शिमला मिर्च को कीट- रोग से बचाएं

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समेकित नाशीजीव प्रबंधन

  • अनुप्रिया , प्रहलाद, डॉ. रजनी सिंह सासोड़े
  • प्रथम कुमार सिंह, डॉ. प्रद्युम्न सिंह,
    राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय, ग्वालियर

 

20 सितम्बर 2022, शिमला मिर्च को कीट- रोग से बचाएं – हमारे देश में उगाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की सब्जियों में मिर्च व शिमला मिर्च की फसल का प्रमुख स्थान है। लेकिन मिर्च व शिमला मिर्च का उत्पादकता स्तर काफी कम है। इनके उत्पादन में कमी का एक प्रमुख कारण फसलों पर कीट, रोग तथा सूत्रकृमियों का अधिक प्रकोप होना है। इस लेख में मिर्च व शिमला मिर्च की फसल में समेकित नाशीजीव प्रबंधन कैसे करें का विस्तृत उल्लेख है।

प्रमुख कीट

थ्रिप्स

थ्रिप्स छोटे तथा पतले कीट होते हैं और नर्सरी के साथ मुख्य खेत में भी दिखाई देते हैं व अपने पूरे जीवनभर वे मिर्च व शिमला मिर्च फसल को प्रभावित करते हैं। वयस्क तथा निम्फ दोनों फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। पत्तियों के ऊतकों के चिथड़े कर देते हैं और रस को चूसते हैं। इनके द्वारा नर्म प्ररोहों, कलियों तथा फूलों पर आक्रमण किया जाता है जिसके परिणामस्वरूप वे मुड़ जाते हैं व विरूपित हो जाते हैं, पत्तियों का ऊपरी हिस्सा भी मुड़ जाता है। ग्रीष्म मौसम में नाशीजीवों का संक्रमण बढ़ जाता है।

चेपा

ये आमतौर पर शुष्क, बादलों वाले ठण्डे तथा आर्द्र मौसम की स्थितियों में प्रकट होते हैं, जबकि भारी वर्षा चेपा की कालोनियों को धो डालती है। ये फरवरी से अप्रैल के दौरान तेजी से बढ़ते हैं। ये मिर्च व शिमला मिर्च के नर्म प्ररोहों तथा पत्तियों की निचली सतह पर दिखाई देते हैं। रस को चूसते हैं तथा पौधों की वृद्धि को कम करते हैं। ये मीठा पदार्थ छोड़ते हैं, जो कि चींटियों को आकर्षित करता है, जिससे काली फंफूद विकसित हो जाती है।

तम्बाकू की इल्ली

तम्बाकू की इल्ली का वयस्क भूरे रंग का होता है। दूसरे और तीसरे इनस्टार के लार्वे कैलिक्स के पास छेद बनाकर मिर्च व शिमला मिर्च की फलियों में प्रवेश करते हैं तथा मिर्च के बीज से अपना भोजन प्राप्त करते हैं। प्रभावित फलियां गिर जाती हैं या सूखने पर सफेद रंग की हो जाती हैं। ये आदत से रात्रिचर होते हैं, लेकिन इन्हें दिन के समय भी देखा जा सकता है।
फल वेधक- यह कीट वर्षा काल के बाद वाले मौसम में (अक्टूबर से मार्च) बहुत सक्रिय होता है, जो कि मिर्च व शिमला मिर्च की फसल की पुनरुत्पादक स्थिति भी है। लार्वा फलों का वेधन कर उन्हें क्षतिग्रस्त करता है तथा फलियों के भीतरी हिस्सों से अपना भोजन प्राप्त करता है। शिमला मिर्च में अप्रैल से जून के समय में फलों को नुकसान पहुंचाता है।

प्रमुख रोग

डैम्पिंग आफ

यह रोग खराब निकासी वाली तथा आर्द्रता वाली भारी मिट्टी को सबसे अधिक क्षतिग्रस्त करता है। बीज सड़ सकता है व मिट्टी में से निकलने से पहले ही पौधे मर सकते हैं। नए पौध या मृदुलण और कालर क्षेत्र में ऊतकों के नष्ट होने के कारण अलग-अलग खण्डों में मर जाते हैं।

पर्ण चित्ती

इसकी मिर्च व शिमला मिर्च पत्तियों पर विक्षति भूरी तथा वृत्ताकार होती है। जिसके बीच में छोटे से बड़े हल्के धूसर रंग के तथा गहरे भूरे किनारे होते हैं। गंभीर रूप से संक्रमित पत्तियां पकने से पहले ही गिर जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप पैदावार में कमी होती है।

