पश्चिमी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन: शिवराज सिंह चौहान ने जयपुर से केंद्र-राज्य कृषि सुधारों का रोडमैप प्रस्तुत किया
08 अप्रैल 2026, जयपुर: पश्चिमी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन: शिवराज सिंह चौहान ने जयपुर से केंद्र-राज्य कृषि सुधारों का रोडमैप प्रस्तुत किया – भारत सरकार ने जयपुर में आयोजित पश्चिमी क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन के माध्यम से कृषि क्षेत्र के लिए एक नया कार्य ढांचा प्रस्तुत किया, जिसमें राज्यों और केंद्र के बीच समन्वय को मजबूत करने पर जोर दिया गया। इस सम्मेलन में क्षेत्र-विशिष्ट कृषि रणनीतियों, किसानों की आय वृद्धि, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा डिजिटल कृषि को बढ़ावा देने जैसे प्रमुख मुद्दों पर विस्तृत चर्चा की गई।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में आयोजित इस सम्मेलन में राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गोवा के कृषि मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक और प्रगतिशील किसान शामिल हुए। यह पहल पारंपरिक रबी-खरीफ बैठकों से आगे बढ़ते हुए कृषि-जलवायु क्षेत्रों के आधार पर गहन विचार-विमर्श की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव मानी जा रही है।
सम्मेलन में यह स्पष्ट किया गया कि यह केवल औपचारिक बैठक नहीं है, बल्कि पूरे पश्चिमी क्षेत्र की कृषि चुनौतियों और संभावनाओं पर केंद्रित एक व्यापक विमर्श है, जिसका उद्देश्य राज्यों के लिए ठोस कार्ययोजना और आगे की दिशा तय करना है।
कृषि क्षेत्र के लिए तीन प्रमुख लक्ष्यों पर जोर दिया गया—देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना, किसानों की आय में वृद्धि करना और पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ बनाना। सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि देश में गेहूं और चावल का पर्याप्त भंडार मौजूद है, लेकिन दलहन और तिलहन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना आवश्यक है, ताकि आयात पर निर्भरता कम की जा सके।
सम्मेलन में डिजिटल कृषि और किसान आईडी को भविष्य की कृषि व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बताया गया। किसान आईडी के माध्यम से किसानों को बैंक ऋण, सरकारी योजनाओं का लाभ और अन्य सुविधाएं तेजी और पारदर्शिता के साथ उपलब्ध कराई जा सकेंगी। कई राज्यों में इस प्रणाली के माध्यम से सीधे लाभ हस्तांतरण के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। आगे चलकर उर्वरक वितरण को भी किसान आईडी से जोड़ने की योजना है, जिससे सब्सिडी के दुरुपयोग को रोका जा सके।
न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और खरीद व्यवस्था पर भी चर्चा की गई। दलहन और तिलहन की खरीद प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान के अंतर्गत की जा रही है, जबकि गेहूं और चावल की खरीद खाद्य विभाग द्वारा संचालित होती है। राज्यों को समयबद्ध खरीद सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है। जहां प्रत्यक्ष खरीद संभव नहीं है, वहां मूल्य अंतर भुगतान जैसी व्यवस्था के माध्यम से किसानों को राहत प्रदान की जा सकती है।
इसके अलावा, आलू, प्याज और टमाटर जैसी फसलों में मूल्य गिरावट की स्थिति से निपटने के लिए बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस) की उपयोगिता पर भी प्रकाश डाला गया। इस योजना के तहत बाजार मूल्य और निर्धारित मूल्य के अंतर की भरपाई सीधे किसानों को की जा सकती है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों की भागीदारी होती है।
राज्यों को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार कृषि रोडमैप तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। इस प्रक्रिया में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषदद्वारा वैज्ञानिक सहयोग और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया जाएगा। विभिन्न राज्यों में वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की टीमें भेजी जाएंगी, जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कृषि सुधारों को गति देंगी।
नीतियों में लचीलापन लाने पर भी जोर दिया गया, ताकि राज्य अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार योजनाओं का चयन कर सकें। “पर ड्रॉप, मोर क्रॉप” जैसी योजनाओं के तहत सूक्ष्म सिंचाई को राज्यों की जरूरतों के अनुरूप लागू किया जा सकता है। साथ ही, राज्यों को वित्तीय वर्ष की शुरुआत से ही बजट का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करने की सलाह दी गई, ताकि योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी न हो।
प्राकृतिक आपदाओं और मौसम असंतुलन से होने वाले नुकसान के संदर्भ में फसल हानि का सटीक आकलन और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया गया। केंद्र सरकार ने इस दिशा में पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया, जबकि जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन में राज्यों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया।
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