ज़ायद में मूंग-उड़द की उन्नत खेती: कम समय में अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा
लेखक: ऋचा खन्ना एवं देवेन्द्र कुमार, वरिष्ठ प्राविधिक सहायक एवं प्राविधिक सहायक संभागीय कृषि परीक्षण एवं प्रदर्शन केन्द्र मेरठ, कृषि विभाग, उत्तर प्रदेश
17 मार्च 2026, भोपाल: ज़ायद में मूंग-उड़द की उन्नत खेती: कम समय में अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा – भारत की कृषि प्रणाली में ज़ायद ऋतु का विशेष महत्व है, क्योंकि यह रबी और खरीफ फसलों के मध्य की अवधि को उत्पादक बनाती है। सामान्यतः मार्च से जून तक का समय ज़ायद ऋतु के अंतर्गत आता है। इस अवधि में तापमान उच्च, आर्द्रता कम तथा वर्षा न्यून होती है, जिससे सिंचाई एवं नमी प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। ज़ायद की फसलें अल्प अवधि की होती हैं और सीमित संसाधनों में भी अच्छा उत्पादन प्रदान करती हैं। विशेष रूप से मूंग एवं उड़द जैसी दलहनी फसलें न केवल आर्थिक दृष्टि से लाभकारी हैं, बल्कि मृदा स्वास्थ्य सुधार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
भारत में दलहनों का उत्पादन पोषण सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ है, क्योंकि यह प्रोटीन का प्रमुख शाकाहारी स्रोत हैं। मूंग एवं उड़द में लगभग 22–25 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। इसके अतिरिक्त इनमें आयरन, कैल्शियम तथा विटामिन बी-समूह के तत्व भी उपलब्ध होते हैं। अतः ज़ायद ऋतु में इन फसलों की उन्नत खेती किसानों की आय के साथ-साथ पोषण सुरक्षा को भी सुदृढ़ करती है।
ज़ायद फसलों की सामान्य विशेषताएँ:
ज़ायद फसलों में तरबूज, खरबूज, ककड़ी, भिंडी, लौकी, तोरई के साथ-साथ मूंग एवं उड़द प्रमुख हैं। इनकी अवधि सामान्यतः 60–75 दिन होती है। सिंचित क्षेत्रों में रबी की कटाई के बाद उपलब्ध नमी एवं अवशिष्ट उर्वरता का उपयोग कर इन फसलों की सफल खेती की जा सकती है। भूमि की दृष्टि से दोमट अथवा बलुई दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकास की उत्तम व्यवस्था हो, सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। pH मान 6.0–7.5 के मध्य होना चाहिए। अधिक लवणीय अथवा जलभराव वाली भूमि इन फसलों के लिए हानिकारक होती है।
मूंग की उन्नत खेती:
जलवायु एवं भूमि
मूंग गर्म एवं शुष्क जलवायु की फसल है। अंकुरण के लिए 25–35° से. तापमान उपयुक्त रहता है। अधिक वर्षा या आर्द्रता से रोगों की संभावना बढ़ जाती है।
उन्नत किस्मों का चयन
क्षेत्रानुसार विकसित उन्नत एवं शीघ्र पकने वाली किस्मों का चयन करना चाहिए। ऐसी किस्में जो 60–65 दिनों में पककर तैयार हो जाएँ, ज़ायद के लिए उपयुक्त रहती हैं। रोग प्रतिरोधी एवं अधिक फलियाँ देने वाली किस्में उत्पादन में वृद्धि करती हैं। प्रमाणित बीज का प्रयोग अनिवार्य है।
तालिका 1: ज़ायद मौसम के लिए उपयुक्त मूंग की उन्नत प्रजातियाँ:
| फसल | प्रजाति | पकने की अवधि (दिन) | प्रमुख विशेषताएँ | औसत उपज (क्विंटल/हेक्टेयर) |
| मूंग | Pusa Vishal | 60–70 | यह किस्म अपनी त्वरित वृद्धि, उच्च उपज और रोग प्रतिरोधक क्षमता (पीले मोज़ेक वायरस के प्रति उच्च प्रतिरोधकता ) के कारण किसानों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय है, जो इसे दोहरी फसल की स्थितियों के लिए आदर्श बनाती है। | 12–14 |
| मूंग | SML 668 | 50-60 | एसएमएल 668 हरी मूंग की एक उच्च उपज देने वाली, जल्दी पकने वाली किस्म है, जो भारत में ग्रीष्म ऋतु में खेती के लिए लोकप्रिय है। रोग प्रतिरोधक क्षमता और उच्च प्रोटीन सामग्री के लिए जानी जाने वाली यह किस्म गेहूं के बाद जीरो-टिल ड्रिल से बोने के लिए उपयुक्त है, जिससे उच्च गुणवत्ता वाले हरे बीज प्राप्त होते हैं। | 11–14 |
