भारत-अमेरिका व्यापार समझौता कृषि के लिए अवसर या चुनौती?
लेखक: प्रवेश शर्मा, चेयरमैन, स्टीयरिंग कमेटी, नेशनल एसोसिएशन फॉर फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन (NAFPO)। वे स्मॉल फार्मर्स एग्री-बिजनेस कंसोर्टियम (SFAC) के पूर्व मैनेजिंग डायरेक्टर और मध्य प्रदेश के पूर्व एग्रीकल्चर सेक्रेटरी रह चुके हैं।
03 मार्च 2026, नई दिल्ली: भारत-अमेरिका व्यापार समझौता कृषि के लिए अवसर या चुनौती? – भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच अंतिम रूप ले रहे व्यापार समझौते के ढांचे को लेकर देश में तीखी बहस जारी है। हालांकि इस समझौते के अंतिम विवरण अभी तय और हस्ताक्षरित होने बाकी हैं, लेकिन इसकी व्यापक रूपरेखा सार्वजनिक क्षेत्र में आ चुकी है और उस पर काफी चर्चा व विश्लेषण हो रहा है। इस लेख में हम इस व्यापार समझौते के उन पहलुओं पर विचार कर रहे हैं, जिनका भारत की कृषि पर संभावित प्रभाव पड़ सकता है।

इसके संभावित असर का आकलन करते समय यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि हमारे पास अभी तक इस ढांचा समझौते का कोई आधिकारिक या अंतिम दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, जिससे कृषि से जुड़े प्रावधानों की सटीक जानकारी मिल सके। हमारी समझ मुख्यतः मीडिया रिपोर्टों और विशेषज्ञ टिप्पणियों पर आधारित है। स्वाभाविक है कि ये रिपोर्टें राजनीतिक दृष्टिकोणों या संस्थागत प्राथमिकताओं से प्रभावित हो सकती हैं। हम इन संभावित पूर्वाग्रहों से परे रहते हुए सबसे संभावित स्थितियों को समझने का प्रयास कर रहे हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि अंतिम समझौता सामने आने के बाद इन आकलनों की पुनः समीक्षा की आवश्यकता पड़ सकती है।
किसी भी नीति निर्णय की तरह, भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के परिणाम पूरी तरह सकारात्मक या पूरी तरह नकारात्मक नहीं होंगे। यह मानकर चलना चाहिए कि भारत के वार्ताकारों और नीति-निर्माताओं ने देशहित में सर्वश्रेष्ठ विकल्प सुनिश्चित करने का प्रयास किया होगा। अब राज्य सरकारों, कृषि-व्यवसाय कंपनियों, किसान संगठनों, व्यापारियों, खुदरा विक्रेताओं और अन्य हितधारकों की जिम्मेदारी है कि वे इस बदलते परिदृश्य के अनुरूप स्वयं को तैयार करें। यह लेख कृषि पारितंत्र से जुड़े सभी पक्षों को इस समझौते के संभावित प्रभावों को समझने और उसके अनुसार तैयारी करने में मदद करने का एक प्रयास है।
सबसे पहले उन संभावनाओं पर विचार करें, जो अनुकूल परिणाम दे सकती हैं।
1. फसलों से उच्च मूल्य कृषि की ओर बदलाव
हालांकि अनाज (ज्वार को छोड़कर) को इस समझौते के दायरे से बाहर रखा गया है, फिर भी यह संभावना है कि पशु चारे के लिए डीडीजीएस (डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स) और सोयाबीन तेल के आयात से घरेलू बाजार में मक्का और सोयाबीन की मांग कम हो सकती है। इससे प्रभावित किसान बागवानी, डेयरी, मत्स्य पालन, पशुपालन और पोल्ट्री जैसे गैर-फसल क्षेत्रों की ओर रुख कर सकते हैं, जिन्हें प्रायः ‘उच्च मूल्य कृषि’ कहा जाता है।
मध्यम अवधि में यह परिवर्तन सकारात्मक साबित हो सकता है, क्योंकि उच्च मूल्य कृषि उत्पादों की मांग अनाज और तिलहनों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रही है। हालांकि इस बदलाव के दौरान किसानों को कठिन संक्रमण काल का सामना करना पड़ सकता है। यदि प्रसार सेवाएं, आधुनिक तकनीक, वित्तीय सहायता, अवसंरचना और नए विपणन तंत्र समय पर उपलब्ध नहीं कराए गए, तो यह प्रक्रिया किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
2. उच्च मूल्य उत्पादों के निर्यात में वृद्धि
उत्पादन बढ़ने के साथ बागवानी उत्पादों विशेषकर फल, सब्जियां और मसालों के निर्यात में वृद्धि की संभावना बन सकती है। लेकिन इसके लिए किसानों को पूर्व और पश्च-फसल प्रबंधन में गुणवत्ता मानकों का प्रशिक्षण देना आवश्यक होगा। साथ ही पैक हाउस, कोल्ड स्टोरेज और अन्य भंडारण सुविधाएं खेतों के निकट उपलब्ध करानी होंगी।
3. आंतरिक सुधारों की दिशा में दबाव
दीर्घकाल में यह व्यापार समझौता कृषि क्षेत्र में संरचनात्मक सुधारों की मांग को तेज कर सकता है। आयात से उत्पन्न प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए कृषि विपणन प्रणाली विशेषकर अनाज, तिलहन और दलहन जैसी प्रमुख फसलों के लिए—में सुधार, अनुबंध खेती की स्पष्ट व्यवस्था, तथा भंडारण और आवागमन से जुड़े प्रतिबंधों की समीक्षा जैसे कदम आवश्यक हो सकते हैं।
