संपादकीय (Editorial)

झंडा कहो या बकानी, बासमती को करे हानि

रोग फैलने का तरीका
यह रोग बीज, हवा, भूमि जनित है। इस बीमारी के बीजाणु (कोनिडिया) दाना बनते समय बीज में प्रवेश कर जाते है। रोग से अधिक प्रभावित बीज रंगहीन हो जाते हैं। अच्छे बीज को दूषित पानी में भिगाने से भी बीमारी की बीजाणु लग जाते हैं। यह रोग बीज द्वारा अधिक फैलता है। रोग के जीवाणु सर्दियों में सुषुप्तावस्था में रहते हैं। रोग का संक्रमण बीज के अंकुरित होने पर होता है। जड़ों के पास की गाँठों पर सबसे पहले असर होता है। भारतीय न्यूनतम बीज प्रमाणीकरण में इस रोग का कोई मानक तय नहीं है।

बीमारी फैलाने में सहायक कारक
1. भूमि में रोग की बीजाणु भूमि में 7-9 महीने तक पड़े रहते हैं।
2. भूमि का तापमान 30 डिग्री सेंटीग्रेड रोग फैलने में सहायक।
3. पौधों को अधिक नाइट्रोजन देने से बीमारी अधिक फैलती है।
4. सभी बासमती किस्में रोग से प्रभावित होती हैं।

बीमारी की रोकथाम
1. रबड़ी फसल में बीमारी की रोकथाम का कोई कारगर उपाय नहीं है।
2. बीज उपचारित कर बोना ही समाधान है।

उपचार
1. ग्राम कार्बेंडाजिम, या थाइरम, बीज से उपचार करना।
2. नर्सरी लगाते समय कार्बेंडाजिम के घोल में जड़ों को भिगोकर लगाना।
3. धान की कटाई के बाद डंठलों को खेत से हटा दें।
4. नमक के घोल में बीज को तैराकर प्रभावित बीज अलग करें।
5. नर्सरी करने के तुरन्त बाद खेत से पानी न निकालें।
6. रोग रहित बीज प्रयोग करें।
7. जैविक-खड़ी फसल में स्यूडोमोनास फ्लोरसेंस का छिड़काव करना चाहिये।

विशेष

इस रोग से प्रभावित पौधे अन्य पौधे से 6 इंच ऊंचे हो जाते हैं और किसानों को बीज में मिलावट का शक हो जाता है और वे न्यायालयों में दावे दायर कर देते हैं। यह गलत है।

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