राज्य कृषि समाचार (State News)

डायरेक्ट सीडेड राइस में निवेश से जलवायु-अनुकूल भारतीय कृषि का भविष्य बदला जा सकता है

15 फरवरी 2026, हैदराबादडायरेक्ट सीडेड राइस में निवेश से जलवायु-अनुकूल भारतीय कृषि का भविष्य बदला जा सकता है – देश की धान खेती आज कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। सिंचाई जल की कमी, खेतिहर मजदूरी की बढ़ती लागत और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों ने पारंपरिक रोपाई-आधारित धान खेती (टीपीआर) को दिन-प्रतिदिन महँगा और जोखिमपूर्ण बना दिया है। ऐसे समय में सूखी डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) एक प्रभावी विकल्प के रूप में उभर रही है।

हालाँकि, अब तक डीएसआर को अपेक्षित गति नहीं मिल पाई है, क्योंकि प्रचलित धान की अधिकांश किस्में सीधे बोआई के लिए विकसित नहीं की गई थीं।इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI) द्वारा भारतीय अनुसंधान संस्थानों के सहयोग से तथा भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के समर्थन से एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया गया है। यह अध्ययन दर्शाता है कि यदि डीएसआर-अनुकूल किस्मों के विकास में लक्षित निवेश किया जाए, तो किसानों और पर्यावरण—दोनों को ठोस लाभ मिल सकते हैं।

खेतों में दिखा डीएसआर का मजबूत प्रदर्शन

सूखी डायरेक्ट सीडेड परिस्थितियों में की गई बड़े पैमाने की फील्ड डेमोन्स्ट्रेशन में नई धान लाइनों ने समान अंकुरण, तेज शुरुआती वृद्धि और मजबूत पौध विकास दिखाया। इससे स्पष्ट हुआ कि ये किस्में कम पानी और कम श्रम में भी अच्छी उपज देने की क्षमता रखती हैं।

आईआरआरआई की धान प्रजनक डॉ. पल्लवी सिन्हा ने कहा,-“डायरेक्ट सीडेड धान तभी सफल हो सकती है, जब किसान उस पर हर साल भरोसा कर सकें। निरंतर निवेश से ही ऐसी किस्में विकसित होती हैं जो अलग-अलग परिस्थितियों में स्थिर प्रदर्शन दें।”

डीएसआर और रोपाई—दोनों के लिए उपयुक्त किस्में

इस शोध का प्रमुख उद्देश्य यह रहा कि किसानों द्वारा पहले से पसंद की जाने वाली धान किस्मों को इस तरह सुधारा जाए कि वे डायरेक्ट सीडेड और पारंपरिक रोपाई—दोनों परिस्थितियों में अच्छा प्रदर्शन कर सकें।

कई मौसमों तक किए गए परीक्षणों में पाया गया कि श्रेष्ठ डीएसआर-अनुकूल लाइनों ने डायरेक्ट सीडेड दशा में लगभग 15 प्रतिशत अधिक उपज दी, जबकि रोपाई की स्थिति में भी उनका प्रदर्शन संतोषजनक रहा।इस दोहरी अनुकूलता से किसानों को जल संकट, मजदूरों की कमी और मौसम की अनिश्चितता के बीच खेती के तरीके चुनने की आज़ादी और सुरक्षा मिलती है।

खेत में किए गए तुलनात्मक प्रदर्शन में यह भी देखा गया कि एक नई डीएसआर-अनुकूल लाइन ने, डायरेक्ट सीडेड परिस्थितियों में, प्रचलित हाइब्रिड किस्म की तुलना में बेहतर बढ़वार दिखाई।

आईआरआरआई के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय प्रजनन प्रमुख डॉ. विकास के. सिंह ने कहा,-“अगर किस्में भरोसेमंद नहीं होंगी, तो किसान डीएसआर नहीं अपनाएँगे। लोकप्रिय किस्मों को डायरेक्ट सीडिंग के अनुकूल बनाकर हम किसानों को कम पानी और कम श्रम में बेहतर उत्पादन दिला सकते हैं।”

जलवायु लक्ष्यों से सीधा जुड़ाव

वैज्ञानिकों का मानना है कि डीएसआर का विस्तार भारत की वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताओं—जैसे उत्सर्जन तीव्रता में कमी और कृषि में जल-उपयोग दक्षता—के साथ पूरी तरह मेल खाता है।

डीबीटी के वैज्ञानिक एवं परियोजना अधिकारी डॉ. संजय कालिया ने कहा,-“धान की खेती में मीठे पानी को अक्सर मुफ़्त संसाधन मान लिया जाता है। डीएसआर तकनीक इस सोच को बदलेगी। हमारा लक्ष्य है कि धान की खेती भी गेहूँ की तरह हो—और अगले एक दशक में यह हकीकत बन सकती है।”

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि डीएसआर-अनुकूल किस्मों को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए, तो मध्य भारत के धान उत्पादक राज्यों में सिंचाई जल की मांग में भारी कमी, किसानों की आय में बढ़ोतरी और धान खेती के कार्बन फुटप्रिंट में गिरावट संभव है।अध्ययन में शामिल कई नई किस्में इस समय राष्ट्रीय परीक्षण प्रक्रिया के अंतिम चरणों में हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा निवेशों का लाभ जल्द ही किसानों के खेतों में दिखाई देगा।

बढ़ते जलवायु जोखिमों के दौर में, डायरेक्ट सीडेड राइस में निवेश केवल एक कृषि तकनीकी निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ, सुरक्षित और भविष्य-सक्षम बनाने की रणनीतिक पहल है।यह डीबीटी-समर्थित अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल The Plant Genome में प्रकाशित हुआ है।

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