| मूंग | PDM-139 (Samrat) | 60–65 | एक उच्च उपज देने वाली, जल्दी पकने वाली मूंग की किस्म है जो ग्रीष्म और खरीफ दोनों मौसमों में खेती के लिए उपयुक्त है। यह अपने एकसमान, गहरे हरे, चमकदार और आकर्षक दानों के लिए लोकप्रिय है। रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रबल होती है और फली एकसमान रूप से पकती हैं। | 12–14 |
| मूंग | Pant Moong-5 | 60–65 | हरी मूंग की एक उच्च उपज देने वाली, बड़े बीजों वाली किस्म है, जिसे 2010 में जीबीपीयूएटी, पंतनगर द्वारा जारी किया गया था। यह खरीफ और ग्रीष्म ऋतुओं के लिए उपयुक्त है। यह अपने उच्च पोषण मूल्य (प्रोटीन 24.2%, कैल्शियम 261 mg/100 g) उत्कृष्ट पाक गुणवत्ता और पीले मोज़ेक वायरस (वाईएमवी), सर्कोस्पोरा लीफ स्पॉट (सीएलएस) और एन्थ्रेक्नोज जैसी बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता के लिए जानी जाती है। | 11–13 |
| मूंग | IPM 02-03 | 60–65 | भारत में विकसित मूंग की एक उच्च उपज देने वाली, कम अवधि वाली और रोग प्रतिरोधी किस्म है, जो विशेष रूप से मूंग येलो मोज़ेक वायरस (MYMV) के प्रति प्रतिरोधक क्षमता और उपज में उच्च स्थिरता के लिए जानी जाती है। आईपीएम 02-03 को रोग के दबाव को झेलने और उत्पादकता बनाए रखने की क्षमता के मामले में “गेम-चेंजर” के रूप में मान्यता प्राप्त है। | 12–14 |
बीज दर एवं बुवाई
ज़ायद में मूंग की बुवाई मार्च के अंतिम सप्ताह से अप्रैल के प्रथम पखवाड़े तक करनी चाहिए। बीज दर लगभग 15–20 किग्रा प्रति हेक्टेयर उपयुक्त रहती है। कतार से कतार की दूरी 30 सेमी तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सेमी रखी जाती है। बीजोपचार राइजोबियम कल्चर एवं फफूंदनाशी से करने पर अंकुरण अच्छा होता है तथा नत्रजन स्थिरीकरण की क्षमता बढ़ती है।
पोषण प्रबंधन
यद्यपि मूंग एक दलहनी फसल है और वायुमंडलीय नत्रजन का स्थिरीकरण करती है, फिर भी प्रारंभिक वृद्धि हेतु 15–20 किग्रा नत्रजन तथा 40–50 किग्रा फॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर देना लाभकारी होता है। सल्फर की 20 किग्रा मात्रा से दानों की गुणवत्ता एवं उपज में वृद्धि देखी गई है।
सिंचाई प्रबंधन
ज़ायद में सामान्यतः 3–4 हल्की सिंचाइयाँ पर्याप्त होती हैं। पहली सिंचाई बुवाई के तुरंत बाद, दूसरी फूल आने पर तथा तीसरी फली भरने की अवस्था में दी जानी चाहिए। ड्रिप सिंचाई से जल की बचत एवं बेहतर वृद्धि संभव है।
खरपतवार एवं कीट-रोग नियंत्रण
प्रारंभिक 20–25 दिन खरपतवार नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण हैं। निराई-गुड़ाई या उपयुक्त खरपतवारनाशी का प्रयोग किया जा सकता है। प्रमुख कीटों में सफेद मक्खी, माहू तथा फली छेदक शामिल हैं। समेकित कीट प्रबंधन के अंतर्गत नीम आधारित कीटनाशी, फेरोमोन ट्रैप एवं आवश्यकता अनुसार रासायनिक नियंत्रण अपनाना चाहिए।
तालिका 2: ज़ायद मूंग में प्रमुख कीट-रोग तथा उनका प्रबंधन:
| फसल | कीट / रोग पहचान / लक्षण | प्रबंधन उपाय |
| मूंग | सफेद मक्खी: मूंग का एक प्रमुख रस चूसने वाला कीट है, जो मूंगबीन येलो मोज़ेक वायरस (YMV) फैलाकर 30-80% तक उपज हानि का कारण बनता है। निम्फ और वयस्क पत्तियों के निचले भाग से कोशिका रस चूसते हैं, जिससे पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, सूख जाती हैं, मुड़ जाती हैं और उनका विकास रुक जाता है। | पीले स्टिकी ट्रैप लगाएँ, नीम आधारित उत्पाद का छिड़काव करें। अधिक प्रकोप होने पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 SL @ 0.3 मि.ली. प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। अधिकतम प्रभावशीलता के लिए सुबह या शाम के समय स्प्रे करें। |
