क्या ऐसे बनायेंगे खेती को लाभ का धंधा ?

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राज्य में जिलास्तर पर आयोजित कृषि सम्मेलनों में प्रदेश के मुखिया सहित राज्यभर के मंत्री खेती को लाभ का धन्धा बनाने के आश्वासन निरंतर ही दे रहे है। लेकिन वास्तविकता के धरातल पर खेती की आय में कहीं से कोई वृद्धि होती नहीं दिखाई दे रही है। जिलास्तर पर कृषि सम्मेलन ऐसे समय पर आयोजित हो रहे है जबकि इस समय प्रदेश का किसान दिन-रात खेती में जुटा है। उसके पास स्वयं की दिनचर्या की भी फुर्सत नहीं है। ऐसे में सरकार बड़ी फिजूलखर्ची द्वारा यह सम्मेलन किसके के लिये आयोजित कर रही है? यह बड़ा प्रश्न है। सरकार के मंत्री भी खेती से जुड़े होने की वजह से किसान के समय की अहमियत को समझ सकते है। लेकिन लगता है कि वह सभी भी नौकरशाही के निर्णय के आगे नतमस्तक हैं। अधिकारियों द्वारा इन कार्यक्रम की रूपरेखा वास्तविकता के धरातल के बजाय बंद कमरों में तय करने के कारण ही ऐसी हास्यपद स्थिति बनी है। जिन सम्मेलनों में किसानों की उपस्थिति न हो, जिससे किसान लभांवित न हो सकें वहां ऐसे आयोजनों द्वारा मात्र फिजूलखर्ची औचित्यहीन ही है। वर्तमान में प्रदेश के नब्बे फीसदी हिस्से में बुआई पूर्ण हो चुकी है। किसान सिंचाई के लिये बिजली की जुगाड़ में लगा है। लेकिन बिजली विभाग जले हुये ट्रांसफार्मरों को नहीं बदल सका है। प्रदेश में इस समय 40 फीसदी ट्रांसफार्मरों को बदला जाना है। लेकिन विभागीय कार्यप्रणाली से किसान समय पर सिंचाई नहीं कर पा रहा है। वही आबरा घूमते मवेशियों ने बोई गयी फसलों के बड़े भाग को चट कर दिया है। गौवंश के संरक्षण का खमियाजा प्रदेश के किसानों को अपनी फसलों से देना पड़ रहा है। प्रदेश सरकार ने गौवंश के संरक्षण के लिये इनके कत्ल पर रोक लगाकर देशहित में कार्य किया है। लेकिन इस गौवंश के खाने-पीने एवं उसके ठहरने का कहीं कोई प्रबंध नहीं किया है। जिसके कारण किसानों के खेत इन अवारा मवेशियों की भोजनशाला एंव सड़कें, राजमार्ग इनके रैन बसेरा बन चुके है। राजमार्ग पर बैठने वाले इन मवेशियों से टकराकर प्रतिदिन अनेकों वाहन दुर्घटनाग्रस्त हुआ करते हैं। लेकिन प्रशासन इससे निपटने की कोई पहल नहीं कर सका है। ग्रामीण अपनी फसल बचाने इन मवेशियों को एक गांव से दूसरे गांव की और हांक रहे हैं जो कि समस्या का स्थाई हल नहीं है। आज प्रत्येक पंचायत स्तर पर कम से कम एक गौशाला के निर्माण की आवश्यकता है। जिसे पंचायतें स्वयं इस गौधन के मूत्र एवं गोबर से गौशाला के संचालन की आय असानी से अर्जित कर सकती है। इसलिये प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक गौशाला की स्थापना को सरकार द्वारा अनिवार्यता से लागू करना चाहिये था। इसके बगैर खेती का संरक्षण एवं खेती को लाभ का धन्धा बना पाना नामुमकिन है। लेकिन हकीकत यहां यह है कि डेढ़ वर्ष पूर्व प्रदेश के मुख्यमंत्री ने स्वयं विदिशा जिले की जिस सुआखेड़ी गौशाला का भूमिपूजन कर गौसंरक्षण एंव इसके माध्यम से जैविक खेती को बढ़ावा देने की बात कही थी, वहां आज तक निर्माण की एक ईट भी नहीं रखी जा सकी है। पिछले दिनों सरकार के मुखिया द्वारा अपने गृह जिले में वितरित फसल बीमा की तुलना करते हुये इसे इतना अधिक बताया था कि इस प्राप्त रकम के अनुपात में जिले की किसानों ने कभी फसल नहीं बेची थी। लेकिन इस बयान के बाद बड़ी तदाद में ऐसे किसान सामने आये हैं, जिनके पटवारी हल्का द्वारा बीमा कम्पनी को अदा किया गया बीमा प्रीमियम की तुलना में बहुत कम बीमा क्लेम दिया गया है। वहीं इस जिले में बीमा क्लेम से कई गांवों को वंचित रखे जाने के मामले भी बड़ी तादाद में है। मुख्यमंत्री की यह गलत बायनी जिले के अधिकारियों के गलत आंकड़ों के कारण है। गत वर्ष का नुकसान सम्पूर्ण जिले में एक जैसा होने के बाद भी बीमा भुगतान में ऐसा भेदभाव सरकार की कथनी एवं करनी के बड़े अंतर को रेखांकित करने वाला है। प्रशासन द्वारा बनाये जाने वाले आंकड़ों से खेती को वास्तविकता के आधार पर लाभ का धन्धा बना पाना राज्य सरकार के लिये बेहद मुश्किल है। बावजूद इसके सरकार नौकरशाही की इस कार्यप्रणाली पर रोक लगाने में नाकाम रही है। पांच या दस वर्ष में खेती किसी चमत्कार से लाभ का धन्धा नहीं बन सकती है। इसके लिये आवश्यक है कि सरकार खेती की मैदानी जरूरतों को समझे एवं वर्तमान आवश्यकता को समय पर पूरा करे।

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