कृषि को पूर्ण लाभ का धंधा बनाने में जुटी सरकार

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प्रसंग: केन्द्र सरकार की खरीफ फसलों के सर्मथन मूल्य में अभूतपूर्व वृद्धि

  • विनोद के. शाह
    हॉस्पिटल रोड,
    विदिशा मो.: 9425640778

 28 जून  2021, विदिशा कृषि को पूर्ण लाभ का धंधा बनाने में जुटी सरकार – किसान आन्दोलन एवं विपक्ष के झूठे प्रचार को नकारते हुये केन्द्र की मोदी सरकार ने किसानों को फसलों के लाभकारी मूल्य दिलाने एवं फसलों के उचित चयन में किसान जागरुकता के लिये खरीफ फसल की बुवाई से पूर्व आगामी खरीफ फसल के समर्थन मूल्य (एमएसपी) में अभूतपूर्व वृद्धि की है। धान के सरकारी समर्थन मूल्य में 72 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि कर 1940 किया गया है। दलहन एवं तिलहन में आयात निर्भरता घटाने एवं किसानों को दलहनी फसलों के लिये अधिकाधिक आकर्षित एवं प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अरहर एवं उड़द के समर्थन मूल्य में 300 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है। तिल के समर्थन मूल्य में 452 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है। मंूगफली में 275, सूरजमुखी में 130 एवं सोयाबीन में 70 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की है। दूसरी तरफ मोटे अनाज ज्वार, बाजरा, मक्का एवं रागी के समर्थन मूल्य को भी बढ़ाया गया है। मोदी सरकार विगत तीन वर्षों से लगातार कृषि उत्पादों के समर्थन मूल्य प्रतिवर्ष बढ़ा रही है। पिछले एक दशक में केन्द्र सरकार द्धारा समर्थन मूल्य में वृद्धि ढाई से तीन गुना तक की गई है। दूसरी तरफ समर्थन मूल्य पर खरीद के सरकारी आंकड़े भी लगातार रिकॉर्ड वृद्धि हो रही है। केन्द्र सरकार का मकसद जहां कृषि आय को बढ़ाना है, तो देश की जीडीपी में कृषि के महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित करना भी है। केन्द्रीय खाद्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश में दालों के आयात पर प्रतिवर्ष 15 से 20 हजार करोड़ की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। मोदी सरकार की प्राथमिकता इस विदेशी मुद्रा को खर्च होने से बचाने एवं देश को दलहन के मामले में आत्मनिर्भर बनाकर देश को निर्यात की स्थिति में खड़ा करना है। जलवायु परिवर्तन की प्रतिकूलता से मध्यप्रदेश ंएवं राजस्थान में सोयाबीन फसलें पिछले कई वर्षों से बुरी तरह से प्रभावित हो रही हैं। निरन्तर सोयाबीन फसल खराब होने से इन राज्यों में किसानों के आर्थिक हालात बिगडऩे से किसान आत्मघात जैसे दुखद कदम उठाने लगे थे। बावजूद इसके इन राज्यों के किसान अन्य फसलों का विकल्प चुनने के बजाय सोयाबीन फसल का मोह नहीं छोड़ पा रहे हंै।

सोयाबीन का विकल्प

खरीफ फसलों के समर्थन मूल्य वृद्धि में केन्द्र सरकार की नीति किसानों को सोयाबीन के बजाय तिल, उड़द, अरहर एवं सूरजमुखी की फसलों की तरफ आकर्षित कर अधिकाधिक मूल्य दिलाना है। तिल की फसल कम लागत में अच्छा उत्पादन देने के साथ मिट्टी की उर्वराशक्ति बड़ाने वाली है। विदेशों में भारतीय तिल की अधिक मांग के कारण निर्यात संभावनायें बहुत अधिक हंै। इसलिये सोयाबीन की तुलना में तिल के समर्थन मूल्य को कई गुना अधिक की वृद्धि किसानों को सोयाबीन की वैकल्पिक फसल चुनने हेतु आकर्षित करती है। खरीफ फसल के दौरान दलहनी एवं तिलहनी फसलों की तरफ किसानों को आकर्षित करने एवं इन फसलों का रकबा बढ़ाने केन्द्र सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर एक व्यापक योजना तैयार की है। जिसमें लघु एवं सीमांत किसानों को उच्च गुणवत्ता का मुफ्त बीज उपलब्ध कराया जा रहा है। नीति आयोग के द्धारा राज्यों में 20 लाख मिनीकिट पैकेटों जिसमें अरहर, उड़द, मूंग एवं तिलहन शामिल है। वितरण किया गया है। अधिकांश राज्य सरकारों की एजेंसियां इस वितरण को पात्र किसानों तक पहुंचाने में ईमानदारी से पालन नहीं कर पा रही हैं।