| मूंग | माहू (एफिड): पत्तियों व कोमल भागों से रस चूसते हैं, पत्तियाँ मुड़ जाती हैं और पौधे कमजोर हो जाते हैं। | मूंग (हरी मूंग) पर लगने वाले एफिड्स को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण आवश्यक है। इसमें जैविक नियंत्रणों, जैसे कि लेडीबर्ड्स को आकर्षित करना और 5% नीम के तेल का उपयोग करना, के साथ-साथ पीले चिपचिपे जालों का उपयोग करके वयस्क एफिड्स को पकड़नाशामिल है। संक्रमण की स्थिति में, 2% नीम के तेल या साबुन आधारित कीटनाशकों का छिड़काव प्रभावी होता है। प्रमुख रासायनिक नियंत्रणों में थियामेथॉक्सम 25% डब्ल्यूजी, इमिडाक्लोप्रिड 17.8% एसएल या एसिटामिप्रिड 20% एसपी शामिल हैं। |
| मूंग | फली छेदक: कीट फलियों में छेद कर दानों को नुकसान पहुँचाता है। | फेरोमोन ट्रैप लगाएँ और संक्रमित फलियों को नष्ट करें। अधिक प्रकोप होने पर स्पिनोसैड 45 SC @ 60-90 मि.ली. प्रति एकड़ का छिड़काव करें। |
| मूंग | पीला मोजेक रोग: पत्तियों पर पीले मोजेक जैसे धब्बे बनते हैं और पौधों की वृद्धि रुक जाती है। | रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें तथा रोग फैलाने वाली सफेद मक्खी को नियंत्रित करें। इसके लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 SL @ 0.3 मि.ली. प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। |
| मूंग | पत्ती धब्बा रोग: पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे दिखाई देते हैं और पत्तियाँ सूखने लगती हैं। | बीजोपचार कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज से करें। रोग दिखने पर कार्बेन्डाजिम 50 WP @ 1 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। |
उत्पादन एवं लाभ
उन्नत प्रबंधन अपनाने पर ज़ायद मूंग से 10–15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। बाजार में दाल एवं अंकुरित अनाज के रूप में इसकी मांग अधिक रहती है, जिससे किसानों को अच्छा मूल्य मिलता है।
उड़द की उन्नत खेती:
जलवायु एवं उपयुक्तता
उड़द भी गर्म जलवायु की फसल है, किंतु यह मूंग की अपेक्षा थोड़ी अधिक सहनशील होती है। 25–35° से. तापमान इसके लिए अनुकूल है। हल्की दोमट मिट्टी में इसका उत्पादन बेहतर होता है।
उन्नत किस्में एवं बीजोपचार
शीघ्र पकने वाली एवं रोगरोधी किस्मों का चयन आवश्यक है। पीला मोजेक विषाणु रोग (YMV) से बचाव के लिए प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करना चाहिए। बीजोपचार राइजोबियम एवं पीएसबी (फॉस्फेट घुलनशील जीवाणु) से करने पर उत्पादन में वृद्धि होती है।
तालिका 3: ज़ायद मौसम के लिए उपयुक्त उड़द की उन्नत प्रजातियाँ:
| फसल | प्रजाति | पकने की अवधि (दिन) | प्रमुख विशेषताएँ | औसत उपज (क्विंटल/हेक्टेयर) |
| उड़द | T-9 | 70–75 | यह विशेष रूप से मध्य प्रदेश में खेती के लिए उपयुक्त है। यह एक बौनी किस्म है, जिसके पौधों की ऊंचाई आमतौर पर 27.00 सेमी से 49.00 सेमी के बीच होती है। इसमें मध्यम संख्या में शाखाएँ होती हैं। बीज मध्यम आकार के और हल्के काले रंग के होते हैं। | 10–12 |
| उड़द | Pant Urd 31 | 75–80 | खरीफ और वसंत दोनों मौसमों में खेती के लिए उपयुक्त। उच्च उपज देने वाली, पीले मोज़ेक वायरस (YMV) प्रतिरोधी, शीघ्र परिपक्वता वाली किस्म है, और विभिन्न क्षेत्रों में अनुकूलनशीलता शामिल हैं। यह बौनी किस्म है, प्रकाश के प्रति असंवेदनशील है और इसमें चमकदार, काले, मध्यम आकार के बीज होते हैं। | 15-16 |
