राष्ट्रीय कृषि समाचार (National Agriculture News)

सोयाबीन से खेत छीनती मक्का की फसल, बढ़ सकती है भारत में यूरिया की मांग

13 मार्च 2026, नई दिल्ली: सोयाबीन से खेत छीनती मक्का की फसल, बढ़ सकती है भारत में यूरिया की मांग – मक्का एक यूरिया-आधारित (नाइट्रोजन-गहन) फसल मानी जाती है। ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव ऊर्जा और उर्वरक आपूर्ति को प्रभावित कर रहे हैं, मक्का का बढ़ता रकबा भविष्य में उर्वरक उपलब्धता पर दबाव बना सकता है।

यूरिया का उत्पादन प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है और वैश्विक संघर्षों के कारण गैस आपूर्ति और शिपिंग मार्गों में अनिश्चितता बनी रहती है। फिलहाल भारत के पास उर्वरक का पर्याप्त भंडार है, लेकिन यदि मक्का जैसी अधिक नाइट्रोजन मांग वाली फसलों का रकबा तेजी से बढ़ता है, तो आने वाले मौसमों में यूरिया की मांग बढ़ सकती है।

भारत में कई क्षेत्रों में अब मक्का और सोयाबीन के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। दोनों ही फसलें मुख्यतः खरीफ मौसम में बोई जाती हैं, इसलिए किसान अक्सर इन दोनों में से किसी एक को चुनते हैं। पिछले कुछ वर्षों में मक्का को बढ़त मिलने लगा है क्योंकि इसकी मांग पोल्ट्री फीड उद्योग, स्टार्च उद्योग और एथेनॉल उत्पादन में तेजी से बढ़ रही है। दूसरी ओर कई बार सोयाबीन के भाव अपेक्षाकृत कम रहने से किसानों का रुझान मक्का की ओर बढ़ा है।

उत्पादकता भी इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण कारण है। सामान्य परिस्थितियों में मक्का की प्रति हेक्टेयर पैदावार सोयाबीन से अधिक होती है। अच्छी वर्षा या सिंचाई की उपलब्धता होने पर किसानों को मक्का से बेहतर आय मिलने की संभावना रहती है। यही वजह है कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों के कई जिलों में किसान पारंपरिक सोयाबीन क्षेत्र में भी मक्का लगाने लगे हैं।

फसल आंकड़े

अगर फसली आंकड़ों पर नजर डालें तो दोनों फसलों के बीच प्रतिस्पर्धा स्पष्ट दिखाई देती है। 2024-25 में भारत में मक्का का रकबा 120.91 लाख हेक्टेयर रहा और उत्पादन करीब 43 मिलियन टन के आसपास अनुमानित है। वहीं सोयाबीन का रकबा लगभग 129.52 लाख हेक्टेयर रहा, जो मुख्य रूप से मध्य भारत के राज्यों में केंद्रित है। यदि ऐतिहासिक आंकड़ों पर नजर डालें तो 2018-19 में भारत में मक्का की खेती लगभग 90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई थी।

सोयाबीन और मक्का के रकबे की तुलना लाख हेक्टेयर में (2021-2025)

फसल2021-222022-232023-242024-252025-26
सोयाबीन121.47130.84132.55129.52123.73
मक्का99.58107.44112.41120.91128.35

नोट: वर्ष 2025-26 के लिए ग्रीष्मकालीन मक्का (समर मक्का) का डेटा शामिल नहीं है।

हालांकि कुल क्षेत्रफल के मामले में सोयाबीन अभी भी थोड़ा आगे है, लेकिन कई जिलों में बाजार संकेतों के आधार पर किसान इन दोनों फसलों के बीच बदलाव कर रहे हैं।

पोषण की जरूरत में बड़ा अंतर

मक्का और सोयाबीन के बीच सबसे बड़ा अंतर उनकी नाइट्रोजन आवश्यकता में है।

सोयाबीन एक दलहनी फसल है और इसकी जड़ों में मौजूद राइजोबियम बैक्टीरिया की मदद से यह वायुमंडल से नाइट्रोजन को स्थिर (फिक्स) कर लेती है। इस कारण सोयाबीन को सामान्यतः केवल शुरुआती वृद्धि के लिए थोड़ी मात्रा में नाइट्रोजन की जरूरत होती है, जो लगभग 20–30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होती है।

इसके विपरीत मक्का में नाइट्रोजन को स्थिर करने की कोई प्राकृतिक क्षमता नहीं होती। यह पूरी तरह मिट्टी और उर्वरकों से मिलने वाली पोषक तत्वों पर निर्भर रहती है। इसलिए मक्का को उच्च नाइट्रोजन मांग वाली फसल माना जाता है।

अच्छी पैदावार के लिए मक्का को आमतौर पर 100–120 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है।

यूरिया की खपत क्यों बढ़ती है

क्योंकि यूरिया में लगभग 46 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है, इसलिए इतनी नाइट्रोजन उपलब्ध कराने के लिए लगभग 250–260 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता पड़ती है।

सरल शब्दों में कहा जाए तो मक्का की खेती में सोयाबीन की तुलना में चार से पांच गुना अधिक नाइट्रोजन उर्वरक की जरूरत पड़ सकती है।

यही कारण है कि यदि बड़ी मात्रा में खेती का क्षेत्र सोयाबीन से मक्का की ओर शिफ्ट होता है, तो देश में कुल यूरिया की मांग भी तेजी से बढ़ सकती है।

वैश्विक स्थिति क्यों महत्वपूर्ण है

नाइट्रोजन उर्वरकों का उत्पादन सीधे प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है, क्योंकि अमोनिया—जो यूरिया का मुख्य आधार है—प्राकृतिक गैस से तैयार किया जाता है। वैश्विक संघर्ष और भू-राजनीतिक तनाव अक्सर गैस आपूर्ति और ऊर्जा कीमतों को प्रभावित करते हैं, जिससे उर्वरक उत्पादन और आपूर्ति पर असर पड़ सकता है।

भारत ने उर्वरक उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे कि उर्वरक संयंत्रों को गैस आपूर्ति को प्राथमिकता देना और पर्याप्त भंडार बनाए रखना। फिर भी भारत में उर्वरक की मांग लगातार बनी रहती है क्योंकि यहां खरीफ, रबी और जायद—तीन प्रमुख कृषि मौसम हैं, साथ ही फल-सब्जियों की साल भर खेती होती है।

संतुलन की जरूरत

सोयाबीन केवल एक तिलहनी फसल ही नहीं है, बल्कि यह मिट्टी की उर्वरता सुधारने में भी मदद करती है क्योंकि यह मिट्टी में नाइट्रोजन जोड़ती है। इसके विपरीत मक्का आर्थिक रूप से आकर्षक होने के बावजूद अधिक उर्वरक पर निर्भर रहती है।

इसलिए यदि आने वाले वर्षों में खरीफ मौसम में मक्का का रकबा तेजी से बढ़ता है, तो यह केवल फसली पैटर्न में बदलाव नहीं होगा, बल्कि इससे भारत की यूरिया मांग भी धीरे-धीरे बढ़ सकती है।

कृषि नीति निर्माताओं और वैज्ञानिकों के लिए चुनौती यही होगी कि वे फसलों की आर्थिक संभावनाओं और पोषक तत्व प्रबंधन के बीच संतुलन बनाए रखें, ताकि बदलते फसली रुझान भविष्य में उर्वरक आपूर्ति पर अतिरिक्त दबाव न डालें।

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