गन्ना किसानों की शिकायतों पर केंद्र का बड़ा फैसला, बनेगी उच्चस्तरीय समिति
15 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली: गन्ना किसानों की शिकायतों पर केंद्र का बड़ा फैसला, बनेगी उच्चस्तरीय समिति – कर्नाटक और महाराष्ट्र के गन्ना किसानों की शिकायतों के बाद केंद्र सरकार ने एक उच्चस्तरीय संयुक्त समिति बनाने का फैसला किया है। यह जानकारी केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और उपभोक्ता मामले, खाद्य व सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रह्लाद जोशी ने एक बैठक के बाद साझा की। यह बैठक कर्नाटक और महाराष्ट्र से आए गन्ना किसानों के प्रतिनिधिमंडलों के साथ हुई, जिसमें कर्नाटक सरकार के मंत्री और केंद्र व राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।
समिति चीनी मिलों की ओर से बताई जाने वाली रिकवरी यानी चीनी निकलने की दर में गड़बड़ी, वजन में कटौती, बर्बादी, प्रयोगशाला जांच के तरीकों, फसल बीमा, गन्ना कटाई के समय और रिकवरी मापने की आधुनिक तकनीकों जैसे मुद्दों की जांच करेगी। कृषि मंत्रालय के बयान के मुताबिक किसानों की यह शिकायत गंभीर है कि कई मिलें असल रिकवरी को कम करके दिखा देती हैं, जिससे उन्हें वाजिब भुगतान नहीं मिल पाता।
रिकवरी में गड़बड़ी की शिकायत
मंत्री चौहान ने कहा कि अस्थायी या आधे-अधूरे समाधान की जगह एक पारदर्शी और वैज्ञानिक व्यवस्था बनाना जरूरी हो गया था। उन्होंने रिकवरी के आंकड़ों में गड़बड़ी, वजन में कटौती और मिलों की ओर से असल रिकवरी छिपाए जाने के आरोपों को गंभीर मामला बताया। दूसरी ओर मंत्री जोशी ने किसानों को गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य यानी एफआरपी तय करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया और उत्पादन लागत के आकलन के तरीके के बारे में जानकारी दी।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब कर्नाटक के कई जिलों के गन्ना किसान पिछले कुछ हफ्तों से मूल्य को लेकर सड़कों पर उतरे हुए थे। 29 सितंबर को हुब्बल्ली में हजारों किसानों ने प्रदर्शन करते हुए वर्ष 2026-27 के लिए गन्ने का भाव 5,500 रुपये प्रति टन तय करने की मांग की थी।
किसान संगठनों ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने और चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य को बढ़ाने की भी मांग रखी थी। मौजूदा समय में गन्ने का एफआरपी 365 रुपये प्रति क्विंटल है, जिसे मई 2026 में बढ़ाया गया था।
एक सप्ताह में बनेगी समिति
मंत्रालय के मुताबिक यह समिति एक सप्ताह के भीतर गठित कर दी जाएगी। इसमें केंद्र सरकार, कर्नाटक व महाराष्ट्र सरकार के प्रतिनिधियों के साथ किसान संगठन, चीनी मिल प्रबंधन और वैज्ञानिक विशेषज्ञ भी शामिल होंगे।
समिति तय समय सीमा के भीतर व्यावहारिक सुझाव सौंपेगी। इसके बाद समाधान को दो हिस्सों में बांटा जाएगा- एक, जिन्हें तुरंत प्रशासनिक स्तर पर लागू किया जा सकता है, और दूसरा, जिनके लिए नीतिगत व तकनीकी बदलाव की जरूरत होगी।
देश में गन्ना किसानों के लिए रिकवरी दर का सीधा असर उनकी जेब पर पड़ता है, क्योंकि कई राज्यों में गन्ने का भुगतान रिकवरी के आधार पर ही तय होता है। किसान संगठन लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि मिलों में रिकवरी मापने की प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाया जाए, ताकि असल आंकड़े किसानों के सामने भी आ सकें।
कर्नाटक में गन्ना किसानों का यह आंदोलन सितंबर के आखिरी हफ्ते से चल रहा था। किसान संगठनों ने हुब्बल्ली में मंत्री जोशी के आवास और कार्यालय तक मार्च निकालने का ऐलान किया था, जिसके बाद प्रशासन और किसान नेताओं के बीच कई दौर की बातचीत हुई।
मंत्री जोशी ने पहले ही सोशल मीडिया पर किसान प्रतिनिधियों को दिल्ली आकर बातचीत करने का न्योता दिया था और भरोसा दिया था कि उनकी बात को पूरे सम्मान के साथ सुना जाएगा। केंद्र सरकार का कहना है कि एफआरपी तय करने का फैसला अकेले केंद्र के स्तर पर नहीं होता, बल्कि इसमें मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया और राज्य सरकारों, खासकर गन्ना आयुक्त कार्यालय की सिफारिशें भी शामिल होती हैं।
गन्ना देश की सबसे बड़ी नकदी फसलों में शामिल है और उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में लाखों किसान परिवार इस पर निर्भर हैं। ऐसे में रिकवरी और भुगतान से जुड़ी शिकायतों का हल निकालना किसानों के भरोसे के साथ-साथ चीनी उद्योग की साख के लिए भी अहम माना जा रहा है। कृषि मंत्रालय का कहना है कि समिति की सिफारिशों को आने वाले पेराई सत्र से पहले लागू करने की कोशिश होगी, ताकि किसानों को तुरंत राहत मिल सके।
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