मशीनरी प्रशिक्षण में कृषकों ने सीखा यंत्रो का संचालन

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04 नवम्बर 2020, बालाघाट। मशीनरी प्रशिक्षण में कृषकों ने सीखा यंत्रो का संचालनकृषि विज्ञान केन्द्र, बड़गांव, बालाघाट एवं केन्द्रीय कृषि मशीनरी प्रशिक्षण एवं परीक्षण संस्थान, बुधनी के संयुक्त तत्वाधान में बेरोजगार युवाओं एवं किसानों के लिए कृषि मशीनरी प्रशिक्षण कार्यक्रम 02 से 06 नवंबर तक चलाया जा रहा हैं। इस प्रशिक्षण में 8 ग्रामों के 40 कृषक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। केन्द्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. आर.एल. राऊत ने प्रशिक्षार्थिंयों को कृषि संबंधित उपकरणों जैसे ट्रेक्टर की देखभाल एवं रख-रखाव, सीड ड्रील का उपयोग एवं रीपर का विस्तारपूर्वक जानकारी दी। कार्यक्रम के नोडल अधिकारी डॉ. ब्रजकिशोर प्रजापति ने जानकारी दी कि मशीनों के प्रयोग से कृषि में उपयोग वाले आदानों में बचत होती हैं, जैसे कि बीज एवं खाद में 15-20 प्रतिशत की कमी, समय एवं श्रम में 20-30 प्रतिशत की कमी तथा साथ में उचित बीज जमाव से फसल घनत्व में 5-20 प्रतिशत अधिकता होती हैं। इस प्रकार मशीनरी के उपयोग से 10-15 प्रतिशत उत्पादकता में बढ़ोत्तरी होती हैं और आर्थिंक रूप से अधिक बचत होती हैं। इससे कृषि में श्रमिकों की निर्भरता में कमी लाकर, कम समय एवं श्रम में कृषि कार्य सम्पन्न करके उत्पादन को बढ़ाया जा सकता हैं।

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प्रशिक्षण में भारत सरकार के केन्द्रीय मशीनरी प्रशिक्षण एवं परीक्षण संस्थान, बुधनी से श्रीमती बिन्दु राहंगडाले, तकनीकी सहायक श्री अनीष मालवीय, वरिष्ठ तकनीशियन एवं ओमप्रकाश दुबे तकनीकी सहायक द्वारा जानकारी दी गई कि मशीनीकरण में मुख्य रूप से जुताई, बुवाई, रोपाई, खाद, छिड़काव, सिंचाई, कटाई, मढ़ाई एवं ओसाई के कार्य किए जाते हैं। जैसा कि ज्ञात हैं कि मशीनीकरण का स्तर सबसे अधिक मिट्टी की तैयारी में 40-50 प्रतिशत, सिंचाई में 45 प्रतिशत, बुवाई एवं रोपाई में 29 प्रतिशत, फसल सुरक्षा में 34 प्रतिशत तथा कटाई एवं मड़ाई में 60-70 प्रतिशत तक हैं। लेकिन यह धान एवं गेहूं तक सीमित हैं। अन्य फसलों में यह केवल 5 प्रतिशत ही हैं। इस प्रकार कुल मशीनीकरण का औसत स्तर 40-45 प्रतिशत तक ही हैं। इसको बढ़ाना अति-आवश्यक हैं। केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. एस.के. जाटव द्वारा रबी की फसलें जैसे -चना, गेहूं एवं अलसी की बुवाई में प्रयोग होने वाले सीड ड्रील मशीन के महत्व की जानकारी प्रदान की। प्रशिक्षण कार्यक्रम को सफल बनाने में केन्द्र के धमेन्द्र आगाषे, सुखलाल वास्केल, जितेन्द्र मर्सकोले एवं जितेन्द्र नगपुरे ने अपना-अपना सराहनीय योगदान दिया।

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