कम्पनी समाचार (Industry News)

जैन इरिगेशन करेगा केले की दो नई किस्मों के टिश्यू कल्चर पौधों का उत्पादन

समझौता ज्ञापनपर हुए हस्ताक्षर

23 मार्च 2026, जलगांव: जैन इरिगेशन करेगा केले की दो नई किस्मों के टिश्यू कल्चर पौधों का उत्पादन – केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की उपस्थिति में जलगांव स्थित जैन हिल्स पर आईसीएआर–राष्ट्रीय केला अनुसंधान केंद्र (एनआरसीबी), तिरुचिरापल्ली और जैन इरिगेशन सिस्टम्स लिमिटेड, जलगांव के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते के तहत केले की दो नई किस्मों—‘कावेरी वामन’ और ‘कावेरी पुवन’—के टिश्यू कल्चर पौधों का उत्पादन किया जाएगा।

समझौते पर आईसीएआर–एनआरसीबी की ओर से निदेशक डॉ. आर. सेल्वराजन तथा जैन इरिगेशन की टिश्यू कल्चर इकाई की ओर से डॉ. अनिल पाटिल और डॉ. के. बी. पाटिल ने हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर जैन इरिगेशन के अध्यक्ष श्री अशोक जैन, उपाध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक श्री अनिल जैन, सह-प्रबंध निदेशक श्री अजीत जैन और श्री अतुल जैन उपस्थित रहे।

यह एमओयू कवयित्री बहिणाबाई चौधरी उत्तर महाराष्ट्र विश्वविद्यालय में आयोजित केला संगोष्ठी के दौरान आदान-प्रदान किया गया। कार्यक्रम में केंद्रीय खेल राज्य मंत्री श्रीमती रक्षा खडसे, महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री श्री गिरीश महाजन, सांसद श्रीमती स्मिता वाघ, केंद्रीय कृषि मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री प्रियरंजन दास, बागवानी निदेशक श्री अंकुश माने, आईसीएआर के एडीजी डॉ. वी. बी. पटेल, जिलाधिकारी श्री रोहन घुगे सहित कई गणमान्य उपस्थित थे।

इस समझौते के तहत जैन इरिगेशन अब जलगांव में ‘कावेरी वामन’ और ‘कावेरी पुवन’ किस्मों के टिश्यू कल्चर पौधे तैयार कर किसानों को उपलब्ध कराएगी।

किस्मों की प्रमुख विशेषताएं

कावेरी वामन:

यह किस्म ‘ग्रैंड नैन’ से भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC), मुंबई में विकसित की गई है और एएए (AAA) जीनोमिक समूह की है। यह अच्छी जल निकासी वाली समतल भूमि में बेहतर वृद्धि करती है। पौधा बौने प्रकार का होता है, जिसकी ऊंचाई 150–160 सेमी तक होती है तथा तने पर काले-भूरे धब्बे दिखाई देते हैं। इसका आकार बेलनाकार होता है और एक घड़ का वजन 18–25 किलोग्राम तक होता है। पकने पर फल पीले हो जाते हैं, गूदा क्रीम रंग का और स्वाद में मीठा होता है। यह किस्म अल्ट्रा हाई डेंसिटी पद्धति के लिए उपयुक्त है और पौधों को सहारा देने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे लगभग 10% लागत की बचत होती है। यह तेज हवा और तटीय क्षेत्रों के लिए भी उपयुक्त है। फसल 11–12 महीनों में तैयार हो जाती है और वर्षभर रोपण किया जा सकता है। औसत उत्पादन 55–60 टन प्रति हेक्टेयर है।

कावेरी पुवन:

यह किस्म लोकप्रिय ‘पुवन’ से विकसित की गई है, जिसे एनआरसीबी, तिरुचिरापल्ली ने लगभग 15 वर्षों के अनुसंधान के बाद तैयार किया है। इसकी विशेषता यह है कि यह विषाणुजन्य रोगों तथा फ्यूसेरियम विल्ट (मर रोग) के टीआर-1 और टीआर-4 जैसे खतरनाक स्ट्रेनों के प्रति प्रतिरोधी है। यह स्थानीय पुवन किस्म की तुलना में लगभग 20% अधिक उत्पादन देती है। साथ ही यह खारी एवं लवणीय मिट्टी में भी अच्छी उपज देने में सक्षम है।

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