बागवानी क्लस्टर

किसानों की आमदनी बड़ाने एवं निर्यात की संभावनाएं तलाशने के उद्देश्य से केन्द्र सरकार ने देश में 53 बागवानी क्लस्टरों का चयन किया है। इस योजना का पहला चरण 12 क्लस्टरों में प्रारंभ किया गया है। आगामी पांच वर्षों में सभी क्लस्टरों को कृषि उत्पादन से लेकर अधिक मुनाफे का बाजार उपलब्ध कराने की योजना है। जिसमें सीधा निर्यात भी शामिल है। योजना अंर्तगत बागवानी एवं फल उत्पादन में दुनिया में भारत की हिस्सेदारी 12 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी करने की है। जिसमें परियोजना से जुड़े उत्पादन, लॉजिस्टिक्स, मार्केटिंग, ब्रॉन्डिंग एवं इन्फ्रास्टक्चर का विकास शामिल है। इस तरह आगामी वर्षों में यह परियोजना देश के 728 चयनित जिलों में प्रारंभ की जा सकेगी। जिसमें प्रत्येक एक जिला— एक अलग उत्पाद के रुप में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। परियोजना का उद्देश्य फसलों से जुड़ी नई तकनीकी, छोटे किसानों को अधिक मुनाफा देने वाली महंगी फसलों के लिये प्रोत्साहित करने के साथ नई शिक्षित युवा पीढ़ी को खेती के वैश्विक बाजार में पारंगत करने से है।

रिकॉर्ड अनाज उत्पादन

वैश्विक महामारी कोविड के चलते जहां देश की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था भारी दबाव में है, लेकिन इस विषम परिस्थिति में रिकॉर्ड कृषि उत्पादन भारतीय अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा सहारा बना है। पिछले दो रबी फसल सीजन में न केवल खाद्यान्न उत्पादन के रिकॉर्ड बने हंै, बल्कि खाद्यान्न का निर्यात सकारात्मकता से आगे बड़ा है। रबी फसल 2021 में गेहंू उत्पादन में 80 लााख टन की वृद्धि हुई है। मोटे अनाज उत्पादन में 18 लाख टन की बढ़त आयी है। खरीफ 2020 में धान का उत्पादन 10.37 करोड़ टन हुआ था। जो देश के सर्वाधिक स्तर पर था। आगामी खरीफ फसल 2021 में केन्द्र सरकार ने धान उत्पादन का लक्ष्य 10.43 लााख टन रखा है। धान उत्पादन के प्रति देश में किसानों के उत्साह को देखते हुये लगता है कि देश का कास्तकार आगामी सीजन में इस लक्ष्य से बहुत आगे निकल चुकेगा।

विदेशों में भारतीय अनाज की मांग बढ़ी

कोरोना अवधि में भारत से पोषक तत्व युक्त जैविक कृषि उत्पादों की मांग विदेशों में तेजी से बड़ी है। भारतीय किसानों को इसी अवसर का लाभ लेना है। अन्य विकासशील देशों की तुलना में भारत में कीटनाशकों के कम उपयोग के कारण भारत के ताजा फल, सब्जियां एवं अनाज की मांग विदेशों में बड़ी है। चालू अवधि में भारत से चावल का 1.77 करोड़ टन एवं गेहूं का 20 लाख टन निर्यात हो चुका है। बासमती चावल में निर्यात दर गत वर्ष की तुलना में 04 फीसदी अधिक है। जबकि गैर बासमती में यह दर दौगुनी से अधिक है। कृषि निर्यात के क्षेत्र में भारत के पास अभी बहुत अधिक संभावनाएं हंै। यदि देश का किसान कीटनाशक मुक्त जैविक अनाज, फल एवं सब्जियों का अधिकाधिक उत्पादन करें तो भरपूर विदेशी बाजार उपलब्ध है। अब इस दिशा में देश के किसानों को जागरुकता के साथ संकल्पित होकर पौष्टिक एवं गुणवत्तापूर्ण उत्पादन में जुटना है। निश्चित ही किसानों एवं सरकार का प्रयास कामयाबी की एक नई इबारत लिखेगा।

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