| उड़द | LBG 752 | 75–80 | उड़द की खेती में एक प्रमुख बाधा, येलो मोज़ेक वायरस (वाईएमवी) के प्रति मध्यम रूप से सहनशील/प्रतिरोधी। इसके प्रमुख गुणों में शीघ्र विकास, मजबूत छत्र, फली की अधिक लंबाई (5.46 सेमी) और सभी मौसमों के लिए उपयुक्तताशामिल हैं। | 15–17 |
| उड़द | Uttara (IPU 94-1) | 80–85 | उच्च उपज देने वाली किस्म, मूंगबीन येलो मोज़ेक वायरस (MYMV), सर्कोस्पोरा लीफ स्पॉट, बैक्टीरियल लीफ स्पॉट (BLS) और एन्थ्रेक्नोज़ कवक के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी। | 12-14 |
| उड़द | Azad Urd 1 | 75-80 | येलो मोज़ेक वायरस (YMV) के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी और अन्य रोगों के प्रति सहनशील, मध्यम-मोटे, उच्च गुणवत्ता वाले बीज, बसंत (जैद) और प्रारंभिक खरीफ मौसम के लिए उपयुक्त, ट्रिप्टोफैन की मात्रा अधिक होती है, और यह उड़द की किस्मों में उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन स्रोत के रूप में जानी जाती है। | 10–12 |
बुवाई एवं दूरी
ज़ायद में उड़द की बुवाई मार्च-अप्रैल में की जाती है। बीज दर 18–20 किग्रा प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहती है। कतार दूरी 30–45 सेमी रखी जा सकती है।
उर्वरक एवं पोषण
उड़द के लिए 15–20 किग्रा नत्रजन एवं 40–50 किग्रा फॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। जिंक एवं सल्फर की कमी वाले क्षेत्रों में इनका प्रयोग लाभकारी सिद्ध होता है।
सिंचाई
उड़द में 3–4 सिंचाइयाँ पर्याप्त रहती हैं। जलभराव से बचाव आवश्यक है, क्योंकि अधिक नमी से जड़ सड़न रोग बढ़ सकता है।
कीट एवं रोग प्रबंधन
उड़द में पीला मोजेक रोग, पत्ती धब्बा तथा जड़ सड़न प्रमुख रोग हैं। सफेद मक्खी इनके प्रसार का प्रमुख वाहक है। समेकित रोग प्रबंधन, प्रतिरोधी किस्मों का चयन एवं संतुलित उर्वरक प्रयोग आवश्यक है।
तालिका 4: ज़ायद उड़द में प्रमुख कीट-रोग तथा उनका प्रबंधन:
| फसल | कीट / रोग पहचान / लक्षण | प्रबंधन उपाय |
| उड़द | सफेद मक्खी: सफेद मक्खी (बेमिसिया टैबासी) एक प्रमुख कीट है जो पत्तियों को पीला कर देती है, उन्हें ऊपर की ओर मोड़ देती है और पीला मोज़ेक वायरस फैलाती है। यह आमतौर पर उच्च तापमान की स्थिति में पत्तियों के नीचे दिखाई देती है। | पीले स्टिकी ट्रैप का प्रयोग करें। अधिक प्रकोप होने पर इमिडाक्लोप्रिड 17.8 SL @ 0.3 मि.ली. प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। |
| उड़द | माहू: ये छोटे, मुलायम शरीर वाले, चमकदार काले या गहरे हरे रंग के कीड़े होते हैं जो कोमल टहनियों, पत्तियों और फूलों पर अपना बसेरा बना लेते हैं। ये रस चूसकर नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे पत्तियां पीली पड़ जाती हैं, नीचे की ओर मुड़ जाती हैं, विकास रुक जाता है और पैदावार कम हो जाती है। | नीम तेल का छिड़काव करें। अधिक प्रकोप होने पर एसिटामिप्रिड 20 SP @ 0.25 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। |
| उड़द | फली छेदक: फूलों को नुकसान पहुंचाकर और फलियों में छेद करके विकसित हो रहे बीजों को खाकर 30-80% तक उपज हानि का कारण बनते हैं। | फेरोमोन ट्रैप लगाएँ (5-10 प्रति एकड़) तथा संक्रमित फलियों को नष्ट करें। अधिक प्रकोप होने पर क्लोरान्ट्रानिलिप्रोले 18.5 SC @ 0.3 मिली/लीटर पानी या स्पिनोसैड 45 SC @ 0.3 मि.ली. प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। |
