नियो हाइड्रोपोनिक विधि से बनाएं छत बगीचा कम मिट्टी और पानी का अधिकतम

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(मनीष पाराशर)
इंदौर। छत पर गमलों, लटकाने वाली बॉस्केट, डलिया में मौसमी सब्जियां, औषधीय पौधे, फूल इत्यादि नाम मात्र के खर्च से उगाना संभव है। कृषि महाविद्यालय के पूर्व डीन डॉ. विनोद लाल श्रॉफ ने कृषक जगत से चर्चा में बताया कि नियो हाइड्रोपोनिक विधि से कम खर्च एवं रख-रखाव के साथ रसायनों-कीटनाशकों पर बिना खर्च किए सब्जियां उगाई जा सकती हैं। टोकनियों में कम मिट्टी में छत पर बगीचा बनाकर हर मौसम में सब्जियों के साथ विभिन्न फसलों का उत्पादन लिया जा सकता है।
डॉ. श्रॉफ बताते हैं नियो हाइड्रोपोनिक विधि में घर में निकलने वाले गारबेज अर्थात भंगार जैसे पुरानी टोकनियों, डिब्बों, लकड़ी के बक्सों आदि में 3 से 4 इंच मोटी मिट्टी की परत बिछाई जाती है। इसमें पहले से घरेलू नर्सरी में तैयार पौधों को रोप दिया जाता है। पौधे की जडें़ बड़ी होकर इस छाबड़ी या टोकनीनुमा गमले से बाहर निकलने पर उसे पानी में डुबोकर रखा जाता है। इससे पौधा जहां मिट्टी से पोषक तत्व लेता है, वहीं चौबीसों घंटे आवश्यकतानुसार जल ग्रहण करता है।
डॉ. श्रॉफ के अनुसार टोकरी-छाबड़ी सबसे उत्तम हैं। इसमें मौसमी सब्जियां डेढ़ माह में तैयार होती हैं। इसमें मिट्टी की 10-12 सेमी गहराई पर्याप्त होती है। अन्य सब्जियों के लिए 25 से 40 सेमी गहरे पात्र लें। मिट्टी एवं खाद का अनुपात 10:1 का रखें। यदि प्लास्टिक या टिन के गमले लेते हैं तो उनके ऊपर जूट का बोरा या कार्डबोर्ड लपेटकर रखें। इससे रिसने वाले जल को नीचे बाल्टी या डिब्बे में इकट्ठा किया जाता है। पौध पोषण हेतु कचरा, बायोमास के ह्यूमस में बदलने के साथ सहयोगी फसल संजीवनी प्रोटीन हाइड्रोलाइसेट, भूमिगत जीवाणु पूर्ण पोषण उपलब्ध कराते हैं। डीएपी-पोटाश जैसे उर्वरक 2-3 ग्राम प्रति गमला दे सकते हैं।

सहजीविता का लाभ लें

डॉ. श्रॉफ कहते हैं एक पत्ती, दो पत्ती, तीन पत्ती फसलें एक गमले में लगाएं। एक गमले में दलहनी तथा अदलहनी फसलों जैसे चवला फली, गेहूं, लाल भाजी, शिमला मिर्च, पार्सले आदि को साथ-साथ रखें। इससे मिट्टी में बैक्टिरिया, माइकोराइजा असंख्य संख्या में द्विगुणित हो जाते हैं। जैव कार्बन एवं नाइट्रोजन, खनिज की मात्रा बढऩे पर स्वस्थ वृद्धि एवं अच्छा उत्पादन मिलता है। छत गार्डन में ब्रोकली, पार्सले, लेट्यूस जैसे हाई वैल्यू उत्पाद।

फसल संजीवनी से करें उपचार

छत बगीचा में फसलों को रोगों से बचाने और पोषण संबंधी प्रश्न पर डॉ. श्रॉफ ने कृषक जगत को बताया कि घर पर फसल संजीवनी (प्रोटीन हाइड्रोलाइजेट) बनाई जा सकती है। पचास गमलों के लिए एक किलो गोबर, 200 ग्राम अनाज या घर की बची बासी दाल या दाल की चूरी, खली, आधा लीटर गोमूत्र, 1 ग्राम यीस्ट या 1/4 कटोरी जलेबी का खमीर को 10 लीटर पानी के साथ एक ड्रम में घोल लें। इसे 48 घंटे तक ढंक कर रखें। इसमें एक मुट्ठी उर्वरा मिट्टी, या कल्चर पाउडर या इसका घोल पांच ग्राम प्रति मिली मिलाएं। इस घोल में 2 लीटर घोल निकालें। इसमें 12 लीटर पानी मिलाकर 15 दिन के अंतराल से सिंचाई करें। इससे जहां तेज वृद्धि होगी, वहीं विभिन्न प्रकार को रोगों और कीट-व्याधियों से मुक्ति मिलेगी और अच्छा उत्पादन मिलेगा।

बनाएं जैविक खाद और मृदा
डॉ. श्रॉफ बताते हैं कि घर निकलने वाले सुपर गारबेज अर्थात कचरा, सब्जियों के अवशेष, केले या अन्य फलों के छिलके, घर और आसपास के पेड़ों की पत्तियों और गाय के गोबर से जैविक खाद और मृदा तैयार की जा सकती है। इसे डस्टबिन या कंटेनर में एकत्र किया जाना चाहिए। एक पाइप में छेद करके वायु प्रवाह की व्यवस्था की जानी चाहिए। 30 दिन में ये घर के जैविक खाद के रूप में तैयार हो जाता है। इससे एक साल में एक टन खाद तैयार हो जाता है। यदि 10 रुपए प्रति किलो से गणना की जाए तो प्रति वर्ष लगभग 10 हजार रु. की खाद बनाई जा सकती है। ये मिट्टी एकदम नर्म और भुरभुरी होती है।

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