जैव प्रौद्योगिकी और जीएम फसलों पर नई सोच
एक और संभावित सकारात्मक परिणाम यह हो सकता है कि आनुवंशिक रूप से परिवर्तित (जीएम) बीजों और जैव प्रौद्योगिकी के लिए विज्ञान-आधारित, पारदर्शी और भविष्य उन्मुख नियामक व्यवस्था विकसित करने की दिशा में अनुकूल वातावरण बने। कुछ विशेषज्ञों का मत है कि यदि जीएम आधारित फसलों से बने डीडीजीएस और सोयाबीन तेल का आयात हो रहा है, तो भारतीय किसानों को भी उपयुक्त सुरक्षा उपायों के साथ इन तकनीकों तक पहुंच दी जानी चाहिए। इसके लिए नियामक और तकनीकी क्षमता को मजबूत करना आवश्यक होगा। जैसे-जैसे आयात का प्रभाव घरेलू बाजार में स्पष्ट होगा, यह बहस और तेज हो सकती है।
संभावित चुनौतियां और जोखिम
अब उन संभावित नकारात्मक पहलुओं पर विचार करें, जो सामने आ सकते हैं।
1. रकबे में कमी और खाद्य सुरक्षा की चिंता
अल्पावधि में मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों के रकबे में कमी देखने को मिल सकती है। डीडीजीएस और सोयाबीन तेल के आयात से पैदा हुई अनिश्चितता इसका कारण बन सकती है। संभव है कि एक-दो वर्षों में स्थिति संतुलित हो जाए। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण चिंता यह होगी कि गेहूं और धान जैसी मुख्य खाद्य फसलों के रकबे में कमी न आए, क्योंकि यही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा प्रणाली की आधारशिला हैं। आयात के स्वरूप पर लगातार निगरानी रखना आवश्यक होगा।
2. डेयरी, पोल्ट्री और दलहन पर संभावित प्रभाव
यदि भविष्य में डेयरी और पोल्ट्री उत्पाद भी समझौते में शामिल किए जाते हैं, तो उच्च मूल्य कृषि की ओर हो रहा विविधीकरण प्रभावित हो सकता है। इसी तरह यदि दलहन के नियमित आयात की अनुमति दी जाती है, तो आत्मनिर्भरता का लक्ष्य कमजोर पड़ सकता है। भारत पहले से ही दलहन का आयात करता है, लेकिन यह एक सोच-समझकर लिया गया निर्णय होता है और समयबद्ध तरीके से किया जाता है। व्यापार समझौते के तहत नियमित आयात इस नीति को प्रभावित कर सकता है।
3, सामाजिक प्रभाव और ग्रामीण पलायन
बड़े पैमाने पर कृषि आयात ग्रामीण युवाओं को कृषि से दूर कर सकते हैं। पहले से ही कई क्षेत्रों में कृषि कम आय देती है। यदि प्रतिस्पर्धा और बढ़ी, तो युवा बेहतर अवसरों की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर सकते हैं। इससे कौशल उन्नयन और स्थानांतरण की लागत बढ़ेगी, जिससे ग्रामीण ऋणग्रस्तता भी बढ़ सकती है।
4. राजकोषीय दबाव
बढ़ते आयात से प्रभावित किसानों को राहत देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को सब्सिडी या प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता बढ़ानी पड़ सकती है। इससे राजकोष पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा और विकासात्मक पूंजी निवेश के लिए उपलब्ध संसाधन सीमित हो सकते हैं।
जब तक अंतिम समझौते का पाठ सामने नहीं आता, तब तक ठोस निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। फिर भी उपलब्ध संकेतों से यह स्पष्ट है कि भारतीय कृषि एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। यह समझौता उच्च मूल्य निर्यात, तकनीकी आधुनिकीकरण और नीतिगत सुधार के नए अवसर प्रदान कर सकता है, लेकिन साथ ही खाद्य फसलों और ग्रामीण आजीविकाओं के लिए चुनौतियां भी पैदा कर सकता है।
अंततः परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकारें, बाजार और किसान कितनी तेजी और समझदारी से परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालते हैं। यदि तैयारी मजबूत रही, संस्थागत क्षमता चुस्त रही और नीतियां साक्ष्य-आधारित रहीं, तो यह समझौता परिवर्तन का माध्यम बन सकता है। अन्यथा, यह कृषि क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक दबाव का कारण भी बन सकता है।
नाफपो (NAFPO ) के बारे में
नेशनल एसोसिएशन फॉर फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन (NAFPO) एक गैर-लाभकारी, बहु-हितधारक राष्ट्रीय मंच है, जो किसान समृद्धि के लिए सशक्त किसान उत्पादक संगठनों के निर्माण के उद्देश्य से कार्य करता है। यह डिजिटल उपकरणों, क्षमता निर्माण, नीतिगत संवाद और बाजार संपर्क के माध्यम से एफपीओ पारितंत्र को मजबूत बनाता है। नाफपो की परिकल्पना ऐसे सशक्त किसान-नेतृत्व वाले संस्थानों की है, जो लघुधारक किसानों को वित्त, तकनीक, बाजार और सुशासन तक पहुंच दिलाकर समावेशी और सतत कृषि परिवर्तन को गति दें।
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