ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल की दरकार !
03 जनवरी 2026, नई दिल्ली: ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल की दरकार ! – पिछले सप्ताह देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल पीने से 14 लोगों की मृत्यु हो गई और डेढ़ सौ से अधिक लोग विभिन्न अस्पतालों में भरती हैं जहाँ उनका इलाज चल रहा है। शहरों में पेयजल की आपूर्ति और गंदे जल की निकासी की जिम्मेदारी स्थानीय नगरीय निकायों की होती होती है।
स्थानाभाव के कारण गंदे जल की निकासी और पेयजल की पाईप लाईन एक साथ ही रहती हैं। पेयजल की आपूर्ति के लिये पाईप लाईन में टूटफूट या पुरानी होने से रिसाव के कारण गंदा जल पाईप लाईनों में चला जाता है जिससे इंदौर में घटित जैसी दर्दनाक घटनाएं हो जाती है। चूंकि इंदौर में दूषित पेयजल से प्रभावित होने वाले नागरिकों की संख्या अत्यधिक है इसलिए आम जनता, प्रशासन, मीडिया और सरकार का ध्यान आकर्षित हो गया। यहां एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि दूषित पेयजल की आपूर्ति अचानक तो नहीं हुई है।
इसका सिलसिला तो महीनों पहले शुरू हो गया होगा। जब पेयजल में गंदे पानी की मात्रा अधिक हो गई तो यह ह्रदय विदारक घटना हो गई। इसके पहले भी दूषित जल के उपयोग से जल से होने वाली बीमारियां जैसे पीलिया, हैजा, टायफॉयड , डायरिया, पेचिश आदि बीमारियों के साथ त्वचा रोग व अन्य जल जनित रोगों से पीड़ित होते रहे होंगे लेकिन संख्या कम होने के कारण इस पर ध्यान नहीं दिया होगा और चिकित्सकों ने भी सामान्य बीमारी जानकर इलाज किया होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में भी जल जनित बीमारियों से पीड़ितों की संख्या काफी मात्रा में होती है लेकिन इन बीमारियों को सामान्य समझा जाता है।
ग्रामीण भारत में आज भी डायरिया, पीलिया, टायफाइड और पेट की बीमारियाँ आम हैं। इन बीमारियों की जड़ में दूषित पेयजल है। बच्चों में कुपोषण और महिलाओं में एनीमिया जैसी समस्याओं का संबंध केवल भोजन से नहीं, बल्कि असुरक्षित पेयजल से भी है। विडंबना यह है कि सरकार एक ओर स्वास्थ्य और अस्पतालों पर भारी खर्च कर रही है, दूसरी ओर बीमारियों के मूल कारण स्वच्छ पेयजल पर अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा रही है। जब तक गांवों को सुरक्षित पानी नहीं मिलेगा, तब तक स्वास्थ्य पर किया गया खर्च अधूरा ही रहेगा।
केंद्र सरकार द्वारा ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत पेयजल को एक प्रमुख घटक माना गया और वर्तमान में जल जीवन मिशन चलाया जा रहा है। सन 2019 में शुरू हुए इस मिशन के तहत सन 2028 तक देश के सभी ग्रामीण घरों में नल से पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। सरकार का दावा है कि लगभग 80 प्रतिशत ग्रामीण घरों तक नल से स्वच्छ पेयजल पहुँचा दिया गया है, जो मिशन की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। सरकारी आंकड़ों को देखने से संतोष तो मिलता है कि बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवारों को नल से पानी का कनेक्शन मिला है। यह उपलब्धि निश्चित रूप से महत्त्वपूर्ण है। पर इसे भी स्वीकार करना होगा कि केवल नल का कनेक्शन मिलने का अर्थ यह नहीं है कि नल से स्वच्छ पेयजल प्रवाहित हो रहा है वह भी पर्याप्त मात्रा में । हालांकि केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन के लिये बजट में 74,226 करोड़ रूपये का आवंटन किया है लेकिन इस मिशन की सार्थकता तभी है जब ग्रामीण घरों तक नियमित, सुरक्षित और पर्याप्त मात्रा में जल की आपूर्ति हो ।
यह तभी होगा जब पाइपलाइन की मरम्मत, मोटर और पंप की रख-रखाव तथा स्थानीय स्तर पर पानी का प्रबंधन गुणवत्ता सहित सुनिश्चित किया जाए । ग्रामीण क्षेत्रों में अब पेयजल के लिए परम्परागत रूप से उपयोग में लाए जाने वाले कुओं के स्थान पर नलकूप (बोरवेलों) का उपयोग किया जा रहा है। जन जीवन मिशन के तहत भी नलकूपों से ही पेयजल की आपूर्ति की जा रही है। आपूर्ति किए जा रहे जल की गुणवत्ता की जांच की जानी चाहिए कि वह जल पीने लायक है या नहीं। इसके साथ ही नल के साथ हर दिन पर्याप्त सुरक्षित पेयजल की आपूर्ति, पंचायतों को पेयजल की आपूर्ति के लिए रख-रखाव हेतु पर्याप्त राशि की व्यवस्था और जल गुणवत्ता की अनिवार्य जांच कड़ाई से की जानी चाहिए।
ग्रामीण क्षेत्रों में गिरता भूजल स्तर भी गम्भीर चिंता का विषय है इसलिए जल संरक्षण तथा रिचार्जिंग भी प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके अलावा किसानों को भी सिंचाई के लिए जल का न्यूनतम और जरूरी उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। वैसे शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के सभी लोगों को यह बताना अनिवार्य है कि जल का उपयोग करते समय यह यह बात ध्यान रखें कि पृथ्वी पर कुल जल का करीब 97.5 प्रतिशत हिस्सा समुद्रों में है तथा उपयोग हेतु मीठा पानी केवल 2.5 प्रतिशत है। मीठे पानी में करीब 68 प्रतिशत बर्फ के रूप में, जमीन में करीब 30 प्रतिशत और सतह पर मात्र 1.2 प्रतिशत है। सतह पर जो 1.2 प्रतिशत मीठा जल है उसमें से करीब 87 प्रतिशत जल तालाबों और झीलों में, करीब 11 प्रतिशत जल दलदलों और आद्रभूमि में तथा नदियों में करीब 2 प्रतिशत मीठा जल है। इसलिए पानी का उपयोग करते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि हमारे उपयोग के लिए पानी की उपलब्धता कितनी कम है।
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