डाई

बैक और एन्थ्रेक्नोज– रोग के लक्षण अधिकांशत: पके हुए फलों पर दिखाई देते हैं तथा इसलिए इस रोग को पके हुए फलों का सडऩ भी कहा जाता है। चित्तियां सामान्यत: वृत्ताकार, जलमग्न एवं काले किनारे के साथ डूबी हुई होती हैं। जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, ये चित्तियां फैलती हैं तथा इनसे गहरे फलन के साथ निश्चित मार्किंग बनती है। अनेक चित्तियों वाले फल पकने से पहले ही गिर जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप पैदावार का भारी नुकसान होता है। कवक फल के डंठलों पर भी आक्रमण कर सकते हैं तथा तने के साथ-साथ फैल सकते हैं। जिससे पश्चमारी के लक्षण बन जाते हैं।

फ्यूजेरियम 

यह रोग अधिकांशत: खराब निकासी वाली मिट्टी में होता है, पौधे के मुरझाने और पत्तियों के ऊपर की तरफ तथा अंदर की तरफ मुडऩे से फ्यूजेरियम मुरझान का पता चलता है। पत्तियां पीली होकर मर जाती हैं। आमतौर पर यह रोग खेत के नीचे वाले पानी रुकने वाले क्षेत्रों में दिखाई देता है तथा जल्दी ही सिंचाई के साथ पानी की नाली के साथ फैल जाता है। उपरोक्त समय तक जब भूमि के ऊपर लक्षण दिखाई देने लगते हैं। तब तक पौधे की संवहनी प्रणाली विशेष रूप से निचले तने तथा जड़ें भी विरुपित होने लगती हैं।

झुलसा

यह शिमला मिर्च का एक क्रियात्मक विकार है। जिसमें फल सूर्य की सीधी किरणें पडऩे के कारण प्रभावित होते हैं। उन पर सफेद रंग के परिगलित चकते बन जाते हैं तथा जो हिस्सा सीधे सूर्य के संपर्क में आता है, उसकी उपरी सतह पतली और सूखी तथा कागज जैसी हो जाती है।

नाशीजीव प्रबंधन
  • डेम्पिंग आफ से बचने के लिए अच्छी निकासी के लिए भूमि स्तर से लगभग 10 से 15 सेंटीमीटर ऊपर उठी हुई नर्सरी की क्यारियां तैयार करें।
  • भूमि से पैदा होने वाले नाशीजीवों के लिए मिट्टी सौर्गीकरण के लिए क्यारियों को 45 गेज (0.45 मिलीमीटर) मोटाई की पॉलीथिन शीट से तीन सप्ताह के लिए ढकें। मिट्टी सौर्गीकरण के दौरान मिट्टी में पर्याप्त नमी हो।
  • 3 किलोग्राम की घूरे की खाद में कवकीय विरोधी टी. हारजेनियम (सीएफयू 2 & 10\9 प्रति ग्राम) मिलाएं तथा समृद्धिकरण के लिए उसे लगभग 7 दिनों के लिए छोड़ दें, 7 दिनों के बाद 3 वर्ग मीटर की क्यारियों में मिट्टी में मिलाएं।
  • मिर्च व शिमला मिर्च में डेंपिंग ऑफ तथा चूसकनाशी जीवों का प्रबंधन करने के लिए विश्वसनीय स्त्रोत से प्राप्त ट्राईकोडर्मा से 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से या इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस का 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें, जिससे कि प्रारंभिक स्थितियों में ही नाशीजीवों का प्रबंधन किया जा सके।
  • स्यूडोमोनास फ्लुओरिसेन्स (टीएनऐयु स्ट्रेन, आईटीसीसी बी ई 0005 का 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) या ट्राईकोडर्मा विरिडी (टीएनऐयू स्ट्रेन, आईटीसीसी बीई 6914 का 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) से मिर्च व शिमला मिर्च का बीजोपचार करें।
  • डेंपिंग ऑफ या सडऩ के प्रबंधन के लिए आवश्यकतानुसार कैप्टान 70 डब्ल्यू पी 0.25 प्रतिशत या 70 डब्ल्यूएस 0.2 से 0.3 प्रतिशत या मेन्कोजेब 75 डब्ल्यूपी 0.3 प्रतिशत की दर से मिट्टी उपचार के लिए प्रयोग करें।
  • सर्दी के मौसम के दौरान ठंड या पाले से बचाने के लिए नर्सरी की क्यारियों के एक सिरे पर खसखस का शेड लगाएं। क्यारियों को पाले से होने वाली क्षति से बचाने के लिए रात के समय पॉलीथिन की शीटों से ढक दें, और दिन के समय इन शीटों को हटा दें, जिससे कि वे सूर्य की गर्मी प्राप्त कर सकें।

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