| उड़द | पीला मोजेक रोग: पीला मोज़ेक वायरस (YMV) सफेद मक्खियों (बेमिसिया टैबासी) द्वारा फैलता है, यह एक विनाशकारी रोग है जो पत्तियों पर पीले धब्बे, बौना विकास और फली के कम निर्माण का कारण बनता है। | रोग प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करें, जल्दी बुवाई करें तथा वाहक कीट नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 SL @ 0.5 मिली/लीटर, एसिटामिप्रिड 20 SP @ 0.25 ग्राम/लीटर या थायोमेथोक्साम 25 WG @ 0.3 ग्राम प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें। |
| उड़द | जड़ सड़न रोग: यह अक्सर खराब जल निकासी वाली, भारी या जलभराव वाली मिट्टी में, विशेष रूप से खरीफ ऋतु के दौरान होता है, जिससे उपज में काफी नुकसान होता है। प्रारंभ में पत्तियों का पीला पड़ना, मुरझाना और झुकना, जो ऊपर से शुरू होता है इसके बाद मुख्य जड़ पर गहरे भूरे रंग के घाव दिखाई देते हैं, और जड़ें सड़ने और भंगुर हो जाती हैं। | बीजों को ट्राइकोडर्मा विरिडे (4 ग्राम/किग्रा) या स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस (10 ग्राम/किग्रा) जैसे जैविक नियंत्रण एजेंटों से उपचारित करें । वैकल्पिक रूप से, कार्बेन्डाजिम या थिरम जैसे फफूंदनाशकों का प्रयोग 2 ग्राम/किग्रा बीज की दर से करें। खेतों में जलभराव से बचने के लिए उचित जल निकासी सुनिश्चित करें। गैर-मेजबान फसलों (जैसे अनाज) के साथ फसल चक्र अपनाएं। संक्रमित पौधों के अवशेषों को हटाकर जला दें। जड़ सड़न और अन्य रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता दिखाने वाली प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें। |
उत्पादन एवं आर्थिक महत्व
उन्नत तकनीकों के प्रयोग से उड़द का उत्पादन 8–12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त किया जा सकता है। उड़द की दाल भारतीय आहार में अत्यंत लोकप्रिय है, विशेषकर दक्षिण भारत एवं उत्तर भारत में दाल, पापड़ एवं इडली-दोसा निर्माण में इसका उपयोग व्यापक है।
मूंग एवं उड़द का मृदा स्वास्थ्य में योगदान
दलहनी फसलें राइजोबियम जीवाणुओं की सहायता से वायुमंडलीय नत्रजन का स्थिरीकरण करती हैं, जिससे मृदा की उर्वरता बढ़ती है। ज़ायद में मूंग एवं उड़द की खेती करने से अगले खरीफ मौसम की फसलों को लाभ मिलता है। इसके अतिरिक्त इनकी जड़ें मृदा संरचना में सुधार करती हैं तथा कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाती हैं।
समेकित दृष्टिकोण एवं निष्कर्ष:
ज़ायद ऋतु की उन्नत खेती सीमित अवधि में अधिक उत्पादन प्राप्त करने की प्रभावी रणनीति है। विशेष रूप से मूंग एवं उड़द जैसी दलहनी फसलें किसानों को अतिरिक्त आय प्रदान करने के साथ-साथ पोषण सुरक्षा एवं मृदा स्वास्थ्य सुधार में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। उन्नत किस्मों का चयन, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, सूक्ष्म सिंचाई, समेकित कीट-रोग प्रबंधन तथा समय पर कटाई—ये सभी तत्व सफल उत्पादन के आधार हैं।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, जब कृषि भूमि सीमित और जनसंख्या बढ़ रही है, ज़ायद में मूंग एवं उड़द की उन्नत खेती कृषि प्रणाली की स्थिरता, आय वृद्धि तथा पोषण सुदृढ़ीकरण का महत्वपूर्ण साधन सिद्ध हो रही है। वैज्ञानिक तकनीकों के समुचित अनुप्रयोग से इन फसलों की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है, जिससे किसान आत्मनिर्भरता की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं।
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