाने पर उपजाऊ शक्ति को बढ़ाते हैं जैविक खादों के नाम से जाने जाते हैं. इसके अंतर्गत गोबर की खाद, कम्पोस्ट हरी खाद, खली की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, हड्डियों से निर्मित खाद इत्यादि आती हैं. इन खादों की विशेषता यह है कि इनके प्रयोग से मिट्टी और फसलों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता. इनमें फसलों की वृद्धि के लिए आवश्यक समस्त सोलह मुख्य, गौण एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों के अलावा मृदा एन्जाइम, एंटीबायोटिक जैसे पदार्थ भी पाए जाते हैं जो मिट्टी की उर्वरता एवं उत्पादकता को टिकाऊ रखने में सहायक होते हैं.
हरित क्रांति के पहले हमारी खेती योग्य भूमि में चार-पांच प्रतिशत कार्बन पाया जाता था जो आज घटकर 0.4-0.5 प्रतिशत रह गया है जो भविष्य में खेती के लिए घातक सिद्ध हो सकता है. जैविक खादों के सीमित प्रयोग से मिट्टी का स्वास्थ्य लगातार खराब होता जा रहा है जिससे उसकी उर्वरता एवं उत्पादकता में कमी आ रही है. यह टिकाऊ खेती के लिए शुभ लक्षण नहीं है. जैविक खाद से मिट्टी की भौतिक एवं रासायनिक दशाओं में सुधार के अलावा मिट्टी में पाए जाने वाले सभी प्रकार के कीड़े-मकोड़े, केंचुए तथा सूक्ष्म जीवों के लिए भोजन का भी कार्य करती है जिससे क्रियाशीलता में वृद्धि के कारण मिट्टी में जैव पदार्थों के विघटन की दर बढ़ जाती है. मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की संख्या एवं क्रियाशीलता में वृद्धि से जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण एवं फास्फोरस की उपलब्धता में भी वृद्धि हो जाती है जिससे फसलों की उत्पादकता एवं मिट्टी के स्वास्थ्य में टिकाऊपन बढ़ जाता है. कुछ समस्याग्रस्त मृदाओं, जैसे ऊसर, क्षारीय, पथरीली एवं रेतीली भूमि में लगातार जैविक खादों के इस्तेमाल से उनकी उर्वरता एवं उत्पादकता में वृद्धि की जा सकती है.
जैविक खादें अपने उपयोगी गुणों के कारण हमेशा से इस्तेमाल होती आ रही हैं और आजकल नई-नई खादों और उर्वरकों का विकास होने के बावजूद भी येकिसानों में सबसे अधिक लोकप्रिय हैं. इसमें मुख्यत: वानस्पतिक सामग्री और पशुओं का गोबर होता है. इसमें वे चीजें होती हैं जो पौधों में होती हैं और इससे मिट्टी को वे सभी पदार्थ वापस मिल सकते हैं जो फसल के पौधे अपनी वृद्धि के लिए होते हैं.
पशुओं का गोबर, मूत्र और विछाली सीधे खाद के रूप में इस्तेमाल करने लायक नहीं होते क्योंकि उनके अधिकांश खाद तत्व ऐसे रूप में होते हैं कि उन्हें सड़ाना-गलाना पड़ता है. इस सामग्री में मौजूद जीवाणु (फन्जाई, बैक्टिरिया, एक्टिनो -माइसिटीज), पानी, हवा, तापमान, भोजन आदि सम्बन्धी अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर उसे सड़ा-गला देते हैं. विघटन की कुछ क्रिया वातजीवी जीवाणु करते हैं और कुछ अवातजीवी जीवाणु. खाद सामग्री के सफल विघटन के लिए दोनों ही प्रकार के जीवाणु का सहयोग और दोनों ही प्रकार की क्रियाओं का ठीक तरह से होना जरूरी है. विघटन के फलस्वरूप इसका रूप और रचना बदल जाती है. सारी खाद सामग्री खाद मिट्टी में बदलने पर ढीली और भुरभुरी हो जाती है उसमें किसी प्रकार की दुर्गंध नहीं आती.
जैविक खाद का गुण उसकी सामग्री पर निर्भर करता है. इस खाद के प्रयोग से मिट्टी की रचना में सुधार होने से उनके अन्य गुणधर्मों में भी सुधार हो जाता है, यह मिट्टी के तापमान को नियमित बना देती है. इससे मिट्टी अत्यधिक गर्म और अत्यधिक ठंडी नहीं होने पाती. इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता भी बढ़ती है. मिट्टी की प्रतिरोध क्षमता बढ़ जाती है. इन खादों का प्रभाव खेत में कई वर्षों तक रहता है.
जैविक खेती का अर्थ कीटों, व्याधियों का विनाश करना नहीं है वरन् उन पर नियंत्रण करना है. इसके लिए गर्मी की जुताई, स्वस्थ एवं रोगरोधी किस्मों का प्रयोग, फसल चक्र, बीज शोधन, पौधों से पौधों और लाईन से लाईन की वांछित दूरी, संतुलित खाद का प्रयोग, सिंचाई का समुचित प्रबंध, कटाई के बाद फसल अवशेष को नष्ट करना आदि हैं जो भास्य क्रियाएं कहलाती हैं.
(सप्रेस)

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